भारतीय सनातन संस्कृति परंपरा में हिंदू समाज गाय को पूज्य मां मानता है।
पूज्य संत श्री प्रभु दत्त ब्रह्मचारी जी ने कहा हिंदुत्व की रक्षा के लिए बिना किसी प्रकार के प्रदर्शन के द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जितना रचनात्मक कार्य कर रहा है उतना कार्य कोई दूसरी संस्थान नहीं करती।
एक स्वयंसेवक ने उनसे प्रश्न पूछा महाराज जी हिंदुत्व की परिभाषा क्या है? पूज्य महाराज जी ने बिना संकोच किया सीधा उत्तर दिया जो गाय को माता माने वही हिंदू है। फिर स्वयंसेवक ने कहा महाराज जी यह तो अधूरी परिभाषा हुई – पूज्य महाराज जी ने कहा हिंदू शब्द कि इससे बढ़कर सर्वांग सुंदर दूसरी कोई परिभाषा हो ही नहीं सकती।
वीर सावरकर जी ने हिंदुत्व की परिभाषा के बारे में कहा है की सिंधु से लेकर समुद्र तक हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक इस हिंदुस्थान को जो अपनी मातृभूमि- पितृ भूमि माने वे हिंदू हैं । यह ठीक है जिनके पूर्वज यहां उत्पन्न हुए हैं और जिनके शरीर इसी भूमि के कणों से बना है वह माने ना माने उनकी मातृभूमि पितृ भूमि तो यह भारत भूमि है ही । गाय को जो उपयोगी पशु मानकर उसमें पूज्य भाव मातृ भाव रखता है वह कहीं भी हो हिंदू है।
हमारी सनातन संस्कृति के दो प्रतीक हैं भाषा और गाय भाषा सदा हमारे पूर्वजों की गुण गरिमा की स्मृति दिलाती है । यदि हम संस्कृत से अद्भुत भाषाओं को भूलकर विदेशी भाषाओं को ग्रहण करने लग जाए और गाय को एक दूध देने वाला उपयोगी पशु ही मानने लगे तो हम हिंदू नहीं रह सकते ।परम पूज्य प्रभु दत्त ब्रह्मचारी ने कहा है सनातन हिंदू धर्म संस्कृति को नष्ट करने के लिए विदेशी और विधर्मी शासकों ने देश में गोवंश की हत्या कराई।
हमारे भारतीय धर्म ग्रंथो में इतिहास में गाय की अनंत महिमा का वर्णन है।
भारतीय सनातन संस्कृति में ब्राह्मण, पंचभूत, अतिथि, आत्मा, देव प्रतिमा तथा गौ इन सब में भगवद बुद्धि से पूजा करने का विधान है । हमारा ऐसा कोई भी धार्मिक कार्य नहीं होगा जिसमें पंचगव्य, पंचामृत की आवश्यकता न हो और ऐसा कोई मंगलकार्य नहीं होगा। जिसमें गोदान न होता हो। बात-बात में गोदान त्रिवेणी में घुसते ही पांडा कहेगा। पहले गोदान कराईये । वर द्वार पर पहुंचता की कन्यादान के साथ-साथ गोदान कराया जाता है।
भारतीय सनातन संस्कृति उत्सव और पर्वों की संस्कृति है जिसमें समाज में गतिशीलता और नवजीवन का भाव बना रहता है। उत्सव उत्साह, आनंद एवं प्रेम का निर्माण करता है जो प्रेम श्री प्रभु के पास पहुंचने का सरलतम मार्ग है । उत्सव, पर्व, त्यौहार निर उद्देश्य नहीं होते हैं। वे किसी न किसी घटना, कथा, कहानी के साथ समाज में पवित्र संदेश देने का कार्य करते हैं। वैसे तो भारत में प्रत्येक दिन कोई न कोई पर्व त्यौहार ,जन्मदिन, पुण्यतिथि या इतिहास की विभिन्न घटनाओं का साक्षी है ,सनातन परंपरा से कुछ पर्व समाज में सहज और स्वाभाविक रूप से चले आ रहे हैं । भारतीय सनातन संस्कृति गौ संस्कृति का ही स्वरुप है विभिन्न पर्वों पर गोवंश का स्मरण पूजन और उसका विशेष महत्व होता ही है।
जैसे:- मकर संक्रांति पर्व दान पुण्य का सामाजिक समरसता का गायों के लिए हरा चारा का दान करना,
महाशिवरात्रि पर्व भगवान भोले शंकर के नन्दी व गोवंश के रक्षार्थ रक्षा का संकल्प, गोरु बिहू सुख समृद्धि का पर्व, गुरु पूर्णिमा ज्ञान समर्पण का पर्व ,बलराम जयंती कृषि स्वदेशी अहिंसक संजीव जैविक कृषि करने का संकल्प, श्री कृष्ण जन्माष्टमी गौ सेवा- गौरक्षा- गौसंवर्धन का पर्व, पोला पर्व गोवंश से समृद्धि का आशीर्वाद, गोवत्स द्वादशी ( वसु बारस) पर्व श्री विष्णु के प्रकट स्वरूप की तरंगे सक्रिय होकर ब्रह्मांड में आती हैं इन तरंगों का विष्णु लोक से ब्रह्मांड तक वाहन विष्णु लोक की एक कामधेनु अवतरित करती है। गोपूजन से करने से व्यक्ति को इन तरंगों का लाभ होता है परिवार के दीर्घायु की शुभकामनाएं की जाती है। और गाय बछड़े को सजाकर उसकी पूजा की जाती है , गोवर्धन पूजा ग्वाल वालों, गोपालक, कृषि कर्ता किसान की रक्षा का संकल्प यानी गोवंश का वर्धन और गोबर + धन का महत्त्व इसी दिन प्रतिष्ठित हुआ। गोवर्धन पर्वत ग्वालवाल समाज के माध्यम से श्री प्रभु ने उठाया था। समाज में गोबर के गोवर्धन जी बनाकर पूजन करना स्वस्थ गोवंश आधारित खेती करने का संकल्प लेना होता है। गोपाष्टमी का पर्व प्रात:काल गोवंश गाय ,बछड़ा, बछिया, बैल, नन्दी को स्नान कराकर सजाकर सारे अंगों पर मेहंदी रोली हल्दी के थोप लगाए जाते हैं, यज्ञ हवन कर गौ पूजन कर गुड जलेबी वस्त्र और जल से पूजा आरती कर गौ-ग्रास खिलाकर कर परिक्रमा सभी मनोकामनाएं पूर्ण के लिए की जाती और गाय का धार्मिक आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व बताया जाता है। गोपालकों का सम्मान किया जाता है।
गाय सनातन धर्म को प्रदान करती सुखी जीवन, उपजाऊ धरती, भूजल पूर्ति, मित्र जीवों की वृद्धि, जलवायु संतुलन, पौष्टिक आहार ,प्रभावी औषधि , सात्विक चेतन, धार्मिक गति ज्ञान एवं बुद्धि बल, स्वास्थ्य, समृद्धि किसान और सशक्त राष्ट्र। गाय के शरीर में समस्त देवताओं का वास है गाय की परिक्रमा करने से पृथ्वी की परिक्रमा के समान फल प्राप्त होता है। गाय के दर्शन से समस्त देवताओं का दर्शन होता है।
भारत देश का इतिहास साक्षी है की सनातनी हिंदुओं ने कभी गो हत्या के कलंक को सहन नहीं किया। छत्रपति शिवाजी जी ने 12 वर्ष की अल्प आयु में गौ हत्यारे का हाथ काट कर आजन्म गो भक्षकों मिटकर हिंद स्वराज की स्थापना की। सनातन धर्म संस्कृति की रक्षा के लिए महाराणा प्रताप ,गुरु गोविंद सिंह ,बंदा वीर बैरागी, गुरु तेग बहादुर सिंह, गुरु अर्जुन देव ने गौ हत्या के कलंक को मिटाने के लिए जीवन भर संघर्ष किया और अपने प्राणों की आहुति देकर देश धर्म मानबिंदुओं की रक्षार्थ अपना जीवन हम दिया। अंग्रेजों के शासनकाल में हिंदू जनमानस ने गौ हत्या के समय-समय पर संघर्ष करती रही सन 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल गौ हत्या के कलंक को मिटाने के लिए सैनिक मंगल पांडे ने फूका था ।
बंधुओं महाराणा प्रताप सिंह ने सनातन धर्म संस्कृति की रक्षा के लिए घास की रोटी स्वीकार की पर धर्म को बचाकर रखा परंतु बंधुओं तुम सब संकल्प लो गौमाता की रक्षा के लिए गो ग्रास निकालकर गौ सेवार्थ सहयोगी बनेंगे। महाभारत में तो गायों के पर्व भरे पड़े हैं कहा जाता है कि जिस राजा के पास जितना गोवंश होता था वह उतना गौरवशाली माना जाता था ऋषियों का परम धन गौमाता ही थी इसलिए यह सनातन भारत देश ऋषि कृषि प्रधान देश कहलाता है । गौरक्षा से ही हिंदुत्व और सनातन धर्म की रक्षा है संस्कृति की रक्षा है ।
पूज्य देवरहा बाबा कहते थे कि गाय के पृष्ठ भाग में ब्रह्मा जी का मुख में शिव जी का और रोम रोम में ऋषि महर्षि देवताओं का वास हैं गोमूत्र में गंगा जी और गोबर में लक्ष्मी जी का वास है गौमाता के जहां चरण पड़ते हैं वहां तीर्थ निवास करते हैं गौमाता के पैरों में लगी हुई रज को मस्तक धारन करने से तीर्थ जल में स्नान करने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।
जय गौमाता
उमेश चंद्र पोरवाल
विहिप – गोरक्षा
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