संपादकीय: पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण—संतुलित नीति की जरूरत

भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की नीति एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। सरकार इसे ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा की बचत, किसानों की आय बढ़ाने और प्रदूषण कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बता रही है। दूसरी ओर, विशेषज्ञों का एक वर्ग इसके दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर गंभीर सवाल उठा रहा है। ऐसे में आवश्यकता है कि इस विषय पर भावनाओं से नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर विचार किया जाए।

भारत अपनी पेट्रोलियम आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से कच्चे तेल के आयात में कमी आ सकती है, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी। साथ ही गन्ना, मक्का और अन्य फसलों से बनने वाले एथेनॉल की मांग बढ़ने से किसानों को अतिरिक्त बाजार मिल सकता है। पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी एथेनॉल मिश्रित ईंधन कार्बन उत्सर्जन कम करने में सहायक माना जाता है।

लेकिन इस नीति के कुछ गंभीर पक्ष भी हैं। यदि खाद्यान्न फसलों का उपयोग बड़े पैमाने पर ईंधन बनाने में होने लगे, तो खाद्य सुरक्षा और कृषि भूमि के उपयोग पर दबाव बढ़ सकता है। गन्ने जैसी फसलें पहले से ही अत्यधिक जल खपत के लिए जानी जाती हैं। ऐसे में एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के लिए इनकी खेती को प्रोत्साहन देना जल संकट वाले क्षेत्रों में नई समस्याएं पैदा कर सकता है।

एक अन्य चिंता वाहन उपभोक्ताओं से जुड़ी है। सभी पुराने वाहन अधिक एथेनॉल मिश्रण के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं हैं। यदि ईंधन की गुणवत्ता, वाहन की अनुकूलता और रखरखाव को लेकर पर्याप्त जागरूकता नहीं होगी, तो उपभोक्ताओं को अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है। इसलिए वाहन निर्माताओं, तेल कंपनियों और सरकार के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।

स्पष्ट है कि एथेनॉल मिश्रण न तो कोई चमत्कारी समाधान है और न ही पूरी तरह अनुचित नीति। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार उत्पादन के लिए टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा दे, खाद्य सुरक्षा से समझौता न करे, जल संसाधनों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित करे और उपभोक्ताओं के हितों की भी रक्षा करे।

भारत को स्वच्छ और आत्मनिर्भर ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ना ही होगा, लेकिन हर नीति का मूल्यांकन उसके दीर्घकालिक आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों के आधार पर होना चाहिए। एथेनॉल मिश्रण की नीति भी इसी कसौटी पर परखी जानी चाहिए। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाकर ही यह पहल देश के लिए वास्तव में लाभकारी सिद्ध हो सकती है।

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