छात्रों की भावनाओं से खिलवाड़ करते कोचिंग संस्थान?
देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का बाजार लगातार विस्तार कर रहा है। मेडिकल, इंजीनियरिंग, सिविल सेवा और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के सपने दिखाकर कोचिंग संस्थान करोड़ों रुपये का कारोबार खड़ा कर चुके हैं। इसी संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार अंजना ओम कश्यप की हालिया टिप्पणी ने एक बार फिर शिक्षा के व्यावसायीकरण और कोचिंग संस्कृति पर बहस छेड़ दी है।
आज कोचिंग संस्थान केवल शिक्षा देने तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि वे एक बड़े उद्योग का रूप ले चुके हैं। आकर्षक विज्ञापन, टॉपर्स की तस्वीरें, चयन प्रतिशत के बड़े-बड़े दावे और सफलता की गारंटी जैसे प्रचार विद्यार्थियों और अभिभावकों को प्रभावित करते हैं। लेकिन इन चमकदार दावों के पीछे की वास्तविकता अक्सर अलग होती है। हजारों छात्रों में से कुछ सफल छात्रों को सामने रखकर संस्थान अपनी ब्रांडिंग करते हैं, जबकि असफल छात्रों की संख्या कहीं अधिक होती है।
सबसे गंभीर चिंता छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर है। प्रतियोगिता की दौड़ में कई विद्यार्थी अत्यधिक दबाव, तनाव और अवसाद का सामना करते हैं। अनेक परिवार अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च कर बच्चों को कोचिंग दिलाते हैं। ऐसे में यदि अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता, तो छात्र स्वयं को असफल समझने लगते हैं। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक चिंता का विषय है।
यह भी सच है कि सभी कोचिंग संस्थानों को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता। अनेक संस्थान गुणवत्तापूर्ण मार्गदर्शन देकर छात्रों के सपनों को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। समस्या तब पैदा होती है जब शिक्षा सेवा की जगह केवल व्यवसाय बन जाती है और छात्रों की आकांक्षाओं को लाभ कमाने का साधन समझ लिया जाता है।
सरकार और नियामक संस्थाओं को कोचिंग उद्योग के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाने चाहिए। भ्रामक विज्ञापनों, चयन प्रतिशत के गलत दावों और अत्यधिक शुल्क पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है। साथ ही स्कूल और कॉलेज स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है, ताकि छात्रों की कोचिंग पर निर्भरता कम हो सके।
अंततः शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास कराना नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का निर्माण करना है। यदि कोचिंग संस्थान छात्रों के सपनों को संवारने के बजाय उनकी भावनाओं और आशाओं का व्यापार करने लगें, तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी होगी। समाज, अभिभावकों, सरकार और स्वयं कोचिंग संस्थानों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि विद्यार्थियों के भविष्य के साथ कोई खिलवाड़ न हो।