जिस गांव में खाया था गुरु माधव देव ने ढ़ेकिया पात का साग और भात,उस गांव का नाम पड़ा ‘ढ़ेकिया खोवा’।
कहते हैं करीब पांच सौ साल पहले सन् 1528 ई. में,गुरु माधव देव जी यहां ठहरे थे, एक बुजुर्ग दम्पति के घर में,और भोजन में ग्रहण किया था उक्त साग ‘ढ़ेकिया साग’।
इसी गांव में नामघर की स्थापना हेतु एक बड़ा सा दीपक भी प्रज्वलित किया था जो आज तक अविरल जल रहा है.एक शरण नाम धर्म के प्रकाश से संसार को अंधकार से मुक्त कराते हुये। आज के उक्त नाम घर का परिदृष्य और इसके प्रति हमारी आस्था हम असम वासियों का गौरव है।
उक्त दीपक दैदीप्यमान हो रहा है..एशिया बुक आफ रिकार्डस् और इंडिया बुक आफ रिकार्डस् में अपना नाम दर्ज पाकर।
जोरहाट शहर से शिवसागर की ओर करीब 10/15 km.जाकर राष्ट्रीय मार्ग से करीब 3/4 km.बाईं और की राह, जिसके प्रवेश मार्ग पर बना है बड़ा सा लुभावना तोरण द्वार।अपने आप ही यात्री पहचान जाता है नामघर के मार्ग को।
असमिया पंजिका के अनुसार भादौ मास ( अगस्त/सितम्बर ) बड़ा ही धार्मिक महीना है,उमड़े पड़ते हैं लोग सत्रों और नाम घरों में धर्म के प्रति अपनी आस्थाओं के साथ।
आज उपरोक्त धार्मिक स्थल नाम सुनने मात्र से अपने आपको सौभाग्यवान समझता हूं।सभी भक्तों एवं पाठकों तथा गुरु देव से हर प्रकार की भूल भ्रांतियों के लिए क्षमा चाहता हूं।
जै गुरु माधव देव।
मुरारी के डिया,(९४ ३५० ३३०६०.)
डिब्रूगढ़-७८६००१.