आर्यिका श्री के मुखारविंद से निकली वाणी का विवेचन
सन्तों ने आज की पीढ़ी को हमारे पूर्वजो द्वारा कही गई धार्मिक बातों पर संदेह करने को अनुचित ठहराया है। उन्होंने कहा कि बहुत से लोग मूल आगम या दर्शन पढ़े बिना केवल सुनी सुनाई बातों के आधार पर अपनी राय बना लेते है। जैन परंपरा अंधविश्वास का समर्थन नही करती सम्यक ज्ञान, प्राप्त करने के लिए श्रवण, मनन और चिंतन आवश्यक है।
प्रश्न करना अनुचित नहीं है, लेकिन निष्कर्ष अध्ययन, तर्क और अनुभव के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल अफवाह या पूर्वाग्रह पर। संदेह तब तक उचित है, जब तक वह सत्य की खोज का साधन है, लेकिन अगर वह सत्य को स्वीकार करने को ही रोक दे तो वही सत्य ज्ञान का सबसे बड़ा अवरोध बन जाता है।
मनुष्य का जीवन दो शक्तियों के बीच चलता है-श्रद्धा और संदेह ?
अगर हममे श्रद्धा होगी तो वहाँ उत्साह, शांति और आत्मविश्वास होगा। और श्रद्धा ही हमें आगे बढ़ाएगी।
लेकिन जहाँ संदेह होगा वहाँ भय, अस्थिरता और भ्रम जन्म लेगा।
संदेह मनुष्य के मन की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है। जब किसी व्यक्ति, घटना या विचार के बारे में पूरी तरह से जानकारी नहीं होती, तब शंका उत्पन्न होती है। उचित सीमा तक संदेह विवेक और सावधानी का प्रतीक है किन्तु अगर संदेह आदत बन जाए तो व्यक्ति की शान्ति चली जाती है और संबंधो में दरार पड़ जाती है और यही प्रगति का शत्रु बन जाता है।
प्रश्न यह उठता है कि युवाओं में संदेह क्यों उत्पन्न होता है?
संदेह का सबसे बड़ा कारण है अज्ञानता जो अध्ययन के
अभाव से उत्पन्न होता है। अगर वे मूल ग्रंथों का अध्ययन नहीं करेंगे तो भ्रम और संदेह उत्पन्न होगा। दूसरा कारण इंटरनेट और सोशल मीडिया। कुछ वीडियों देखकर लोग सदियों पुराने दर्शन पर अपना निर्णय बना लेते हैं। अधुरी जानकारी संदेह पैदा करती है। भय, धोखा, असफलता या नुकसान का डर भी व्यक्ति को संदेह करने पर विवश कर देता है।
तीसरा कारण है धर्म और धर्मकांड का भ्रम। धर्म का मूल उद्देश्य आत्मा की शुद्धि है, जबकि अनेक परंपराएँ समय और समाज के अनुसार विकसित हुई है। जब दोनों में अंतर नहीं समझाया जाएगा तो सदेह उत्पन्न होगा।
इसके अलावा आत्मविश्वास की कमी। जो व्यक्ति स्वंय पर विश्वास नहीं करता वह दुसरों पर भी विश्वास नहीं कर पाता। कई बार गलत आफवायें या जानकारी, पूराने कटु अनुभव, संवाद की कमी और खुद की नाकारात्मक सोच भी संदेह को जन्म देती है।
आज के सोशल मीडिया के युग में बिना सत्यापन फैलने वाली सुचनाएँ भी अनेक प्रकार के संदेह पैदा कर सकती है।
चौथा महत्वपूर्ण कारणः कथनी और करनी में अंतर।
यदि धर्म और सिद्धातो की बात करने वाले व्यक्ति में स्वंय के आचरण में विभिन्नता हो तो विश्वास का कम हो जाना स्वाभाविक है।
हमें समझना होगा कि मनुष्य की जिज्ञासा ही उसे ज्ञान की और ले जाती है। यदि प्रश्न न होते तो विज्ञान का विकास संभव नहीं होता और दर्शन का भी नहीं। अकसर देखा गया है कि समस्या तब उत्पन्न होती है, जब संदेह सत्य की खोज का माध्यम न बनकर सत्य से ही दूर ले जाने लगता है।
आज का युवा शिक्षित है, और तकनीकों से जुड़ा है। वो बातों को यूंही स्वीकार नहीं करता। वह सवाल करता है ऐसा क्यों करे? इसका आधार क्या है? इससे मेरे जीवन में क्या परिवर्तन होगा? ऐसे कई प्रश्न युवाओं के मस्तिष्क में घर करते हैं। अगर हम इनके प्रश्नों के उत्तर तर्क, अनुभव और प्रेमपूर्वक न दे तो स्वाभाविक है कि उनका संदेह और भी बढ़ेगा।
भगवान महावीर ने विवेक, अनुभव और आत्मचिंतन का मार्ग दिखाया। उन्होंने यह नहीं कहा कि किसी भी बात को इसलिए स्वीकार कर लो क्योंकि यह हमारी परंपरा का हिस्सा है, बल्कि उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी परंपरा को समझकर जीवन में उतारे और सत्य का अनुभव करें। हमे युवाओं के प्रश्नों से घबराना नहीं है। अगर उनके प्रश्न जैसे अहिंसा क्यों? “पूजा क्यो? उपवास क्यों?”, तो उस पर, क्रोधित होने के बजाय धैर्यपूर्वक उनकी जिज्ञासाओं का समाधान करें। जब धर्म का वैज्ञानिक, नैतिक और व्यवहारिक पक्ष सामने आएगा तब संदेह अपने आप कम होने लगेगा। हमें समझना होगा कि धर्म का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ नहीं है, बल्कि अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाना है। यदि धर्म से हमारे व्यवहार विचारों में पवित्रता और संयमित जीवन नहीं बनेगा तो युवाओं के मस्तिष्क में प्रश्नों का आना स्वाभाविक है।
इसलिए हम सब का परम कर्तव्य है कि हम धर्म को केबल परंपरा के रुप में नहीं बल्कि एक जीवन जीने की कला के रूप में प्रस्तुत करें।
जब एक युवा देखेगा कि धर्म से मन में शान्ति, परिवार में प्रेम और समाज में सदभाव बढ़ता है, तब निश्चय ही उसका संदेह विश्वास में बदल जाएगा।
प्रश्न करना ज्ञान का प्रारंभ है, लेकिन उत्तर खोजना सच्ची बुद्धिमत्ता। धर्म कभी भी प्रश्नों से नहीं डरता, धर्म तो सत्य की खोज में जिज्ञासु का स्वागत करता है।
जैन दर्शन का सबसे बड़ा सौंदर्य अनेकांतवाद है। अनेकांतवाद हमे सिखाता है कि सत्य के अनेक पक्ष हो सकते है, इसलिए मत-भेद किसी भी प्रकार से शत्रुता का कारण नहीं होना चाहिए बल्कि गहन समझ का अवसर होना चाहिए।
हम सब को मिलकर ऐसी धार्मिक संस्कृति का निर्माण करने की आवश्यकता है, जहाँ श्रद्धा और विवेक, आस्था और तर्क, परंपरा और प्रगति-सभी का सुन्दर समन्वय हो।
– विरेन्द्र जैन शिलचर
