संपादकीय | प्रेरणा भारती
जिस देश में जीवन बचाना चिकित्सा का धर्म है, वहां यदि बीमारी किसी परिवार को आर्थिक रूप से तबाह करने लगे, तो यह केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न है। कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहा मरीज पहले ही मानसिक और शारीरिक पीड़ा से गुजरता है। ऐसे में यदि जीवनरक्षक दवाओं की कीमत खरीद मूल्य से कई गुना अधिक वसूली जाए, तो इसे व्यापारिक स्वतंत्रता कहकर उचित नहीं ठहराया जा सकता।
दवाओं की कीमतों में भारी अंतर को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के एक कड़वे सच को उजागर किया है। जब किसी दवा का खरीद मूल्य लगभग 2,700 रुपये हो और उसका अधिकतम खुदरा मूल्य करीब 27,000 रुपये बताया जाए, तो स्वाभाविक सवाल उठता है—आखिर इस अंतर का पैसा किसकी जेब में जा रहा है? यह अंतर यदि वास्तविक लागत, अनुसंधान और वितरण के उचित खर्च से नहीं, बल्कि अनुचित मुनाफाखोरी से पैदा हो रहा है, तो इसकी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही अनिवार्य है।
मरीज कोई ग्राहक नहीं, जिसे बाजार की मनमानी पर छोड़ दिया जाए। वह जीवन बचाने की विवशता में दवा खरीदता है। उसके सामने कीमत और जरूरत के बीच मोलभाव का विकल्प नहीं होता। यही विवशता जब मुनाफा कमाने का हथियार बन जाए, तो चिकित्सा सेवा अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है।
केंद्र सरकार ने 137 कैंसर रोधी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30 प्रतिशत तक सीमित करने का कदम उठाया है। यह स्वागतयोग्य पहल है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इतनी बड़ी स्वास्थ्य समस्या का समाधान केवल कुछ दवाओं तक सीमित रह सकता है? यदि बाजार में बड़ी संख्या में दवाएं मूल्य नियंत्रण के दायरे से बाहर हैं, तो आम मरीज को राहत कैसे मिलेगी? सरकार को दवाओं की वास्तविक लागत, उत्पादन खर्च, वितरण मार्जिन और अंतिम बिक्री मूल्य की पारदर्शी व्यवस्था बनानी चाहिए। आवश्यक दवाओं की कीमतों पर प्रभावी निगरानी हो तथा अनुचित मुनाफाखोरी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
निजी अस्पतालों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए। अस्पतालों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने और उचित लाभ कमाने का अधिकार है, लेकिन मरीजों की मजबूरी का अनुचित फायदा उठाने का अधिकार किसी को नहीं। दवाओं, चिकित्सा उपकरणों, जांच और अन्य सेवाओं के शुल्क में पारदर्शिता अनिवार्य होनी चाहिए। अस्पतालों में खरीद मूल्य और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत का स्पष्ट विवरण उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
यह भी समझना होगा कि हर मूल्य-अंतर अपने आप में लूट का प्रमाण नहीं है। उत्पादन, अनुसंधान, भंडारण, परिवहन, कर और वितरण की लागत भी कीमत का हिस्सा होती है। लेकिन जब अंतर असाधारण हो, तो उसका औचित्य बताने की जिम्मेदारी संबंधित कंपनियों और संस्थानों पर तय होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की चिंता को केवल एक कानूनी टिप्पणी मानकर भुला देना उचित नहीं होगा। यह सरकार, दवा कंपनियों, अस्पताल प्रबंधन और नियामक संस्थाओं के लिए चेतावनी है। स्वास्थ्य सेवा को केवल बाजार की मांग और आपूर्ति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। सरकार को आवश्यक दवाओं की उपलब्धता, उचित कीमत और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए मजबूत नियामक तंत्र विकसित करना होगा।
सवाल केवल दवा की कीमत का नहीं, इंसान की जिंदगी की कीमत का है। यदि किसी गरीब परिवार को इलाज के लिए जमीन, घर और जीवनभर की बचत बेचनी पड़े, तो विकास और चिकित्सा सुविधाओं के बड़े-बड़े दावे खोखले प्रतीत होते हैं।
अब वक्त है कि दवाओं की कीमतों की पारदर्शी जांच हो, अनुचित मुनाफे पर अंकुश लगे और मरीजों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। क्योंकि बीमारी से लड़ रहे व्यक्ति को राहत चाहिए, आर्थिक सजा नहीं। जीवनरक्षक दवा किसी की विलासिता नहीं, मरीज का अधिकार है। इस अधिकार की रक्षा करना सरकार और स्वास्थ्य व्यवस्था—दोनों की नैतिक तथा संवैधानिक जिम्मेदारी है।