लंदन की कलाकार असम की पारंपरिक मुखौटा कला सीखने पहुंचीं माजुली

माजुली: असम की सदियों पुरानी पारंपरिक मुखौटा निर्माण कला ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है। इसी क्रम में लंदन की समकालीन नृत्य एवं प्रदर्शन कला से जुड़ी कलाकार लीला इस पारंपरिक कला को सीखने के लिए नदी द्वीप माजुली पहुंची हैं।

लीला नतुन सामागुरी सत्र में करीब दस दिनों का गहन प्रशिक्षण ले रही हैं। वह पद्मश्री से सम्मानित और माजुली की पारंपरिक मुखौटा निर्माण कला के प्रसिद्ध कलाकार डॉ. हेमचंद्र गोस्वामी के मार्गदर्शन में मुखौटे बनाने की बारीक तकनीक सीख रही हैं।

प्रशिक्षण के दौरान लीला बांस और कुम्हार की मिट्टी सहित स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक सामग्रियों का इस्तेमाल कर रही हैं। वह असम की भाओना और सत्रिया सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े मुखौटे तैयार करने की पारंपरिक विधियों को भी समझ रही हैं।

इस कलात्मक आदान-प्रदान के तहत लीला ने अपने स्वयं के कलात्मक दृष्टिकोण को माजुली की पारंपरिक मुखौटा निर्माण कला के तत्वों के साथ जोड़ते हुए एक अमूर्त मुखौटा भी तैयार किया है।

इस पूरे अनुभव को एक वृत्तचित्र के माध्यम से दस्तावेजीकृत किया जाएगा। लीला माजुली के विभिन्न प्राकृतिक स्थलों पर इस मुखौटे को पहनकर प्रस्तुति देने की भी योजना बना रही हैं। इसके जरिए माजुली की पारंपरिक कला और उनकी समकालीन प्रदर्शन कला की पृष्ठभूमि को एक साथ प्रस्तुत किया जाएगा।

असम के मंत्री जयंत मल्लबरुआ ने मंगलवार को इस पहल को रेखांकित करते हुए कहा कि यह असम की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के भारत से बाहर के दर्शकों तक पहुंचने का उदाहरण है। उन्होंने कहा कि महान कला भौगोलिक सीमाओं से परे होती है और यह पहल महज सांस्कृतिक आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है।

माजुली की मुखौटा निर्माण परंपरा यहां के सत्रों और श्रीमंत शंकरदेव के नव-वैष्णव सांस्कृतिक आंदोलन से गहराई से जुड़ी हुई है। पारंपरिक रूप से इन मुखौटों का इस्तेमाल भाओना प्रस्तुतियों में पौराणिक पात्रों को दर्शाने के लिए किया जाता है। इन्हें बांस, मिट्टी, कपड़े और अन्य प्राकृतिक सामग्रियों से तैयार किया जाता है।

लंदन की कलाकार और माजुली के पारंपरिक कारीगरों के बीच यह संवाद असम की स्वदेशी कला परंपराओं के प्रति बढ़ती अंतरराष्ट्रीय रुचि को दर्शाता है। साथ ही, यह राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के महत्व को भी उजागर करता है।

यह पहल यह भी दिखाती है कि पारंपरिक शिल्प अपनी मूल पहचान और तकनीकों को सुरक्षित रखते हुए समकालीन कला तथा अंतर-सांस्कृतिक सहयोग के माध्यम से नए दर्शकों तक पहुंच सकते हैं।

अर्नब शर्मा
डिब्रूगढ़

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