डिब्रूगढ़ : प्रख्यात न्यूरोलॉजिस्ट, शिक्षक एवं असम मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. नारायण उपाध्याय का रविवार को दोपहर २ बजकर २२ मिनट पर असम मेडिकल कॉलेज में उपचार के दौरान निधन हो गया। वे करीब दो वर्षों से मोनोसाइटिक ल्यूकेमिया नामक रक्त कैंसर से जूझ रहे थे।
डॉ. नारायण उपाध्याय का जन्म १४ अप्रैल, १९४९ को असम के चबुआ के निकट रहमरिया में प्रजापति उपाध्याय और दीकरूपा उपाध्याय के घर हुआ था। उनका प्रारंभिक जीवन संघर्षों से भरा रहा। १९५० के विनाशकारी असम भूकंप और उसके बाद आई भीषण बाढ़ के कारण उनके परिवार को डिगबोई के निकट बालिजान बान गांव में स्थानांतरित होना पड़ा।
आर्थिक कठिनाइयों के बीच पले-बढ़े डॉ. उपाध्याय ने शिक्षा के प्रति अपनी लगन और दृढ़ संकल्प को कभी कम नहीं होने दिया। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बालिजान प्राथमिक विद्यालय से प्राप्त की और बाद में सौमर विद्यापीठ में अध्ययन किया। मेधावी छात्र रहे डॉ. उपाध्याय ने मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की तथा कई विषयों में लेटर अंक प्राप्त किए। संस्कृत में भी उन्होंने उत्कृष्ट अंक हासिल किए।
इसके बाद उन्होंने डिगबोई कॉलेज में अध्ययन किया और १९६७ में चिकित्सा शिक्षा के लिए असम मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया। आर्थिक कठिनाइयों और चिकित्सा शिक्षा की चुनौतियों के बावजूद उन्होंने दिसंबर १९७१ में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की और विश्वविद्यालय में नौवां स्थान प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने गौहाटी मेडिकल कॉलेज से मेडिसिन में एमडी की डिग्री हासिल की और सिलचर मेडिकल कॉलेज से अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत की।
हालांकि, डॉ. उपाध्याय के लिए शिक्षा किसी डिग्री के साथ समाप्त नहीं हुई। ज्ञान प्राप्त करने की उनकी निरंतर इच्छा उन्हें १९८२ में नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ले गई, जहां उन्होंने अत्यंत प्रतिस्पर्धी डीएम न्यूरोलॉजी पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया और १९८५ में इसे पूरा किया।
बाद में १९९५ में उन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की फेलोशिप मिली और वे उन्नत प्रशिक्षण के लिए लंदन स्थित प्रसिद्ध क्वीन स्क्वायर इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोलॉजी गए।
असम लौटने के बाद उन्होंने अपने ज्ञान और अनुभव को केवल अपने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि राज्य में न्यूरोलॉजी चिकित्सा और चिकित्सा शिक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। असम मेडिकल कॉलेज में न्यूरोलॉजी विभाग के विकास में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही। वे न्यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष बने और बाद में असम मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। सेवानिवृत्ति तक उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र में समर्पित भाव से योगदान दिया।
डॉ. उपाध्याय की पहचान केवल एक कुशल चिकित्सक के रूप में ही नहीं, बल्कि एक समर्पित शिक्षक के रूप में भी रही। उन्होंने कई पीढ़ियों के युवा चिकित्सकों का मार्गदर्शन किया और अपने ज्ञान एवं अनुभव को उनके साथ साझा किया। चिकित्सा सेवाओं को बेहतर बनाने में उनका योगदान लंबे समय तक याद किया जाएगा।
चिकित्सा के अलावा उनकी रुचि साहित्य, दर्शन, संस्कृत और भारतीय आध्यात्मिक चिंतन में भी थी। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के साथ ज्ञान और आध्यात्मिकता की उनकी खोज ने उनके व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाया।
जीवन के अंतिम करीब दो वर्षों में डॉ. उपाध्याय मोनोसाइटिक ल्यूकेमिया से जूझ रहे थे। बीमारी के कठिन दौर में भी उनके साहस, मानसिक दृढ़ता और संकल्प में कमी नहीं आई। जीवन भर दूसरों की सेवा करने वाले इस चिकित्सक ने अपनी बीमारी का सामना भी उसी अनुशासन और धैर्य के साथ किया, जिसने उनके पूरे जीवन को परिभाषित किया था।
लंबी और साहसपूर्ण बीमारी के बाद डॉ. नारायण उपाध्याय का रविवार को दोपहर २ बजकर २२ मिनट पर असम मेडिकल कॉलेज में उपचार के दौरान निधन हो गया।
उनके निधन से चिकित्सा जगत और समाज में शोक की लहर है। वे अपने पीछे पत्नी मंजू उपाध्याय, पुत्रियां विनीता और मनीषा, पुत्र भास्कर तथा परिवार के अन्य सदस्यों को छोड़ गए हैं। उनके अतिरिक्त उनके असंख्य छात्र, सहकर्मी, मरीज और शुभचिंतक भी उनकी स्मृतियों को अपने साथ संजोए रखेंगे।
रहमरिया से बालिजान, डिगबोई से असम मेडिकल कॉलेज और फिर एम्स से लंदन के क्वीन स्क्वायर तक डॉ. उपाध्याय की यात्रा केवल स्थानों के बीच की यात्रा नहीं थी, बल्कि संघर्ष, दृढ़ता, ज्ञान और सेवा की असाधारण यात्रा थी।
उनका जीवन युवा पीढ़ी के लिए एक स्पष्ट संदेश छोड़ता है—गरीबी या कठिन परिस्थितियों को कभी अपनी असफलता का बहाना न बनने दें। सीखते रहें, मेहनत करते रहें, अपने ज्ञान को दूसरों के साथ साझा करें और अपनी सफलता का उपयोग समाज की सेवा के लिए करें।
डॉ. नारायण उपाध्याय का जीवन यह साबित करता है कि सफलता केवल अर्जित डिग्रियों या हासिल किए गए पदों से नहीं मापी जाती। सच्ची सफलता इस बात में निहित है कि हमने कितना सीखा, कितनी ईमानदारी से काम किया, कितने लोगों की मदद की और आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या विरासत छोड़ी।
आज चिकित्सक ने अपनी अंतिम यात्रा पूरी कर ली है, लेकिन शिक्षक, उपचारकर्ता और उनके जीवन के आदर्श उन सभी लोगों के जीवन में सदैव जीवित रहेंगे, जिन्हें उन्होंने अपने ज्ञान, मार्गदर्शन और सेवा से प्रेरित किया।