तारीख पर तारीख: क्या न्याय व्यवस्था आम आदमी की कब्रगाह बन गई है?
भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, लेकिन एक कड़वा सच यह भी है कि इस लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ—न्यायपालिका—आज आम आदमी के लिए उम्मीद से ज्यादा इंतजार और पीड़ा का प्रतीक बनती जा रही है। अदालतों में वर्षों नहीं, बल्कि दशकों तक मुकदमे लटकते रहते हैं। न्याय की आस में लोग अपनी जवानी, संपत्ति और कभी-कभी पूरी जिंदगी गंवा देते हैं। कई बार तो फैसला आने से पहले ही वादी या प्रतिवादी इस दुनिया से विदा हो जाता है।
“तारीख पर तारीख” कभी फिल्मी संवाद था, लेकिन आज यह भारतीय न्याय व्यवस्था की वास्तविक पहचान बन चुका है। सवाल यह है कि यदि न्याय पाने में 20-30 साल लग जाएं, तो क्या उसे न्याय कहा जा सकता है? न्याय में अत्यधिक देरी वास्तव में न्याय से वंचित करना ही है।
देश की अदालतों में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय तक मामलों का पहाड़ खड़ा है। न्यायाधीशों की भारी कमी, जटिल कानूनी प्रक्रियाएं, बार-बार स्थगन, सरकारी विभागों की मुकदमेबाजी और संसाधनों का अभाव इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं। लेकिन आम नागरिक के लिए ये सब बहाने हैं। उसे तो सिर्फ न्याय चाहिए—वह भी समय पर।
विडंबना यह है कि गरीब और मध्यम वर्ग का व्यक्ति न्याय पाने के लिए अपना घर, जमीन और जीवनभर की जमा पूंजी तक खर्च कर देता है। वकीलों की फीस, बार-बार अदालतों के चक्कर और मानसिक तनाव उसे अंदर से तोड़ देते हैं। दूसरी ओर, प्रभावशाली और धनवान लोग कानूनी पेचीदगियों का लाभ उठाकर मामलों को वर्षों तक खींचते रहते हैं।
यह स्थिति केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। जब लोगों का न्याय व्यवस्था से विश्वास उठने लगता है, तब वे कानून की बजाय ताकत, प्रभाव या सड़क पर संघर्ष का रास्ता चुनने लगते हैं। यह किसी भी सभ्य समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है।
अब समय आ गया है कि न्यायिक सुधार केवल भाषणों और समितियों तक सीमित न रहें। न्यायाधीशों की संख्या बढ़ानी होगी, रिक्त पदों को तत्काल भरना होगा, अनावश्यक स्थगनों पर कठोर नियंत्रण लगाना होगा और तकनीक के माध्यम से मामलों के शीघ्र निपटारे की व्यवस्था करनी होगी। साथ ही, जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी कि वर्षों तक मुकदमे लंबित क्यों रहते हैं।
देश को यह स्वीकार करना होगा कि केवल न्यायालयों की भव्य इमारतें न्याय नहीं देतीं, बल्कि समय पर दिया गया फैसला ही वास्तविक न्याय है। यदि आम आदमी अदालत की चौखट पर जीवन गुजार दे और फैसला उसकी चिता के बाद आए, तो यह व्यवस्था की सफलता नहीं, उसकी सबसे बड़ी विफलता है।
न्याय में देरी अब केवल एक समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय है। क्योंकि जिस देश में न्याय देर से मिलता है, वहां लोकतंत्र धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है। जनता अब जवाब चाहती है—आखिर कब तक मिलेगी सिर्फ “तारीख पर तारीख”?