दत्तात्रेय होसबाले, सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
भारत के लिए यह युग-निर्माण का काल है। पूरा देश एक नए आत्मविश्वास के साथ नए भारत के निर्माण का संकल्प ले रहा है। भारत आत्मग्लानि से बाहर निकलकर आत्मगौरव की ओर बढ़ रहा है और उसका स्वबोध जागृत हो रहा है। इस परिवर्तन को भारत का पुनरुत्थान कहा जा सकता है।
जिन महापुरुषों के अथक प्रयासों से भारत का स्वबोध जागृत हुआ और हिंदू समाज में आत्मविश्वास का संचार हुआ, उनमें माननीय अशोक सिंघल जी का नाम अग्रणी रूप से आता है। उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए समाज ने उन्हें अनेक विशेषणों से विभूषित किया। किसी ने उन्हें ‘हिंदू हृदय सम्राट’ कहा, किसी ने राम जन्मभूमि आंदोलन का पुरोधा, किसी ने हिंदू पुनरुत्थान का नायक, तो किसी ने राष्ट्र जागरण अभियान का सेनापति।
लेकिन यदि अशोक जी के व्यक्तित्व की पहचान केवल एक शब्द में करनी हो, तो वह शब्द है—कर्मयोगी।
वे निष्काम भाव से कर्म करते थे। किसी कार्य में सफलता मिलने पर उसका श्रेय स्वयं लेने के बजाय उसे ईश्वर को समर्पित कर देते थे और सफलता से मिलने वाली प्रसिद्धि से स्वयं को अलग रखते थे। प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचने के बाद भी उन्होंने कभी प्रसिद्धि की आकांक्षा नहीं की। उनके सामने यदि उनकी प्रशंसा की जाती, तो वे सहज महसूस नहीं करते थे। मान-अपमान और यश-अपयश से ऊपर उठकर अपने कर्तव्य के मार्ग पर समभाव से चलना ही एक कर्मयोगी और सच्चे स्वयंसेवक की पहचान है और यह गुण अशोक जी के जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता था।
प्रतिभा का राष्ट्रकार्य में समर्पण
अशोक जी असाधारण प्रतिभा और तीक्ष्ण बुद्धि वाले विद्यार्थी थे। लेकिन उनकी प्रतिभा व्यक्तिगत जीवन की उन्नति के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र के उत्थान के लिए समर्पित थी।
उनका जन्म एक प्रतिष्ठित और प्रबुद्ध परिवार में हुआ था। उनके एक भाई भारतीय पुलिस सेवा में थे और उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक के पद तक पहुंचे। उनके अन्य भाई सफल व्यवसायी और उद्योगपति बने। अशोक जी ने स्वयं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से धातुविज्ञान में इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की थी। उनके सामने व्यक्तिगत जीवन में उन्नति के अनेक अवसर थे, लेकिन उन्होंने अपना जीवन पूरी तरह राष्ट्र को समर्पित कर दिया।
वे मूलतः आध्यात्मिक प्रकृति के व्यक्ति थे। स्वामी विवेकानंद की तरह उन्होंने भी अपने लिए कुछ प्राप्त करने के बजाय समाज और राष्ट्र के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उनकी साधना का केंद्र स्वयं नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र था।
संघ संस्कारों से निर्मित व्यक्तित्व
अशोक जी विद्यार्थी जीवन में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए। प्रारंभिक जीवन में उन्हें पूजनीय प्रो. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’ का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। माननीय भाऊराव देवरस ने एक कुशल शिल्पी की तरह उनके व्यक्तित्व को गढ़ा। उन्हें पूजनीय गुरुजी का भी निरंतर मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।
उनके समर्पण, कर्मठता, दृढ़ संकल्प, संचालन क्षमता, संगठन-कौशल और दूरदर्शिता में इन महापुरुषों के मार्गदर्शन की स्पष्ट छाप दिखाई देती थी। इंजीनियरिंग की शिक्षा पूरी करने के बाद ही वे संघ के प्रचारक बन गए। उन्हें जो भी जिम्मेदारी दी जाती, वे उसे पूरी निष्ठा और परिश्रम के साथ निभाते। ऐसा लगता था मानो वे उसी दायित्व के लिए तैयार किए गए हों।
विराट हिंदू सम्मेलन और विश्व हिंदू परिषद की जिम्मेदारी
जब वे दिल्ली प्रांत, जिसमें दिल्ली और हरियाणा शामिल थे, के प्रांत प्रचारक थे, उस समय मीनाक्षीपुरम में धर्मांतरण की घटना से पूरा समाज चिंतित हुआ। हिंदू समाज के व्यापक जागरण की आवश्यकता महसूस की जा रही थी।
माननीय अशोक जी को दिल्ली में विराट हिंदू सम्मेलन आयोजित करने की जिम्मेदारी दी गई। डॉ. कर्ण सिंह सहित समाज के विभिन्न वर्गों को साथ लेकर उन्होंने इस विराट हिंदू सम्मेलन की योजना को साकार किया। पूजनीय संतों के मार्गदर्शन में समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़कर जिस कुशलता से इतने बड़े आयोजन का संचालन किया गया, उससे पूरे समाज को अशोक जी की संगठन क्षमता का परिचय मिला।
इस आयोजन के माध्यम से समाज में धर्मांतरण की चुनौती के प्रति जिम्मेदारी का भाव जागृत हुआ। इसके बाद धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में व्यापक जागरण के लिए उन्हें विश्व हिंदू परिषद की जिम्मेदारी दी गई।
उन्होंने इस दायित्व का भी उसी कर्मठता और समर्पण के साथ निर्वहन किया। समाज की परिस्थितियों को समझना, उसके अनुरूप विचार करना, योजना बनाना और उसे धरातल पर उतारना—यही उनके कार्य की विशेषता थी।
समरस हिंदू समाज के निर्माण का प्रयास
हिंदू समाज के सामने सदियों से अस्पृश्यता एक गंभीर सामाजिक चुनौती रही है। जब तक अस्पृश्यता समाप्त नहीं होती, तब तक समरस समाज की कल्पना पूरी नहीं हो सकती।
अशोक जी ने इस विषय को केवल सामूहिक भोज या प्रतीकात्मक आयोजनों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने पूजनीय संतों से आग्रह किया कि वे हिंदू समाज को यह संदेश दें कि अस्पृश्यता हिंदू धर्म के मूल आदर्शों के अनुरूप नहीं है। संतों ने अनुसूचित समाज की बस्तियों में प्रवास शुरू किया। इस विषय पर अध्ययन और विमर्श को भी आगे बढ़ाया गया।
9 नवंबर 1989 को अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर के शिलान्यास समारोह में अनुसूचित समाज के श्री कामेश्वर चौपाल की भूमिका इसी व्यापक सामाजिक समरसता के संदेश से जुड़ी थी। वहां अनेक पूजनीय संत और धर्माचार्य उपस्थित थे। इसी प्रकार वाराणसी में डोम राजा के घर पूजनीय संतों का भोजन करना भी सामाजिक समरसता के संदेश का महत्वपूर्ण उदाहरण बना।
इन प्रयासों ने समाज में इस विश्वास को मजबूत करने में सहायता की कि सामाजिक भेदभाव को दूर करके समरस हिंदू समाज का निर्माण संभव है।
राम जन्मभूमि आंदोलन और अशोक जी
राम जन्मभूमि आंदोलन आधुनिक भारत के सबसे व्यापक सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों में से एक रहा। 1980 के दशक से लेकर 2019 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और उसके बाद मंदिर निर्माण तक इसके अनेक महत्वपूर्ण चरण रहे।
राम-जानकी रथयात्रा, शिला पूजन, चरण-पादुका पूजन, रामज्योति जैसे विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से देश के अलग-अलग क्षेत्रों में व्यापक जनजागरण हुआ।
इस पूरे आंदोलन में अशोक जी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। 1990 की कारसेवा के दौरान उत्पन्न परिस्थितियों और अनेक कार्यकर्ताओं के बलिदान ने आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया। कठिन परिस्थितियों में भी अशोक जी का दृढ़ विश्वास कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहा।
उनका विश्वास था—
“यह राम जी का काम है, राम जी ही इस काम को अवश्य पूरा करेंगे।”
उनके जीवनकाल में मंदिर निर्माण पूरा नहीं हो सका, लेकिन जिस आंदोलन को उन्होंने दशकों तक दिशा, संगठन और शक्ति दी, उसका परिणाम उनके निधन के बाद साकार हुआ। 9 नवंबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। 5 अगस्त 2020 को भूमि पूजन हुआ और 22 जनवरी 2024 को श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा हुई। आज वहां भव्य मंदिर निर्मित है।
केवल राम जन्मभूमि तक सीमित नहीं था कार्यक्षेत्र
अशोक जी की पहचान राम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख नेता के रूप में बनी, लेकिन उनका कार्यक्षेत्र इससे कहीं अधिक व्यापक था।
रामसेतु की रक्षा, अमरनाथ यात्रा, गो-अनुसंधान एवं गोवंश संवर्धन, सामाजिक समरसता, प्रबुद्ध वर्ग को हिंदू चिंतन से जोड़ना तथा विभिन्न सामाजिक और राष्ट्रीय विषयों पर जनजागरण—इन सभी क्षेत्रों में उनके प्रयास और मार्गदर्शन उल्लेखनीय रहे।
वे धातुविज्ञान के वैज्ञानिक थे, लेकिन समाज की प्रकृति, उसकी शक्ति और उसकी चुनौतियों को समझने की उनकी दृष्टि भी अत्यंत गहरी थी। उनकी कार्यपद्धति में वैज्ञानिक दृष्टि, संगठन-कौशल, आध्यात्मिक आस्था और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत समन्वय दिखाई देता था।
युगद्रष्टा कर्मयोगी
अशोक जी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वे किसी सफलता पर रुकते नहीं थे। एक लक्ष्य प्राप्त होते ही वे अगले लक्ष्य की ओर बढ़ जाते थे। समाज के सामने आने वाली प्रत्येक चुनौती को वे स्वीकार करते और उसके समाधान के लिए समाज को संगठित करने में जुट जाते।
उनके लिए संगठन साधन था, समाज साध्य था और राष्ट्रसेवा जीवन का उद्देश्य।
उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन की संभावनाओं को त्यागकर राष्ट्रकार्य को चुना। उन्हें प्रसिद्धि मिली, लेकिन वे प्रसिद्धि से स्वयं को अलग रखते रहे। उन्होंने नेतृत्व किया, लेकिन श्रेय स्वयं लेने की अपेक्षा नहीं रखी। उन्होंने संघर्ष किया, लेकिन व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं।
इसीलिए अशोक सिंघल जी का जीवन केवल एक व्यक्ति का जीवन नहीं, बल्कि समर्पण, साधना, संगठन और कर्मयोग का एक प्रेरणादायी अध्याय है।
भारत के वर्तमान पुनरुत्थान में जिन महापुरुषों की तपस्या, त्याग और पुरुषार्थ का योगदान है, अशोक जी उनमें अग्रणी हैं। उन्होंने हिंदू समाज में आत्मविश्वास जगाने, सामाजिक समरसता को आगे बढ़ाने और राष्ट्रचेतना को सुदृढ़ करने के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
इसलिए उन्हें केवल राम जन्मभूमि आंदोलन के महानायक के रूप में देखना उनके विराट व्यक्तित्व को सीमित करना होगा।
वे वास्तव में एक कर्मयोगी थे—ऐसे कर्मयोगी, जिनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरणा देता रहेगा।