नई दिल्ली | 27 अक्टूबर 2026
नई दिल्ली। देश में महंगी दवाओं और निजी अस्पतालों द्वारा वसूले जाने वाले भारी मुनाफे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाबदेही तय करने की जरूरत पर जोर दिया है। कैंसर की एक दवा की कीमत खुदरा विक्रेता को लगभग 2,700 रुपये में उपलब्ध होने के बावजूद उसका अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) करीब 27,000 रुपये होने पर अदालत ने कड़ी नाराजगी जताई थी। अदालत ने इस अंतर पर सवाल उठाते हुए इसे मरीजों के साथ दिनदहाड़े लूट जैसा बताया।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ दवाओं की कीमतों, जेनेरिक दवाओं के इस्तेमाल और चिकित्सा उपकरणों पर मूल्य नियंत्रण से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही है। अदालत ने सवाल उठाया कि जब आवश्यक दवाओं पर मुनाफे की सीमा तय करने का प्रावधान मौजूद है, तो इसका लाभ मरीजों तक प्रभावी ढंग से क्यों नहीं पहुंच रहा।
कैंसर की 137 दवाओं पर 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन की सीमा
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियों के बाद 137 कैंसर रोधी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30 प्रतिशत तक सीमित करने का निर्णय लिया है। सरकार के अनुसार, इस कदम से दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमतों में 20 से 70 प्रतिशत तक कमी आने और मरीजों को सालाना लगभग 2,500 करोड़ रुपये की बचत होने की उम्मीद है। नई कीमतें 9 नवंबर 2026 से प्रभावी होने की जानकारी दी गई है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया है कि जब दूसरी आवश्यक दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों में भी भारी अंतर देखने को मिलता है, तो मूल्य नियंत्रण केवल कैंसर की दवाओं तक सीमित क्यों रखा जाए।
डीपीसीओ के दायरे से बाहर हैं बड़ी संख्या में दवाएं
दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार के पास ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 का प्रावधान है। इसके तहत निर्धारित सूची में शामिल दवाओं की अधिकतम कीमत तय की जाती है। लेकिन गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने में कंपनियों को अधिक स्वतंत्रता प्राप्त है। इन दवाओं की कीमतों में वृद्धि पर अलग नियम लागू होते हैं।
विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, बाजार में दवाओं का एक बड़ा हिस्सा सीधे निर्धारित मूल्य-सीमा के दायरे में नहीं आता। अदालत में इस व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं और केंद्र से व्यापक नियमन पर विचार करने को कहा गया है।
अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियों पर भी सवाल
सुप्रीम कोर्ट की चिंता केवल दवाओं तक सीमित नहीं है। अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली चिकित्सा सामग्री और उपकरणों की खरीद कीमत तथा मरीजों से वसूली जाने वाली राशि के बीच भी बड़ा अंतर सामने आया है। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि अत्यधिक मार्जिन से इलाज का खर्च बढ़ सकता है और मरीजों के उपचार संबंधी फैसले भी प्रभावित हो सकते हैं।
केंद्र सरकार ने भी अदालत में स्वीकार किया है कि कुछ दवाओं और चिकित्सा सामग्रियों पर अत्यधिक मार्जिन की समस्या है। सरकार का कहना है कि मूल्य नियंत्रण के उपाय तैयार करते समय मरीजों को किफायती इलाज उपलब्ध कराने के साथ दवाओं की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
मरीजों को राहत मिलेगी या नहीं, यही सबसे बड़ा सवाल
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने देश में दवाओं की कीमतों, निजी अस्पतालों के मुनाफे और सरकारी नियमन की प्रभावशीलता पर बहस तेज कर दी है। अब प्रमुख सवाल यह है कि क्या केंद्र सरकार कैंसर की दवाओं से आगे बढ़कर अन्य आवश्यक दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों पर भी प्रभावी नियंत्रण की व्यवस्था बनाएगी।
अदालत की चिंता स्पष्ट है—दवाओं की कीमतों में भारी अंतर का लाभ किसे मिल रहा है और इसका बोझ आम मरीजों तथा करदाताओं पर क्यों पड़ रहा है? इस मामले में आगे की सुनवाई और केंद्र सरकार के प्रस्तावित कदम महत्वपूर्ण होंगे।