शिलचर, 4 अगस्त। भारतीय शिक्षण मंडल, दक्षिण असम प्रांत की ओर से मंगलवार को गुरुचरण विश्वविद्यालय के सभागार में गुरु पूर्णिमा (व्यास पूर्णिमा) का गरिमामय आयोजन किया गया। कार्यक्रम में शिक्षा जगत से जुड़े अनेक प्रख्यात शिक्षाविदों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने भाग लिया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि शिलचर महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ. शंकर भट्टाचार्य थे, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में असम विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्राध्यापक डॉ. अनूप कुमार दे उपस्थित रहे। समारोह की अध्यक्षता भारतीय शिक्षण मंडल, दक्षिण असम प्रांत के अध्यक्ष प्रो. निरंजन राय ने की। इस अवसर पर भारतीय शिक्षण मंडल, कछार जिला के अध्यक्ष डॉ. अभिजीत साहा सहित विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के प्राध्यापक एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।
समारोह के दौरान प्रतिष्ठित शिक्षाविद् संजय कुमार दास को भारतीय शिक्षण मंडल, दक्षिण असम प्रांत की ओर से विशेष सम्मान से अलंकृत किया गया। उन्हें भारतीय शिक्षा, संस्कृति और समाज जीवन में उनके दीर्घकालीन एवं उल्लेखनीय योगदान के लिए यह सम्मान प्रदान किया गया।
सम्मान ग्रहण करने के बाद अपने संबोधन में संजय कुमार दास ने भारतीय शिक्षण मंडल की विभिन्न गतिविधियों की सराहना करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा, मूल्याधारित शिक्षा तथा राष्ट्रीय चेतना के संवर्धन के लिए मंडल द्वारा किया जा रहा कार्य अत्यंत प्रशंसनीय है और समाज के लिए प्रेरणास्रोत है।
कार्यक्रम की शुरुआत में डॉ. अभिजीत साहा ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए गुरु पूर्णिमा एवं व्यास पूर्णिमा के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक महत्व पर प्रकाश डाला।
मुख्य अतिथि डॉ. शंकर भट्टाचार्य ने भारतीय ज्ञान परंपरा पर विस्तृत व्याख्यान देते हुए कहा कि गुरु केवल ज्ञान प्रदान करने वाले शिक्षक नहीं, बल्कि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के चरित्र निर्माण के प्रमुख मार्गदर्शक होते हैं। भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा मानवता, नैतिकता और आध्यात्मिक विकास की आधारशिला रही है। गुरु पूर्णिमा इसी महान परंपरा के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का पावन अवसर है।
मुख्य वक्ता डॉ. अनूप कुमार दे ने भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा की ऐतिहासिक महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं में से एक है। सनातन सभ्यता ने ज्ञान, मानव कल्याण, नैतिक मूल्यों और सह-अस्तित्व की भावना के माध्यम से सदियों से विश्व को दिशा प्रदान की है।
अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. निरंजन राय ने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि व्यक्ति का सर्वांगीण (होलिस्टिक) विकास सुनिश्चित करना है। विद्यार्थियों के बौद्धिक, नैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के माध्यम से ही शिक्षा अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करती है। भारतीय ज्ञान परंपरा ज्ञानार्जन के साथ-साथ चरित्र निर्माण, जीवन मूल्यों, आत्मानुशासन, उत्तरदायित्व तथा समाज के प्रति कर्तव्यबोध पर विशेष बल देती है।