“ आज का गीत – ७५”

“बाप्पा, अबकी ऐसे आना”

बाप्पा, अबकी ऐसे आना,

मन में दीप जलाना,

ढोल बजे तो प्रेम के बजें,

करना धरती गुण खाना ।

बाप्पा, अबकी ऐसे आना,

कुछ देकर ही जाना—

माटी की खुशबू, निर्मल नदियाँ,

और हरा-भरा जमाना।

मखमल के मंडप कम कर देना,

आँगन थोड़ा खुला रहे,

फूलों की दो पंखुरियाँ हों,

मन में सारा उत्सव रहे।

सोने-चाँदी की क्या ज़रूरत,

माटी का श्रृंगार करो,

जिस धरती ने गोद में पाला,

उस धरती से प्यार करो।

बाप्पा, पूजा वही सफल है,

जिसमें जीवन मुस्काए,

एक दिया मंदिर में जलता,

दूजा घर में जल जाए।

बाप्पा, अबकी ऐसे आना,

मन में दीप जलाना,

ढोल बजे तो प्रेम के बजें,

ये धरती कर कृपा- निधाना 

नदी किनारे शाम उतरती,

पंछी अपने घर जाते,

दूर कहीं आरती की धुन में

बच्चे गीत सुनाते।

उस पल को मत शोर बनाना,

उस पल को रहने देना,

जल में अपना रूप निहारो,

जल को स्वच्छ ही रखना ।

जिस जल से जीवन चलता है,

उसमें विष मत घोले कोई ।

बाप्पा की प्रतिमा लेकर

बाप्पा की बात भी खोले सोई ।

बाप्पा, अबकी ऐसे आना,

मन में दीप जलाना,

नदी बचे तो पर्व बचेगा,

बचे तभी घर- अंगना ।

देखो, गलियों में बच्चे हैं,

बूढ़े हैं चौखट पर,

माँ की आँखें राह निहारें,

किसी पिता के घर पर।

उत्सव ऐसा हो कि कोई

डरकर घर में न छिप जाए,

जिसके कान में शोर न सहता,

उसको भी उत्सव भाए।

पुलिस खड़ी है रत जगाकर,

हम सबकी रखवाली में,

उनकी भी तो शाम रहे कुछ

अपने घर की दीवाली में।

बाप्पा, अबकी ऐसे आना,

सबको साथ बुलाना,

उत्सव ऐसा—जिसमें कोई

अपना सुख न गँवाना।

किसने कहा बड़ी आरासें

ही भक्ति की पहचान हैं?

जिस घर में भूखा बच्चा सोए,

वहाँ फिर क्या बड़ी दुकान हैं?

एक थाली में अन्न बढ़ा दो,

एक अकेले का हाथ थाम लो,

एक उदास मनुष्य के भीतर

थोड़ा-सा विश्वास डाल दो।

माथे पर जो फूल चढ़ाया,

वह किसी के काम भी आए,

बाप्पा शायद वहीं मिलेंगे

जहाँ मनुष्य मनुष्य बन जाए।

फिर जब तुमको विदा करेंगे,

आँखें थोड़ी नम होंगी,

पर इस बार तुम्हारी राहें

कुछ कम कचरे बिखरी होंगी।

माटी फिर से माटी होगी,

जल फिर निर्मल हो पाए,

पेड़ों की शाखों पर बैठा

पंछी फिर से गीत सुनाए।

तुम अगले बरस फिर आना,

हम भी कुछ बदलेंगे,

तुमसे केवल माँगेंगे नहीं,

अपने हिस्से का भी करेंगे।

बाप्पा, अबकी ऐसे आना,

मन में दीप जलाना,

उत्सव हो तो जीवन जैसा—

सबको गले लगाना।

थोड़ा शोर घटाएँ बाप्पा,

थोड़ा प्रेम बढ़ाएँ,

माटी, पानी, पेड़, पवन को

अपना देव बनाएँ।

बाप्पा, अबकी ऐसे आना,

कुछ देकर भी जाना—

भक्ति रहे, संस्कृति भी बचे,

और बचा रहे जमाना।

गणपति बाप्पा मोरया…

धरती माँ की जय!

हरेन्द्र @ “काशी “

२५-०९-२०२६

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