रत्नज्योति दत्ता / टोक्यो
नेताजी की प्रतिमा के सामने बैठते ही लगा, जैसे जिंदगी का एक लंबा सफर अचानक पूरा हो गया हो। रेंकोजी मंदिर की शांति में टोक्यो की भागती-दौड़ती दुनिया कहीं पीछे छूट गई थी। सामने सुभाषचंद्र बोस थे और उनके सामने बैठा था मैं—गुवाहाटी की रेलवे कॉलोनी के उस छोटे से स्कूल का बच्चा, जिसने बचपन में पहली बार नेताजी का नाम सुना था।
बुधवार, 7 अक्टूबर को रेंकोजी में करीब दो घंटे बिताए। कोई जल्दबाजी नहीं थी। बस बैठना, देखना और मन ही मन उस बचपन में लौटना, जहां से नेताजी के प्रति मेरा आकर्षण शुरू हुआ था।
मेरे प्राथमिक विद्यालय का नाम था—‘नेताजी शिशु विद्यापीठ’। गुवाहाटी की रेलवे कॉलोनी में स्थित इस स्कूल में नेताजी मेरे लिए इतिहास की किताब का महज एक अध्याय नहीं थे। शिक्षक उनकी कहानियां सुनाते थे—उनके साहस की, अंग्रेजी शासन के खिलाफ उनके संघर्ष की, आजाद हिंद फौज की और उस आवाज की, जिसने देशवासियों से स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का आह्वान किया था।
तब इतिहास की जटिलताओं को समझने की उम्र नहीं थी। इतना जरूर समझता था कि नेताजी असाधारण थे।
बचपन में पैदा हुआ वह आकर्षण उम्र बढ़ने के साथ कम नहीं हुआ। बल्कि समय के साथ उसका अर्थ और गहरा होता गया।
पत्रकारिता में आने के बाद स्वतंत्रता आंदोलन को पढ़ने और समझने के कई अवसर मिले। नेताजी पर लिखा, उनके राजनीतिक फैसलों और आजाद हिंद फौज की भूमिका पर रिपोर्टें कीं। उनके जीवन और विचारों को लेकर इतिहासकारों के अलग-अलग मत भी पढ़े। लेकिन किताबों और दस्तावेजों से आगे मन में कहीं एक व्यक्तिगत अधूरापन बना रहा।
रेंकोजी आना शायद उसी अधूरेपन को छूने की कोशिश थी।
इस मंदिर में रखे अवशेषों को आम तौर पर अगस्त 1945 में ताइवान में विमान दुर्घटना में नेताजी की कथित मृत्यु के बाद प्राप्त उनकी अस्थियों से जोड़ा जाता है। भारत सरकार के समक्ष भी इस विषय पर अलग-अलग जांच आयोगों की रिपोर्टें रही हैं। शाहनवाज समिति और खोसला आयोग ने विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु तथा रेंकोजी के अवशेषों को उनसे जोड़ने की बात कही थी, जबकि न्यायमूर्ति मुखर्जी आयोग ने इससे अलग निष्कर्ष दिया। केंद्र सरकार ने मुखर्जी आयोग के इन निष्कर्षों को स्वीकार नहीं किया था।
लेकिन मैं रेंकोजी इस विवाद का फैसला करने नहीं आया था।
मैं आया था श्रद्धा के साथ।
एक भारतीय के रूप में उस महान स्वतंत्रता सेनानी को नमन करने और एक पत्रकार के रूप में उस इतिहास के सामने खड़े होने, जिसका मेरे अपने जीवन से भी गहरा भावनात्मक रिश्ता रहा है।
क्योंकि कुछ इतिहास सिर्फ दस्तावेजों, तारीखों और घटनाओं में दर्ज नहीं होते। वे हमारी स्मृतियों में भी बस जाते हैं।
नेताजी मेरे लिए ऐसा ही एक नाम हैं।
भारतीय राष्ट्रीय सेना—आईएनए—के नेतृत्व के माध्यम से नेताजी ने स्वतंत्रता आंदोलन को एक अलग सैन्य और अंतरराष्ट्रीय आयाम दिया। उनके राजनीतिक विचारों, रणनीति और जापान के साथ संबंधों को लेकर इतिहास में अलग-अलग मत हैं। लेकिन भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर उनके प्रभाव और भारतीय जनमानस में उनकी जगह को नकारना संभव नहीं है।
रेंकोजी में खड़े होकर मैंने उसी विरासत को नमन किया।
और केवल नेताजी को ही नहीं, जापान को भी।
दशकों से यह मंदिर नेताजी से जुड़ी स्मृतियों को संजोए हुए है। रेंकोजी में उनके अवशेषों को लेकर भारत में लंबे समय से भावनात्मक और ऐतिहासिक बहस चलती रही है। 1994 में संसद में भी सरकार ने इस विषय पर स्थिति स्पष्ट की थी और बताया था कि अवशेष रेंकोजी मंदिर में सुरक्षित हैं।
मंदिर में एक स्मारक पट्टिका पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का नाम भी दिखाई दिया। वाजपेयी रेंकोजी की यात्रा कर नेताजी को श्रद्धांजलि दे चुके हैं।
पट्टिका के सामने कुछ क्षण रुकते हुए लगा कि इतिहास कभी-कभी किताबों के पन्नों से बाहर निकलकर हमारे सामने खड़ा हो जाता है।
एक नाम के रूप में।
एक प्रतिमा के रूप में।
एक स्मारक के रूप में।
या फिर किसी शांत मंदिर के रूप में।
रेंकोजी मेरे लिए ऐसा ही एक स्थान बन गया।
नेताजी के लापता होने, उनकी मृत्यु की परिस्थितियों और रेंकोजी में सुरक्षित अवशेषों की पहचान को लेकर सवाल शायद आगे भी उठते रहेंगे। इतिहास के कुछ प्रश्नों का अंतिम उत्तर मिलना आसान नहीं होता।
लेकिन इन सवालों से अलग एक बात निर्विवाद है—सुभाषचंद्र बोस भारतीय राष्ट्रीय स्मृति के सबसे प्रभावशाली नामों में से एक हैं। उनका व्यक्तित्व और उनकी विरासत आज भी पीढ़ियों को प्रभावित करती है।
मेरे लिए उनकी स्मृति इससे कहीं अधिक निजी है।
गुवाहाटी की रेलवे कॉलोनी।
एक छोटा सा स्कूल।
‘नेताजी शिशु विद्यापीठ।’
शिक्षकों से सुनी गई कुछ कहानियां।
और एक बच्चे के मन में पैदा हुआ कौतूहल—आखिर नेताजी कौन थे?
वही कौतूहल धीरे-धीरे इतिहास में रुचि बना। फिर पत्रकारिता आई। इतिहास को पढ़ने, समझने और उस पर लिखने का अवसर मिला। लेकिन शायद भीतर कहीं वह बच्चा अब भी मौजूद रहा, जो स्कूल में नेताजी की कहानी सुनकर रोमांचित हुआ था।
रेंकोजी में उनकी प्रतिमा के सामने बैठकर अचानक लगा कि समय वास्तव में एक वृत्त की तरह होता है।
जहां से यात्रा शुरू होती है, बहुत लंबा रास्ता तय करने के बाद कभी-कभी वहीं लौटना होता है—लेकिन तब तक हम बदल चुके होते हैं।
गुवाहाटी के उस स्कूल के बच्चे से टोक्यो के इस मंदिर में बैठे पत्रकार तक की यात्रा में कई दशक बीत गए। दुनिया बदली, जीवन बदला, पेशा बदला। लेकिन नेताजी का नाम अब भी वही है।
बस उसे देखने वाली आंखें बदल गई हैं।
बचपन में नेताजी मेरे लिए एक साहसी नायक थे। आज उन्हें देखते हुए इतिहास की जटिलताएं भी समझ में आती हैं। लेकिन उन जटिलताओं के बीच उनकी निर्भीकता, देश के प्रति समर्पण और स्वतंत्रता के लिए उनका जुनून आज भी उतना ही प्रभावशाली लगता है।
रेंकोजी से लौटते हुए मेरे मन में कोई ऐतिहासिक निष्कर्ष नहीं था।
सिर्फ एक संतोष था।
बचपन में देखा गया एक सपना आखिरकार पूरा हो गया था।
गुवाहाटी की रेलवे कॉलोनी के उस बच्चे ने कभी नहीं सोचा होगा कि कई दशक बाद वह टोक्यो में रेंकोजी मंदिर की शांत छत के नीचे बैठकर उसी नेताजी की प्रतिमा को देखेगा, जिनकी कहानी उसने अपने स्कूल में पहली बार सुनी थी।
शायद कुछ यात्राएं केवल किसी स्थान तक पहुंचने के लिए नहीं होतीं।
वे हमें अपने ही अतीत तक वापस ले जाती हैं।
रेंकोजी की यह यात्रा मेरे लिए ऐसी ही यात्रा थी।
बचपन में पैदा हुआ नेताजी के प्रति आकर्षण, कई दशकों बाद टोक्यो में आकर उनकी स्मृति के सामने बैठ गया। और उस क्षण लगा—समय ने एक पूरा चक्र पूरा कर लिया है।
शैशव का वह सपना आखिरकार सच हो गया।