आरएसएस प्रचारक लैशराम जात्रा सिंह को मिलेगा 13वां स्वामी विवेकानंद स्मृति कर्मयोगी पुरस्कार

राष्ट्रीय सेवा और सामाजिक समरसता के लिए जीवनभर के समर्पण को मिलेगा सम्मान, 31 अक्टूबर को नई दिल्ली में समारोह

इंफाल, 26 अक्टूबर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मणिपुर प्रचारक लैशराम जात्रा सिंह को राष्ट्र निर्माण और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उनके आजीवन योगदान के लिए 13वें स्वामी विवेकानंद स्मृति कर्मयोगी पुरस्कार-2026 से सम्मानित किया जाएगा। माई होम इंडिया की ओर से यह पुरस्कार 31 अक्टूबर को नई दिल्ली स्थित कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया के मावलंकर सभागार में प्रदान किया जाएगा।

माई होम इंडिया के पूर्वोत्तर गतिविधियों के राष्ट्रीय प्रभारी सानोज गुप्ता ने बताया कि लैशराम जात्रा सिंह ने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्रसेवा, संगठनात्मक कार्य और समाज के प्रति समर्पण में लगाया है। पुरस्कार के अंतर्गत प्रशस्ति-पत्र, शॉल, स्मृति-चिह्न, ट्रॉफी और एक लाख रुपये की नकद राशि प्रदान की जाएगी।

10 अक्टूबर 1944 को मणिपुर के थौबल जिले के खंगाबोक खुल्लकपाम लीकाई में जन्मे जात्रा सिंह ने 22 वर्ष की आयु में आरएसएस की शाखाओं में जाना शुरू किया। उन्हें संघ से जोड़ने का श्रेय भास्कर राव कुलकर्णी को जाता है। एक वर्ष तक विस्तारक के रूप में कार्य करने और प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग पूरा करने के बाद वे 1971 में प्रचारक बने। तब से लगभग 55 वर्षों से वे संगठन और राष्ट्रसेवा के कार्य में निरंतर सक्रिय हैं।

अपने लंबे संगठनात्मक जीवन में उन्होंने जिला प्रचारक, विभाग प्रचारक और मणिपुर संभाग प्रचारक सहित विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। दक्षिण असम प्रांत में उन्होंने सह-बौद्धिक प्रमुख और सह-व्यवस्था प्रमुख के रूप में कार्य किया। संघ की संगठनात्मक संरचना में मणिपुर प्रांत के गठन के बाद वे प्रांत बौद्धिक प्रमुख और प्रांत व्यवस्था प्रमुख की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। वर्तमान में वे मणिपुर प्रांत कार्यकारिणी के सदस्य हैं।

मणिपुर में दशकों तक उनका कार्यकाल अनेक चुनौतियों, विरोध और सुरक्षा संबंधी कठिनाइयों के बीच गुजरा। इसके बावजूद उन्होंने देशभक्ति, हिंदुत्व और सामाजिक समरसता के विचारों को लेकर अपना संगठनात्मक कार्य जारी रखा। वर्ष 1975 में आपातकाल के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर एक वर्ष दो महीने तक जेल में रखा गया था।

उनके संगठनात्मक जीवन की एक उल्लेखनीय घटना म्यांमार सीमा पार कर उग्रवादी संगठनों के शिविरों तक पहुंचने और वहां संवाद स्थापित करने की पहल से जुड़ी है। बताया जाता है कि इस प्रयास के परिणामस्वरूप मणिपुर में संघ की गतिविधियों पर लगे प्रतिबंध हटाने में सफलता मिली। यह पहल कठिन परिस्थितियों में भी संवाद और संपर्क के माध्यम से समाधान तलाशने की उनकी कार्यशैली को दर्शाती है।

सरल स्वभाव, मधुर वाणी, हंसमुख और विनोदी व्यक्तित्व तथा लोगों को साथ लेकर चलने की क्षमता उनकी प्रमुख विशेषताएं मानी जाती हैं। अपने सहज व्यवहार और संगठन के प्रति निष्ठा के कारण उन्होंने मणिपुर में सैकड़ों स्वयंसेवकों के साथ आत्मीय संबंध बनाए हैं और विभिन्न वर्गों के लोगों का विश्वास अर्जित किया है।

82 वर्ष की आयु में भी जात्रा सिंह राज्यभर में प्रवास करते हुए संघ की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उम्र को देखते हुए स्कूटर से यात्रा बंद करने के बार-बार अनुरोध के बावजूद वे अपनी दिनचर्या में इसका उपयोग जारी रखे हुए हैं। उनका अनुशासित जीवन, त्याग और निरंतर सक्रियता मणिपुर में स्वयंसेवकों की कई पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रही है।

स्वामी विवेकानंद स्मृति कर्मयोगी पुरस्कार के माध्यम से उनके दशकों लंबे समर्पण, राष्ट्रसेवा और संगठनात्मक योगदान को सम्मानित किया जाएगा।

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