आचार्य श्रीहरि
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बांग्लादेशी कपल का सर कलम का प्रशंग नेपथ्य में क्यों धकेल दिया गया, इस पर व्यापक चर्चा क्यों नहीं हुई, इसे बर्बर करार क्यों नहीं दिया गया, इसे पाषाण काल की कबीला हिंसा क्यों नहीं घोषित किया गया, इसे भयंकर मजहबी हिंसा करार क्यों नहीं दिया गया , इसे मानवधिकार हनन क्यों नहीं बताया गया? इस प्रशंग पर खामोशी क्यों बरती गई और खामोश कौन कौन रहे हैं? सबसे पहली खामोशी संयुक्त राष्ट्र संघ की खटकती है, अमेरिका और यूरोप की खामोशी कचोटती है, मुस्लिम जगत की खामोशी भी अन्यायपूर्ण लगती है, मानवधिकार का झंडाबरदार एमनेस्टी सहित तमाम मानवधिकार संगठनों की खामोशी चिंता की बात है, भारत सरकार की खामोशी भी विचार का विषय कैसे नहीं हो सकती है, भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, इसलिए भारत सरकार की जिम्मेदारी बनती थी कि वह इस प्रशंग पर खामोशी तोड़ती, भारत कम्युनिस्ट जमात की भी खामोशी नहीं टूटी, भारत की प्रगतिशील जमात की भी खामोशी नहीं टूटी, मुस्लिम पक्षधर भारत की महिला जमात की खामोशी नहीं टूटी, भारत के मुस्लिम संगठनों की भी खामोशी नहीं टूटी। आखिर खामोशी का कारण क्या है? क्या इसके पीछे मुस्लिम समुदाय की हिंसा नीति जिम्मेदार रही है? क्या इसके पीछे मुस्लिम दुनिया की मताधिकार शक्ति जिम्मेदार रही है? क्या इसके लिए मुस्लिम देशों की एकजुटता और उनकी हिंसक मजहबी सोच जिम्मेदार रही है, क्या इसके पीछे सऊदी अरब की आर्थिक और मजहबी मानसिकता जिम्मेदार रही है, क्या इसके पीछे सऊदी अरब की तेल शक्ति जिम्मेदार रही है? क्या यह प्रशंग सिर्फ इस्लाम का आंतरिक मामला है और इस पर अन्य धर्मों तथा इस्लाम से बाहर के संगठनों को बोलने और दबाव बनाने का अधिकार नहीं है? क्या इस तरह से मानव जगत को बर्बर कानूनों और हिंसाओं से अपनी जान गवाने के लिय छोड़ देना चाहिए? जरूरी तो यह था कि ऐसी बर्बर और लोमहर्षक घटनाओं पर व्यापक चर्चा और रोकथाम के लिए कदम उठाना।
सऊदी अरब का अपना बर्बर और लोमहर्षक, हिंसक तर्क हो सकता है। वह कह सकता है कि हमने बंगला देशी कपल को न्यायपूर्ण मौत का घाट उतारा है, हमने अपने कानूनों के तहत सर कलम किया है , हमने इस्लामिक न्यायालय के माध्यम से सजा दी है। सऊदी अरब पूरी तरह से सच नहीं बोल रहा है। यह सही है कि वह अपनी शरिया संहिता के अनुसार सजा दी है। पर शरिया कानून न्यायालय में बचाव का अवसर क्यों नहीं दिया गया, अपना पक्ष रखने के लिए उनलोगों को अवसर दिया जाना चाहिए, वकील रखने का अधिकार दिया जाना चाहिए था। कपल सऊदी अरब के नागरिक नहीं थे, कपल बांग्लादेश के नागरिक थे, इसलिए सर कलम करने से पूर्व बांग्लादेश को अपने नागरिकों की मदद और न्यायिक सहायता देने के अधिकार से वंचित किया गया। बांग्लादेश का इस पर प्रतिक्रिया क्या थी, बांग्लादेश ने अपनी पीड़ा जताते हुए कहा कि उसे अपने नागरिकों का सर कलम करने की पूर्व जानकारी नहीं मिली, हमें पूर्व जानकारी मिलती तो हम कुछ कर सकते थे, हम सऊदी अरब से अपने नागरिकों की भूल पर माफी मांग सकते थे, हम अपने नागरिकों को वापस बुला सकते थे। बांग्लादेश सिर्फ माफी और दया की ही बात कर सकता था, वह इससे ज्यादा बहादुरी दिखा भी नहीं सकता था। क्योंकि सऊदी अरब के सामने बंगला देश की क्या बिसात? ऐसे भी बांग्लादेश की सरकार घोर इस्लामिक कुरीतियों पर सवार है। इसलिए बांग्लादेश ने सऊदी अरब की बर्बर, लोमहर्षक और हिंसक शरिया कानूनों के खिलाफ बोलने से परहेज किया और साहस दिखाने का प्रदर्शन नहीं किया।
सऊदी अरब का शरिया कानूनों की बर्बरता, और हिंसक चरित्र दुनिया भर में कुख्यात है, खासकर मानवधिकार क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों और संगठनों को मालूम है कि शरिया कानून के तहत प्रतिवर्ष सैकड़ों लोग का सिरकलम किया जाता है, फांसी पर टंगा दिया जाता है, कोड़े से पीटे जाते हैं। सऊदी अरब की शरिया कानून के तहत तीन आपराधिक प्रावधान हैं। शरिया अदालत से निकालने वाली ये तीन आपराधिक संहिताओं को भी जान लीजिये। पहली संहिता है हुदूद। हुदूद की संहिता कुरान और हदीश में व्यक्त सजा मिलती है, दूसरी संहिता है किसास। किसास बदले और प्रतिकार के दायरे में आती है, पीड़ित को बदला लेने या दया के आधार पर माफी देने का अधिकार है, पीड़ित माफी के बदले में मनी ले सकता है। तीसरी आपराधिक संहिता का नाम ताजीर है। ताजीर न तो कुरान और न ही हदीश पर आधारित है, इसका कोई हाथ पैर नहीं, इसका कोई आकर प्रकार नहीं है, इसका कोई लिखित और स्पष्ट दायरा नहीं है। फिर ताजीर संहिता कैसे काम करती है, कैसे सजा देती है? यह सिर्फ ताजीर न्यायालय के जज के विवेक ही अंतिम निर्णय होता है, ताजीर न्यायालय के जज के विवेक पर प्रश्नचिन्ह खड़ा नहीं किया जा सकता है, उस पर टीका टिप्पणी नहीं हो सकती है। वास्तव में ताजीर कानूनों का दुरुपयोग होता है, हथकंडा बनाया जाता है, विरोधियों को नियंत्रित करने या फिर विरोधियों का सफाया करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। सऊदी अरब ही नहीं बल्कि पूरे इस्लामिक देशों में इसी प्रकार के कानूनी प्रावधानों के तहत इस्लाम की कुरीतियों और हिंसक प्रबतियों की रक्षा होती है। कोई अगर इस्लामिक कुरीतियों के खिलाफ बोलता है और इससे अलग हटकर कोई आचरण करता है तो फिर बांग्लादेश के कपल की तरह ही उसे सर कलम कर दिया जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि ताजीर जैसे न्यायालय का जज स्वतंत्र भी नहीं होता है, वह तो इस्लाम की कुरीतियों का गुलाम रहता ही है,बल्कि वह इस्लामिक तानाशाही के शासक का प्रिय पात्र और गुलाम भी होता है। मुस्लिम देशों के शरिया न्यायालयों के जज भारत, अमेरिका और यूरोप के जजों की तरह स्वतंत, निर्भयी, नैतिक और मानवाधिकारी भी नहीं होते हैं। अगर इस्लामिक देशों के शरिया न्यायालयों के जज भारत, अमेरिका और यूरोप के जजों की तरह निर्भीक, स्वतंत्र, नैतिक और मानवाधिकारी नहीं होंगे तो फिर उनका विवेक आधारित न्याय भी बर्बर, लोमहर्षक, अनैतिक और मानवता का खून करने जैसा ही होगा।
इस्लाम को छोड़कर दुनिया के अन्य सभी मजहबी दुनिया में बर्बर, हिंसक और मानवधिकार विरोधी कानूनों में सुधार हुए हैं, बदलाव किए गए हैं, पाषाण काल की कबीलाई संहिताओं को समाप्त किया गया, आधुनिक काल की उदार न्याय व्यवस्था को अपनाया गया। सिर्फ न्याय व्यवस्था को आधुनिक और उदार ही नहीं बनाया गया बल्कि मजहब की कुरीतियों और अंध विश्वासों पर भी धर्म सत्ता के साथ ही साथ सत्ता व्यवस्था का भी मोह और समर्पण समाप्त हुआ है। दुनियां की सबसे बड़ी मजहब ईसायत इसका जीतजागता उदाहरण है। ईसाइयों के मानने वाले लोगों ने चर्चे की स्वीकार्यता और वर्चस्व को अपने सिर पर बैठाए रखने से इनकार कर दिया, चर्च और बाइबल आधारित सत्ता और न्याय व्यवस्था के खिलाफ बगावत भी हुई, चर्च के फरमान और आदेशों का अनुपालन करने से पहले मूल्यांकन, समीक्षा, विश्लेषण अनिवार्य हुआ, मजहब की वैज्ञानिक व्याख्या हुई। यही कारण है कि आज अमेरिका और यूरोप सबसे अधिक उदारवादी, सभ्य और मानवधिकार का झंडाबरदार है। यहूदी मजहब से निकल कर कॉल मार्क्स ने धर्म को अफीम कहा और मानवता का दुश्मन बताया, मजहब से दूर रहने का सिद्धांत दिया। हिंदू धर्म को ही देख लीजिए, हिंदू धर्म में भी कई भीषण कुरीतियाँ थी, अंध विश्वास था। सत्ती प्रथा सबसे भयंकर हिंसक थी और मनुष्यता के प्रति कलंक भी थी पर सती प्रथा को समाप्त किया गया, विधवा महिला को भी पुरषो की तरह जीने का अधिकार दिया गया, विधवा विवाह को मान्यता मिली। आज भारत के कानून और संविधान के अनुसार सभी लोगों को एक सामान माना जाता है।
जिस प्रकार ईसायत, हिंदुत्व, यहूदी आदि धर्मों में बर्बर, लोमहर्षक, हिंसक , पाषाण संहिताओं का संहार किया गया उस प्रकार इस्लाम की बर्बर, लोमहर्षक और मनुष्यता विरोधी कुरीतियों ,अंध विश्वासों का विरोध नहीं हुआ, कोई विद्रोह नहीं हुआ, शरिया संहिताओं में कोई सुधार नहीं हुआ, सुधार की कोशिशों पर आतंक और सर कलम जैसी हिंसा का घेरा बना रहा। मुस्लिम दुनिया सिर्फ गैर मुस्लिम देशों में वक्फ बोर्ड, अल्पसंख्यक कल्याण के प्रति सक्रियता रखती है। मक्का मदीना पूरे मुस्लिम के लिए पवित्र जगह है। मक्का मदीना की पवित्रता पर आंच आना स्वीकार नहीं है। मक्का मदीना ही क्यों बल्कि मुस्लिम देशों की हर मस्जिदों की स्वच्छता और इस्लामिक मूल्यों का उल्लंघन करने की सजा भी ऐसी ही है, अगर इस्लामिक सत्ता उल्लंघन करने वाले की सजा नहीं देती तो फिर आतंकी संगठन या फिर कोई इस्लामिक सिरफिरा उसका गर्दन काट देगा, चाकुओं से प्राण ले लेगा, बम से उड़ा देगा। सलमान रशदी सहित दुनिया में ऐसे लाखों उदाहरण है। यही कारण है कि दुनिया की मुस्लिम आबादी ने सऊदी अरब के इस गुनाह पर मौन सहमति ही जताई है। यह तक की बांग्लादेश की मुस्लिम आबादी ने भी विरोध नहीं किया।
सऊदी अरब का आंतरिक प्रशंग मानकर इस तरह की बर्बरता और हिंसा को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। दुनिया के जनमत और संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे नियामक संस्थान को सक्रियता दिखानी अनिवार्य है। पर किसी ने सऊदी अरब से इस प्रश्न पर जवाब मांगने का प्रयास नहीं किया। इस्लाम की कुरीतियों और सर कलम जैसी हिंसा, आतंक का शिकार दुनियां के अन्य धर्म के लोगों को भी भुगतना पड़ता है।
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’आचार्य श्रीहरि’
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