शीर्षक -:अहिंसा

हिंसा से बढ़ती हिंसा, भावना होती ख़राब,
जटिल होता जीवन, अहिंसा मात्र जवाब ,
प्रेम,सौहार्द लोप होते,अपनापन करता विलाप,
सुकून ना मिल पाता कदापि,हिंसा देती संताप ,
अहिंसा मोड़ हैं लम्बा,मिट जाते सारे विकार ,
ना फिसलन इस राह में ,ना होता है अंधकार ,
अमोघ साधन हैं सुख का ,एक मात्र अहिंसा ,
सुसुप्त चेतना में ही करता रहता मानव हिंसा,
सापेक्षता,सहअस्तित्व,अहिंसा के दो अंग,
सृष्टा अनेकान्त को ,कर देती हिंसा भंग,
उद्वेग रूप हैं हिंसा का ,ना मिल पाता सुख वहाँ ,
सुख ही सुख बरसे ,होता अहिंसा भाव जहां  ,
—स्वरचित—
सुषमा पारख

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