दवा के नाम पर मुनाफाखोरी पर लगे लगाम

फार्मा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग, महंगी दवाओं और कमजोर नियामक व्यवस्था का खामियाजा भुगत रहे आम मरीज

दवाएं जीवन बचाने का माध्यम हैं, मुनाफाखोरी का हथियार नहीं। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि दुनिया भर में फार्मा कंपनियों के अनैतिक तौर-तरीके चिंता का विषय बने हुए हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। दवाओं की कीमतों में बेतहाशा अंतर, डॉक्टरों को लुभाने के लिए महंगे उपहार और अन्य प्रलोभन तथा ब्रांडेड दवाओं को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति ने स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में फार्मा कंपनियों की मार्केटिंग नीतियों की समीक्षा के लिए सरकार द्वारा तीन सदस्यीय समिति गठित करने का निर्णय स्वागतयोग्य है। समिति को दो माह में रिपोर्ट देनी है, लेकिन असली परीक्षा उसकी सिफारिशों पर अमल की होगी।

सुप्रीम कोर्ट भी दवाओं की कीमतों में असामान्य अंतर और फार्मा कंपनियों की कार्यप्रणाली पर चिंता जता चुका है। जब किसी दवा की कीमत में वितरण के विभिन्न चरणों के दौरान कई गुना वृद्धि हो जाती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इसका लाभ किसे मिल रहा है और इसकी कीमत कौन चुका रहा है। दवा की कीमत में उत्पादन, वितरण और अन्य वैध खर्च शामिल हो सकते हैं, लेकिन इनके नाम पर अनुचित मुनाफाखोरी और मरीजों के शोषण को किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

सरकार ने पहले भी दवा कंपनियों की मार्केटिंग पर अंकुश लगाने के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे। डॉक्टरों को महंगे उपहार, नकद प्रलोभन या मनोरंजन के नाम पर विदेश यात्राएं कराने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाने का उद्देश्य चिकित्सा संबंधी निर्णयों को व्यावसायिक दबाव से मुक्त रखना था। इसके बावजूद यदि ऐसे तौर-तरीके जारी हैं, तो यह नियामक व्यवस्था की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न है। केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं; उनका कठोरता से पालन कराना भी जरूरी है।

इस अनैतिक गठजोड़ का सबसे बड़ा नुकसान मरीजों को उठाना पड़ता है। जब डॉक्टरों के दवा लिखने के निर्णय पर व्यावसायिक हितों का प्रभाव पड़ता है, तब मरीज के हित पीछे छूट जाते हैं। सस्ती और गुणवत्तापूर्ण जेनरिक दवाओं के प्रति जागरूकता तथा उनकी उपलब्धता भी प्रभावित होती है। यह समझना जरूरी है कि महंगी ब्रांडेड दवा हमेशा बेहतर गुणवत्ता की गारंटी नहीं होती। दवा का चयन उसकी प्रमाणित गुणवत्ता, प्रभावकारिता और मरीज की चिकित्सकीय आवश्यकता के आधार पर होना चाहिए, न कि कंपनी के प्रचार या किसी प्रलोभन के प्रभाव में।

समस्या केवल कीमतों तक सीमित नहीं है। दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी दवा की गुणवत्ता निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है, तो वह मरीज की सेहत और जीवन दोनों के लिए खतरा बन सकती है। इसलिए दवा निर्माण से लेकर बाजार में उसकी बिक्री तक प्रभावी निगरानी, नियमित जांच और नियमों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई अनिवार्य है। नियामक संस्थाओं को पर्याप्त संसाधन, स्वतंत्रता और जवाबदेही भी सुनिश्चित करनी होगी।

सरकार द्वारा गठित समिति के सामने चुनौती केवल मार्केटिंग के नियमों की समीक्षा करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था सुझाना है जिसमें डॉक्टरों और दवा कंपनियों के बीच वित्तीय लेन-देन में पारदर्शिता हो, अनैतिक प्रलोभनों पर प्रभावी रोक लगे, जेनरिक दवाओं की गुणवत्ता पर भरोसा बढ़े और मरीजों को उचित कीमत पर सुरक्षित दवाएं मिल सकें। समिति की सिफारिशों को आवश्यकता के अनुसार कानूनी समर्थन दिया जाना चाहिए और उनके उल्लंघन पर प्रभावी दंड का प्रावधान होना चाहिए।

स्वास्थ्य सेवा का उद्देश्य मरीज का उपचार है, न कि कंपनियों के मुनाफे को अधिकतम करना। दवा उद्योग का विकास आवश्यक है, लेकिन यह विकास जनहित, नैतिकता और जवाबदेही की कीमत पर नहीं होना चाहिए। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी मरीज केवल आर्थिक मजबूरी के कारण जरूरी उपचार से वंचित न रहे। फार्मा कंपनियों की मनमानी पर प्रभावी अंकुश और सस्ती, सुरक्षित तथा गुणवत्तापूर्ण दवाओं की उपलब्धता ही एक संवेदनशील और जिम्मेदार स्वास्थ्य व्यवस्था की असली कसौटी है।

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