अमेरिका में भारतीय मुस्लिम युवक पर हुए हिंसक, घृणात्मक और जान लेवा हमले का संदेश बहुत ही खतरनाक है, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि ईसाई संप्रभुत्ता के केंद्र में पनपती मुस्लिम घृणा के प्रदर्शित करता है। ईसाई और मुस्लिम संप्रभुता के बीच खीची हुई तलवार को भी प्रमाणित करता है। घटना को देखिए फिर सोचिए कि अमेरिका में मुस्लिम आबादी के खिलाफ कितनी जहरीली और खतरनाक नफरत फैली हुई है। सोहेल नाम का एक भारतीय मुस्लिम युवक अमेरिका के एक मॉल में कर्मचारी हैं। एक अमेरिकी राष्ट्रवादी उससे पूछता है कि तुम कहा से आए हो, किस देश का नागरिक हो? मुस्लिम युवक ने उत्तर दिया कि मैं भारत से आया हु और भारतीय नागरिक हूं। अमरीकी राष्ट्रवादी फिर प्रश्न करता है कि क्या तुम मुस्लिम हो? भारतीय मुस्लिम युवक ने कहा कि हां हम मुस्लिम हूँ। इतना सुनते ही अमरीकी राष्ट्रवादी पागल हो गया और अपने पॉकेट से चाकू निकाला और भारतीय मुस्लिम युवक सोहेल को चाकू से गोद डाला, उसने कोई एक दो बार नहीं बल्कि पन्द्र्रह बार चाकू से गोदा। सोहेल अस्पताल में जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहा है। यह घटना मुस्लिम आबादी को न केवल चिंतित कर दिया है, आक्रोशित कर दिया है, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रवादियों के खिलाफ भी मोर्चा खोलने के लिए प्रेरित किया है। मुस्लिम आबादी के संरक्षण देने वाले मुस्लिम संगठनों की गोलबंदी भी तेज हुई है और मुस्लिम संगठनों का कहना है कि अमेरिका में मुस्लिम आबादी सुरक्षित नहीं है, मुस्लिम आबादी के मानवधिकार खतरे में है, मुस्लिम आबादी के साथ पहले भेदभाव होता था पर अब हिंसक हमले हो रहे हैं, इसके पीछे ईसाई संप्रभुत्ता और ईसाई राष्ट्रवादियों की साजिश है, ईसाई राष्ट्रवादियों की हिंसा पर रोक लगाने की भी मांग की गई है। अमेरिकी संप्रभुत्ता के लिए ऐसी घटनाएं बहुत ही चिंताजनक है, अमेरिका की आजादी, अमेरिका की संस्कृति और अमेरिका के वैभव के खिलाफ है। सत्य तो यही है कि अमेरिकी वर्ल्ड ट्रेड सेटर के आतंकी विनाश के बाद ईसाई और मुस्लिम संघर्ष और हिंसा तेज हुई है।
इस तरह की हिंसा और घृणा के पीछे के कारण क्या-क्या हैं? क्या इसके लिए अमेरिका की मूल संप्रभुत्ता और राष्ट्रवादियों की हिंसक सोच और गोलबंदी जिम्मेदार हैं? क्या इसके पीछे ईसाई सर्वश्रेष्ठता की मानसिकता उकसाने का कार्य करती हैं? क्या ईसाई संप्रभुत्ता के सामने कोई सुरक्षा का प्रश्न भी खडा है? क्या ईसाई संप्रभुत्ता के सामने अपनी सस्कृति विनाश का भय कायम हो गया है? क्या इसके लिए मुस्लिम आबादी की हिंसक गोलबंदी जिम्मेदार हैं? क्या इसके लिए मुस्लिम आबादी की हिंसा और जिहाद की मानसिकता जिम्मेदार है? क्या मुस्लिम आबादी अपनी हिंसा और जिहाद के अभियान से ईसाई स्रप्रभुत्ता को लहूलुहान कर रखी है? क्या इसके लिए अमेरिकी राजनीति में मुस्लिम आबादी की बढती पैठ और वर्चस्व की भूमिका भी जिम्मेदार है? क्या मुस्लिम आबादी अब अमेरिकी संप्रभुत्ता के लिए खतरे की घंटी बन गयी हैं? अमेरिकी राजनीति में ईसाई और मुस्लिम संघर्ष, हिंसा और घृणा की मानसिकता को कम करने और संहार करने का कोई प्रयास क्यों नहीं होता है? क्या डोनाल्ड ट्रम्प की मुस्लिम विरोध की राजनीति ने अमेरिकी ईसाई संप्रभुत्ता की हिंसक शक्ति बढाने में भूमिका निभायी है? फिर डोनाल्ड ट्रम्प की मुस्लिम विरोधी नीति से अरब और अफ्रीका के मुस्लिम देशों की नाराजगी भी एक बडा प्रश्न है। सउदी अरब, कतर, पाकिस्तान जैसे कई मुस्लिम देश ईरान के खिलाफ अमेरिका की मदद कर रहे हैं।
स्वतंत्र निष्कर्ष यह है कि इसके पीछेेे राजनीतिक प्रश्न भी है और संस्कृति के प्रश्न भी जिम्मेदार हैं। पूरी दुनिया में मूल संस्कृति और मूल संप्रभुत्ता की सर्वश्रेष्ठता की सोच अनिवार्य मानी जाती है। कहने का अर्थ यह है कि मूल संस्कृति और मूल संप्रभुत्ता अपने आप को सर्वश्रेष्ठ समझती है और यह मानती है कि उनके उपर आयातित या फिर किसी भी प्रकार की संस्कृति और संप्रभुत्ता हावी नही होने चाहिए, उन्हें चुनाती नहीं देनी चाहिए, उनके लिए खतरे की घंटी नहीं बननी चाहिए। भारत में भी सनातन-हिन्दुत्व मूल संस्कृति और संप्रभुत्ता के अंदर ऐसी सोच देखी जा सकती है, इस्राइल भी अपनी यहूदी सोच से हिंसक और प्रतिकार में युद्ध की मानसिकता का सहचर है। इस्लाम और मुस्लिम आबादी से बचने के लिए यहूदियों ने एक नहीं बल्कि अनेक युद्ध लडे हैं और अभी भी मुस्लिम समुदाय के खिलाफ प्रतिकार युद्ध में संलग्न हैं। यहूदियों ने फिलिस्तीन को कब्र मे तब्दील कर दिया है। जबकि यूरोप में भी ईसाई संप्रभुत्ता अपनी सर्वश्रेष्ठता को लेकर चिंतित है और मुस्लिम आबादी से खतरा समझती है। इसी दृष्टिकोण से यूरोप में अब मुस्लिम शरणार्थियों को लेकर हिंसक और घृनित मानसिकता पनपी है, तेज हुई है, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि इसका दुष्प्रभाव अन्य धर्मो के शरणार्थियों और कामगारों पर पडा है।
अब अमेरिका की मूल संप्रभुत्ता क्या है, उनकी मूल संस्कृति क्या है? अमेरिका की मूल संप्रभुत्ता और संस्कृति ईसाईयत हैं। यूरोप के ईसाइयो ने अमेरिका को एकत्रित कर शक्तिशाली बनाया है। कहने का अर्थ यह है कि अमेरिका को एकता के सूत्र में बांधने और दुनिया के चौधरी बनाने में ईसाईयों की भूमिका बेमिसाल और अतुलनीय है। भारत की तरह ही अमेरिका की राजनीति दो नीतियो और दो सोच से प्रभावित है। सेक्युलर और राष्ट्रवादी। सेक्युलर और राष्ट्रवादियों की खेमेबदी सरेआम दिखती है। अमेरिका मे दो प्रकार की पार्टी राजनीतिक व्यवस्था है। एक का नाम है डेमोक्रेट पार्टी है तो फिर दूसरे का नाम रिपब्लिकन पार्टी। डेमोक्रेट पार्टी सेक्युलरवाद की बात करती है और मुस्लिम आबादी के समर्थक है, मुस्लिम हिंसा और मुस्लिम जिहाद पर उदासीनता बरतती है और नजरअंदाज करती है। जबकि रिपब्लिकन पार्टी राष्ट्रवादियों का प्रतिनिधित्व करती है। डेमोक्रेट पार्टी की सत्ता के दौरान पूरी दुनिया से मुस्लिम आबादी को आमंत्रण देकर बुलाया गया और उन्हें आर्थिक सहायता दिया गया, रोजगार दिया गया है, इतना ही नहीं बल्कि उन्हें कानूनी संरक्षण भी दिया गया। उस काल में ईसाई और मुस्लिम आबादी के बीच कोई खास खाई नहीं बनी हुई थी, क्योंकि उस समय मुस्लिम आबादी अपने आप को स्थापित करने और आर्थिक तौर पर मजबूत बनाने में लगी हुई थी, इसके साथ ही साथ अपनी जनसंख्या बढाने में लगी हुई थी। ईसाई संप्रभुत्ता भी यह नहीं सोचती थी कि जिस मुस्लिम संप्रभुत्ता को आर्थिक और कानूनी सहायताएं, समर्थन और संरक्षण देकर बढा रहे हैं वही एक दिन उनको चुनौती देगी और उनके अस्तित्व के लिए खतरे की घंटी बन जायेगी।
अमेरिका के इतिहास की दो घटनाओं ने मुस्लिम आबादी की हिंसा, जिहाद और मददगार संस्कृति और संप्रभुत्ता के लिए ही भस्मासुर होने की अवधारणा को जन्म दिया है। एक घटना थी अमेरिकी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर मुस्लिम आतंक का हमला और अमेरिकी वर्ल्ड ट्रेड सेटर का संहार। मुस्लिम आतंकियों ने इस्लाम की अवधारणा से ग्रसित होकर अमेरिका के आन-बान-शान अमेरिकी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का संहार कर दिया था। इस संहार में पांच हजार से अधिक लोग मारे गये थे। एक दूसरी घटना हिलैरी क्लिटन से जुडी हुई है। जब हिलेरी क्लिंटन राष्ट्रपति का चुनाव लड रही थी तब अमेरिका के मस्जिदों से सरेआम अलाउंस होता था कि इस्लाम खतरे में है, हिलेरी क्लिटंन ही इस्लाम को सुरक्षित कर सकती है। मस्जिदों के अंदर से सरेआम ऐसी अवधारणा का प्रचार करने की नीति जहरीली और खतरनाक थी, मुस्लिम संगठनों ने यह सोचने की कोशिश भी नहीं की थी कि इस तरह की जहरीली और खतरनाक प्रचार से ईसाई आबादी की गोलबदी शुरू होगी और वे जिन्हें राष्ट्रपति बनाना चाहते हैं, उनकी हार होगी। हुआ भी ऐसा। मुस्लिम समर्थन की बहुत बडी कीमत हिलेरी क्लिटन चुकायी थी, हिलेरी क्लिटन राष्ट्रपति चुनाव हार गयी थी। इधर अमेरिका में मस्जिदों की बाढ आयी है, मुस्लिम संगठनों की गोलबंदी भी खतरनाक हुई है। जोहरान ममदानी का प्रकरण भी काफी जहरीला है। जोहरान ममदानी मुस्लिम है और वह मुुस्लिम अमेरिका का सपना देखता है। मुस्लिम समर्थन से जोहरान न्यूयार्क का मेयर बन गया। अमेरिका के कई शहरों के भी मेयर मुस्लिम हैं जो अमेरिका को मुस्लिमकरण करने का अभियान चलाते हैं। अमेरिका की राष्ट्रीय नीति इस्राइल समर्थक है पर मुस्लिम आबादी इस्राइल का हिंसक विरोध कर अमेरिका की संप्रभुत्ता को ही चुनौती देती हैं।
अमेरिका के राष्ट्रवादियों या फिर ईसाई संप्रभुत्ता के सामने खडी हिंसक और जिहादी मुस्लिम चुनौती को नजरअंदांन नहीं किया जा सकता है। कहने का सीधा अर्थ यह है कि मुस्लिम आबादी को भी सयम दिखाना है, सभ्य रास्ता अपनाना होगा, भस्मासुर की मानसिकता छोड़नी होगी, अन्य धर्मो के साथ सहचर होकर रहना सीखना होगा। अगर मुस्लिम आबादी ऐसा नहीं करती है, संयम नहीं दिखाती है, जिहाद और गोलबंदी नहीं छोडती है, अमेरिका का मुस्लिमकरण करने की मानसिकता नहीं छोडती है तो फिर सोहेल जैसी घटनाएं आगे भी घटेगी, अमेरिका के अवैध मुस्लिम आबादी को अमेरिका से खदेडा भी जा सकता है। डोनाल्ड ट्रम्प का मुस्लिम विरोधी नीति भी स्पष्ट है।
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प्रेषकः
आचार्य श्रीहरि
नई दिल्ली