भुवनखाल की कुटिया से विधानसभा तक : संघर्ष, समर्पण और साधना की प्रेरक गाथा

भुवनखाल की कुटिया से विधानसभा तक : संघर्ष, समर्पण और साधना की प्रेरक गाथा

धोलाई से भाजपा विधायक अमिय कांति दास के एक अज्ञात और साधारण से गाँव की कुटिया से निकलकर विधानसभा तक पहुँचने की यह कहानी किसी कल्पना-कथा से कम नहीं है। जिन लोगों का जन्म विशेष सुविधाओं और संसाधनों के बीच होता है, उनके लिए सफलता की ऐसी मंजिलें शायद सामान्य प्रतीत हों, लेकिन हमारे जैसे साधारण लोगों के लिए, जिनका जीवन रोज़मर्रा के संघर्षों से घिरा रहता है, यह यात्रा किसी चमत्कार से कम नहीं लगती।

आज जब पीछे मुड़कर बीते दिनों को देखता हूँ, तो आँखों के सामने संघर्ष, त्याग और तपस्या से भरे अनेक दृश्य उभर आते हैं। वह समय, जब ‘अपेक्षा और उपेक्षा’, ‘स्नेह और अवहेलना’, ‘स्वागत और अस्वीकृति’ के बीच तुम्हें और तुम्हारे साथियों को कठिन रास्तों पर निरंतर आगे बढ़ना पड़ा।

मैंने अपनी आँखों से देखा है कि कैसे कुछ लोगों ने केवल तुम्हारे प्रति प्रेम और विश्वास के कारण, बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के, हर परिस्थिति में तुम्हारा साथ दिया। उनके त्याग, धैर्य और समर्पण ने इस संघर्ष को शक्ति प्रदान की। तुम्हें सफलता के इस मुकाम तक पहुँचाने के लिए उन्होंने स्वयं अनेक बार हार स्वीकार की, तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान बनाए रखने के लिए अपने आँसू छिपाए, और तुम्हें तुम्हारा उचित सम्मान दिलाने के लिए न जाने कितने अपमान और उपेक्षाओं को मौन भाव से सहन किया।

दूसरी ओर, तुमने भी अपने शुभचिंतकों को पीड़ा से बचाने के लिए असंख्य कष्टों और मानसिक यातनाओं को अपने भीतर समेटे रखा और हर परिस्थिति में चेहरे पर मुस्कान बनाए रखी। इस पूरे संघर्ष, समर्पण और साधना का मैं एक मौन साक्षी रहा हूँ।

मुझे विश्वास है कि यह इतिहास समय के स्वर्णिम पृष्ठों पर सदैव अंकित रहेगा और आने वाली पीढ़ियों के संघर्षशील एवं जुझारू मनोबल को प्रेरणा देता रहेगा। आज इस अवसर पर मैं उन सभी देवतुल्य शुभचिंतकों, कार्यकर्ताओं और सहयोगियों को नमन करता हूँ, जिनके अथक परिश्रम, निष्ठा और समर्पण ने इस साधना को सफल बनाया।

ईश्वर ने हम सभी की प्रार्थनाएँ सुनी हैं। उन्होंने अपनी असीम कृपा बरसाई है। दिव्य त्रयी का आशीर्वाद सदैव आपके साथ है। भय का कोई कारण नहीं, क्योंकि ईश्वर ने आपको एक विशेष उद्देश्य के लिए चुना है।

अब समय है कि पूर्ण उत्साह, निष्ठा और समर्पण के साथ ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ के महान मंत्र को हृदय में धारण कर आगे बढ़ा जाए। “तन समर्पण, मन समर्पण, धन समर्पण” की भावना से प्रेरित होकर समाज, राष्ट्र और मानवता की सेवा में स्वयं को समर्पित किया जाए।

संघ के शताब्दी वर्ष में एक स्वयंसेवक की ओर से यही अपेक्षा, यही प्रार्थना और यही शुभकामना है कि यह यात्रा निरंतर जनसेवा, राष्ट्रनिर्माण और मूल्यों की प्रतिष्ठा के पथ पर आगे बढ़ती रहे।

श्रीमती मुक्ता चक्रवर्ती, शिलचर (असम)

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