असम विश्वविद्यालय में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ, हिमालय संरक्षण को जन आंदोलन बनाने का आह्वान
शिव कुमार,शिलचर, 24 जुलाई।
असम विश्वविद्यालय, शिलचर में शुक्रवार को “विकसित भारत-2047 के विजन को साकार करने में हिमालय की भूमिका” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ हुआ। विश्वविद्यालय के डिजास्टर रिस्क रिडक्शन (डीआरआर) क्लब द्वारा आयोजित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन कनेक्टिंग हिमालय के सहयोग से किया जा रहा है। कार्यक्रम को उत्तर पूर्वी परिषद (एनईसी), शिलांग तथा उत्तर पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्रालय (डोनर), भारत सरकार का सहयोग प्राप्त है। यह संगोष्ठी 24 एवं 25 जुलाई तक चलेगी, जिसमें देशभर के शिक्षाविद, वैज्ञानिक, पर्यावरण विशेषज्ञ, शोधकर्ता और नीति-निर्माता भाग लेकर हिमालय संरक्षण और विकसित भारत-2047 के लक्ष्य पर मंथन करेंगे।
कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह में असम विश्वविद्यालय के कुलपति एवं मुख्य संरक्षक प्रो. राजीव मोहन पंत, हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति एवं मुख्य अतिथि प्रो. अन्नपूर्णा नौटियाल, गुरु चरण विश्वविद्यालय, शिलचर के कुलपति प्रो. निरंजन राय, असम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. दिलीप चंद्र नाथ तथा आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रो. सुदीप्त राय सहित अनेक शिक्षाविद एवं शोधकर्ता उपस्थित रहे।
मुख्य अतिथि प्रो. अन्नपूर्णा नौटियाल ने अपने संबोधन में कहा कि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी की परिकल्पना इसी वर्ष अप्रैल में नई दिल्ली में आयोजित पाल इंडिया फाउंडेशन की बैठक के दौरान की गई थी, जिसकी अध्यक्षता नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. राजीव कुमार ने की थी। उन्होंने बताया कि केवल 20 दिनों के भीतर इतने बड़े राष्ट्रीय आयोजन को सफलतापूर्वक आयोजित करना सभी संस्थाओं और विशेषज्ञों के सामूहिक प्रयास का परिणाम है।
उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान प्रत्यक्ष बैठकें संभव नहीं थीं, लेकिन ऑनलाइन बैठकों के माध्यम से हिमालय से जुड़े विषयों पर लगातार शोध और विमर्श जारी रहा। इसके बाद भारतीय हिमालयी क्षेत्र के चार विश्वविद्यालयों के कुलपतियों ने नीति आयोग के समक्ष विस्तृत प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिसके आधार पर 31 जनवरी को नीति आयोग ने विभिन्न विश्वविद्यालयों, मंत्रालयों और विशेषज्ञों की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की।
प्रो. नौटियाल ने बताया कि इस पहल के बाद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने लगभग दो करोड़ रुपये की शोध परियोजना को स्वीकृति प्रदान की। इसके अंतर्गत हिमालय से जुड़े पाँच प्रमुख विषयों पर व्यापक अध्ययन किया गया। विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा और आवश्यक संशोधनों के बाद इन रिपोर्टों को नीति आयोग को सौंपा गया, जिन्हें व्यवहारिक और क्रियान्वयन योग्य सुझावों के कारण काफी सराहना मिली।
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरणीय असंतुलन के कारण हिमालय आज गंभीर संकट से गुजर रहा है। यदि समय रहते ठोस और सतत कदम नहीं उठाए गए तो इसके दुष्परिणाम केवल हिमालयी राज्यों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पूरे देश को प्रभावित करेंगे। उन्होंने हिमालय संरक्षण के प्रति युवाओं और मीडिया की सक्रिय भागीदारी पर बल देते हुए कहा कि इस अभियान को जन आंदोलन का रूप देना समय की आवश्यकता है।
इस अवसर पर असम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजीव मोहन पंत ने कहा कि विकसित भारत-2047 का सपना तभी साकार होगा, जब हिमालय सुरक्षित रहेगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के विकसित भारत के विजन में हिमालय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसी उद्देश्य से इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया है।
उन्होंने कहा कि संगोष्ठी में देशभर से ऐसे वैज्ञानिक और विशेषज्ञ शामिल हुए हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन हिमालय के अध्ययन, संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए समर्पित किया है। अगले दो दिनों तक ये विशेषज्ञ विद्यार्थियों, शोधार्थियों और प्रतिनिधियों के साथ वैज्ञानिक तथ्यों और पर्यावरणीय चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
प्रो. पंत ने कहा कि विकास आवश्यक है, लेकिन वह प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर होना चाहिए। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराना जरूरी है, परंतु यदि विकास प्रकृति के विनाश का कारण बन जाए तो उसका खामियाजा पूरी मानवता को भुगतना पड़ता है।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “जब हम प्रकृति को नष्ट करेंगे, तब प्रकृति भी हमें नष्ट कर देगी।” उन्होंने उत्तराखंड के केदारनाथ की 2013 की भीषण आपदा, उत्तरकाशी के सिलक्यारा सुरंग हादसे तथा हाल ही में सिक्किम में हुई सुरंग दुर्घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रकृति के साथ अत्यधिक छेड़छाड़ भी ऐसी घटनाओं का एक प्रमुख कारण हो सकती है।
कुलपति ने कहा कि हिमालय का पारिस्थितिकी तंत्र अत्यंत संवेदनशील है। यदि अंधाधुंध निर्माण और पर्यावरणीय दोहन जारी रहा तो हिमनद तेजी से पिघलेंगे, नदियों के जलस्रोत प्रभावित होंगे और गंगा, ब्रह्मपुत्र तथा बराक जैसी जीवनदायिनी नदियों का अस्तित्व भी संकट में पड़ सकता है। इसका सीधा असर कृषि, पेयजल, ऊर्जा, जैव विविधता और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रभाव हिमालय पर दिखाई दे रहा है। अनियमित वर्षा, बादल फटना, भूस्खलन, अचानक बाढ़ और बढ़ती गर्मी जैसी घटनाएँ इसी असंतुलन की चेतावनी हैं। उन्होंने कहा कि असम और पूरा उत्तर-पूर्व भी इससे अछूता नहीं है। असम के पर्वतीय क्षेत्र हिमालयी पारिस्थितिकी से जुड़े हैं और हाल के वर्षों में राज्य में आई विनाशकारी बाढ़, 2022 की शहरी बाढ़ तथा इस वर्ष की अभूतपूर्व बाढ़ कहीं न कहीं हिमालयी क्षेत्र में हो रहे जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय असंतुलन से जुड़ी हुई हैं।
प्रो. पंत ने कहा कि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर अथवा सिक्किम में होने वाले पर्यावरणीय परिवर्तन केवल उन्हीं राज्यों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनका प्रभाव असम सहित पूरे उत्तर-पूर्व और देश के अन्य हिस्सों पर भी पड़ता है। उन्होंने नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों, युवाओं और आम नागरिकों से हिमालय की प्राकृतिक वहन क्षमता (कैरिंग कैपेसिटी) का सम्मान करते हुए पर्यावरण-अनुकूल विकास मॉडल अपनाने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि विकसित भारत-2047 का लक्ष्य केवल आर्थिक प्रगति से पूरा नहीं होगा। इसके लिए प्रकृति और विकास के बीच संतुलन स्थापित करना अनिवार्य है। हिमालय का संरक्षण केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि देश की जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य से जुड़ा राष्ट्रीय दायित्व है।
दो दिवसीय इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से आए विशेषज्ञ अपने शोध पत्र प्रस्तुत करेंगे तथा हिमालय संरक्षण, आपदा जोखिम न्यूनीकरण, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता संरक्षण, जल संसाधन प्रबंधन और सतत विकास जैसे विषयों पर व्यापक चर्चा करेंगे। संगोष्ठी से प्राप्त सुझाव विकसित भारत-2047 के लक्ष्य की दिशा में नीति निर्माण और पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण आधार साबित हो सकते हैं।