हिंदी दिवस समारोह -2023 एवं तृतीय अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन, श्री शिव छत्रपति स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स, बालेवाड़ी, पुणे, महाराष्ट्र से विशेष रिपोर्ट प्रेषित, 14 सितंबर:
यह हम सभी भारतवासियों, हिंदी भाषियों, हिंदी प्रेमियों, हिंदी के शिल्पकार, हिंदी से जुड़े सभी व्यक्तियों के लिए एक शानदार अवसर है। दरअसल 12-13 सितंबर 2023 या उससे भी एक दो दिन पहले देश के कोने कोने से राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार के विभिन्न अधिकारीगण, विभिन्न मंत्रालयों के अधिकारीगण, केंद्र सरकार के विभिन्न कार्यालयों से पधारे गणमान्य व्यक्ति, नराकास(नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति) सचिव, क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालयों से पधारे विभिन्न अधिकारीगण, कर्मचारीगण, हिंदी अधिकारी, हिंदी के बड़े बड़े साहित्यकार, हिंदी विद्वान, हिंदी प्रेमी, हिंदी अनुवादक आजकल श्री छत्रपति स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स, बालेवाड़ी,पुणे में जो कि महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी कहलाती है, में हिंदी दिवस समारोह -2023 एवं तृतीय अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन 2023 में पधारे हुए हैं। कारण बहुत ही खास व विशेष है। मैं स्वयं भी हिंदी भाषा से जुड़ा हुआ हूं और इंस्पेक्टर हिंदी अनुवादक हूं, इसलिए मैं स्वयं भी अपने डिपार्टमेंट के अनेक मित्रों के साथ आजकल तृतीय अखिल भारतीय स्तरीय हिंदी सम्मेलन के लिए पुणे में हूं। पुणे, जो कि पूरब का आक्सफोर्ड कहलाता है, वास्तव में एक शानदार शहर है। अवसर विशेष है, इसलिए हम सभी इन दिनों इस खूबसूरत शहर में यहां बड़ी संख्या में जुटे हैं। जानकारी देना चाहूंगा कि इस बार हिंदी एवं तृतीय अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन संयुक्त रूप से श्री शिव छत्रपति शिवाजी काम्प्लेक्स, बालेवाड़ी, पुणे, महाराष्ट्र में 14 एवं 15 सितंबर 2023 को आयोजित किया जा रहा है।अपनी प्राकृतिक सुंदरता, आईटी और एजुकेशनल हब के लिए प्रसिद्ध और महान मराठा सम्राट शिवाजी का जन्म स्थान पुणे में अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन का आयोजन होना बहुत ही महत्वपूर्ण है और हमें यहां पहुंच कर बहुत ही गर्व महसूस हो रहा है।बहरहाल ,पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि प्रथम अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन का आयोजन वाराणसी में किया गया था। यहां पाठकों को यह भी जानकारी देना चाहूंगा कि माननीय गृह एवं सहकारिता मंत्री जी की अध्यक्षता में राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय द्वारा हिंदी दिवस 2022 एवं द्वितीय अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन का भव्य आयोजन सूरत, गुजरात में किया गया था। पिछले वर्ष यानी कि वर्ष 2022 में भी मैंने अपने अनेक मित्रों के साथ द्वितीय अखिल भारतीय स्तर के हिंदी सम्मेलन में सूरत में सहभागिता की थी। हमारे साथ करीबन दस साढ़े दस हजार हिंदी प्रेमी पिछले वर्ष हिंदी सम्मेलन के साक्षी बने थे। पिछले वर्ष हमें केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह, हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार व कवि प्रसून जोशी जी, गुजरात के मुख्यमंत्री श्री भूपेन्द्र पटेल, केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री श्री अजय कुमार मिश्रा, केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री श्री निशिथ प्रमाणिक, रेल राज्यमंत्री श्रीमती दर्शना जरदोश, शिक्षा राज्यमंत्री श्री राजकुमार रंजन सिंह और राजभाषा विभाग की सचिव सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। बहुत ही सुखद व अभूतपूर्व उपलब्धियां रहीं इस सम्मेलन का हिस्सा बनकर। मुझे याद है इस अवसर पर कंठस्थ 2.0 का भी विमोचन भी हुआ था, जो कि अनुवाद का एक शानदार टूल है। देश आजादी के पिचहतर वर्ष पूर्ण कर चुका है और देश में अमृतकाल चल रहा है। आजादी के इस अमृतकाल में हम सभी देशवासियों को यह संकल्प लेना चाहिए कि आने वाले 20-25 सालों में जैसा कि हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि हमारा देश किसी भी भाषाई लघुताग्रंथि से मुक्त होकर स्वभाषा का विकास करेगा और देश को दुनिया में सर्वोच्च स्थान पर पहुंचाएगा। वास्तव में यह बात बिल्कुल सच है कि जब तक हम इस बात का संकल्प नहीं करते कि हमारा शासन, प्रशासन, ज्ञान और अनुसंधान हमारी भाषाओं और राजभाषा में हो तब तक हम इस देश की क्षमताओं का उपयोग नहीं कर सकते। हम हिंद के वासी हैं और हिंदी हमारी मातृभाषा है, हमारे देश की राजभाषा है, हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम इसे राजभाषा से राष्ट्रभाषा बनाने के लिए अपने यथेष्ट प्रयास करें। पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि गाँधी जी ने एक बार एक इंटरव्यू के दौरान यह बात कही थी कि अगर मुझे खाली समय मिलेगा तो मैं वो समय सूत कातने के साथ राजभाषा हिंदी को सीखने व उसे समृद्ध बनाने में व्यतीत करूंगा, गाँधी जी ने रोजगार व स्वभाषा से देश को राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के दूरदर्शी संकल्प को आगे बढ़ाने का मार्ग दिखाया। हिंदी किसी भी भाषा की प्रतिस्पर्धी नहीं है, यह तो सभी भाषाओं को साथ लेकर चलने वाली अनूठी, वैज्ञानिक,सरल शब्दावली लिए हुए हमारे देश की मातृभाषा है। यह सभी भाषाओं को साथ लेकर चलने वाली भाषा है,जो कि सशक्त है,सहज है। सच तो यह है कि हिंदी के समृद्ध होने से देश की सभी स्थानीय भाषाएं समृद्ध होंगी व स्थानीय भाषाओं की समृद्धि से हिंदी समृद्ध होगी। हिंदी हमारे देश की असली आत्मा है, हमारे देश का असली प्राण है। हमारे देश की संस्कृति, इतिहास, परंपराओं, साहित्य को हिंदी समेटे हुए है। आज भी हम मैकाले शिक्षा पद्धति को ढ़ो रहे हैं और स्वभाषा, निज भाषा, मातृभाषा, हमारी राजभाषा को स्वीकार नहीं कर रहे हैं, क्यों कि हमारा यह मानना है कि हम अंग्रेजी भाषा से ही आगे बढ़ सकते हैं, क्यों कि अंग्रेजी आज अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भाषा है। उल्लेखनीय है कि स्वामी दयानंद सरस्वती मानते थे कि वेदों के ज्ञान और उनके द्वारा सभी धर्मों पर किये गये विश्लेषण को केवल हिंदी भाषा के माध्यम से ही पूरे देश की जनता तक सरलता से पहुँचाया जा सकता है, इसलिए उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश को हिंदी में लिखने का काम किया। अंग्रेजी सीखना बुरा नहीं है, कोई भी भाषा सीखना कभी भी बुरा नहीं होता है लेकिन अपनी मातृभाषा का तिरस्कार करके दूसरी भाषाओं को अपनाना ग़लत है। अतः देश के युवाओं को यह चाहिए कि वे अपने अंदर पनप रही हीन भावना को दूर कर अपनी स्वभाषा व राजभाषा को स्वीकार करें और उन्हें समृद्ध बनाने में योगदान दें। कहना ग़लत नहीं है कि जब तक देश का युवा अपनी क्षमताओं के आधार पर अपनी भाषा में मौलिक चिंतन की अभिव्यक्ति नहीं करेगा, वो कभी भी अपनी क्षमताओं को पूर्णतया समाज के सामने नहीं रख सकता क्योंकि मौलिक चिंतन की अभिव्यक्ति स्वभाषा से अच्छी किसी भी भाषा में नहीं हो सकती। यह बात हमें अपने जेहन में रखनी चाहिए कि जब तक हमारा शासन, प्रशासन, ज्ञान और अनुसंधान पूर्णतया हमारी भाषाओं और राजभाषा में नहीं होगा तब तक हम इस देश की क्षमताओं का उपयोग नहीं कर सकते हैं। याद रखिए कि जब तक हम भाषा की हीनभावना को नहीं छोड़ देते तब तक इस देश की क्षमता का उपयोग नहीं हो सकता है।वास्तव में निज भाषा में या यूं कहें कि मातृभाषा में किसी भी व्यक्ति की अभिव्यक्ति हमेशा सटीक, अच्छी व शानदार होती है और यह हमारे मन की गहराइयों से आती है इसलिए इसकी स्वीकृति भी किसी भी अन्य भाषा की तुलना में ज्यादा होती है। हमें यह चाहिए कि हम घर की दैनिक बातचीत में, आम बोलचाल की भाषा में हमेशा अपनी स्वभाषा, मातृभाषा का ही अधिकतम प्रयोग करें। हम अपने बच्चों को भी स्वभाषा जरुर सिखाएं क्योंकि स्वभाषा से ही कोई भी बच्चा देश के इतिहास व संस्कृति को जानकर देश की जड़ों से जुड़ सकता है। यह अत्यंत काबिलेतारिफ और महत्वपूर्ण है कि आज हमारे देश का गृह मंत्रालय का राजभाषा विभाग पूरी तत्परता और तन्मयता के साथ हिन्दी को मज़बूत करने की दिशा में लगातार काम कर रहा है। हिंदी लगातार आगे बढ़ रही है। यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि शब्दों का निर्माण कभी भी किसी प्रयोगशाला में नहीं होता। शब्द हमेशा आम बोलचाल की भाषा से आते हैं। ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं। यदि हमें हिंदी का विकास करना है तो हमें हमारे हिंदी के शब्दकोश को वृह्द से वृहदत्तर बनाना पड़ेगा। संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित बाईस भारतीय भाषाओं के साथ मिलकर उनके साथ सामंजस्य स्थापित कर आगे बढ़ना होगा। याद रखिए कि हमारा देश भाषाई रूप से बहुत समृद्ध है और इन भाषाओं ने हमारी संस्कृति, परंपरा और साहित्य को संभाल कर रखा है। जब तक हम भाषाओं के सहअस्तित्व को स्वीकार नहीं करते हैं तब तक अपनी भाषा में अपना देश चले इसको हम सिद्ध नहीं कर सकते हैं, हर भाषा और बोली को जिंदा रखना और उन्हें समृद्ध करना हमारा लक्ष्य होना चाहिए। जानकारी देना चाहूंगा कि हमारे संविधान के अनुच्छेद 351 में प्रावधान है कि यह संघ का कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा के प्रसार को बढ़ावा दे, इसे विकसित करे ताकि यह भारत की समग्र संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में काम कर सके और इसकी सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। दूसरे शब्दों में कहें तो संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहाँ आवश्यक या वांछनीय हो वहाँ उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे। पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सबसे ज़्यादा ज़ोर इस बात पर दिया गया है कि प्राथमिक और उससे आगे की शिक्षा स्वभाषा में और अनुसंधान, कोर्ट, मेडिकल, विज्ञान, तकनीक और इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रम स्वभाषा में रुपांतरित हों। हाल फिलहाल,वास्तव में यह बहुत ही काबिलेतारिफ और महत्वपूर्ण है कि अब देश में ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा नीति का आगमन हो चुका है जिससे देश की हर भाषा को उचित सम्मान और श्रेय मिल सकेगा। अब तक विभिन्न राजनीतिक दल भाषा के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते रहे हैं, और अपना वोट बैंक पक्का करते रहे हैं,लेकिन अब उनकी दाल नहीं गल सकेगी। आज मातृभाषा में शिक्षा भारत में छात्रों के लिए न्याय के एक नये रूप की शुरुआत कर रही है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने एक बार यह कहा था, कि ‘भारतीय संस्कृति एक विकसित शत दल कमल की तरह है, जिसकी प्रत्येक पंखुड़ी हमारी प्रादेशिक भाषाएं हैं। किसी भी पंखुड़ी के नष्ट होने से कमल की शोभा नष्ट हो जाएगी। मैं चाहता हूं कि प्रादेशिक भाषाएं रानी बनकर प्रांतों में विराजमान रहें और उनके बीच हिंदी मध्यमणि बनकर विराजे।’ वास्तव में मातृभाषा किसी भी व्यक्ति विशेष के लिए केवल और केवल संवाद का जरिया या माध्यम ही नहीं होती है अपितु मातृभाषा वह सशक्त माध्यम होती है जिससे हमारी समृद्ध विरासत भी जुड़ी होती है। वास्तव में मातृभाषा का तिरस्कार अपने ऐतिहासिक ज्ञान , अपने देश की संस्कृति और गौरव को नष्ट करने के समान ही है। हमें यह बात अपने जेहन में रखनी चाहिए कि राष्ट्रीय एवं सामाजिक जागृति मातृभाषा प्रचार के बिना नहीं हो सकती है। सच तो यह है कि मनुष्य का मनोविकास अथवा विभिन्न मनोवृत्तियों का प्रसार मातृभाषा के द्वारा ही संभव हो सकता है। वह शक्ति केवल मातृभाषा में निहित है जो हमारे हृदय में छिपे हुए भावों, विचारों, उद्वेगों, अभिव्यक्ति और हृदय में छिपे रहस्यों को ठीक-ठाक रूप देकर शब्दों में ढाल सकता है। बहरहाल, आज हम सभी यानी कि 14 सितंबर 2023 को पुणे में यहां इस शानदार कार्यक्रम के साक्षी बने हैं। कार्यक्रम का उद्घाटन सत्र आज यानी कि 14 सितंबर को प्रातः 1100 बजे मुख्य अतिथि श्री हरिवंश,उप सभापति, राज्यसभा,श्री भर्तृहरि महताब, उपाध्यक्ष, संसदीय राजभाषा समिति,श्री अजय कुमार मिश्रा, माननीय गृह राज्य मंत्री जी की उपस्थिति में हुआ। इस अवसर पर श्री अमित शाह, माननीय गृह एवं सहकारिता मंत्री, भारत सरकार का विडियो संदेश भी प्रसारित किया गया। अपने विडियो संदेश में माननीय मंत्री श्री अमित शाह जी ने यह बात कही कि हिंदी हमारी सांस्कृतिक धरोहर है, हिंदी की किसी भी भाषा से कोई भी प्रतिस्पर्धा नहीं है। देश की स्वराज प्राप्ति से लेकर अब तक हिंदी ने देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बहरहाल,आज 14 सितंबर 2023 को कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में राजभाषा 2047 विकसित भारत का भाषाई परिदृश्य (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सहित), हिंदी के विकास में मीडिया की भूमिका और रोजगार के बढ़ते अवसर: हिंदी के परिप्रेक्ष्य में गुरूवार को विभिन्न माननीय अतिथिगणों द्वारा विस्तार से प्रकाश डाला गया। कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रगान के साथ की गई।इस अवसर पर विभिन्न राजभाषा पुरस्कार राजभाषा गौरव पुरस्कार, राजभाषा कीर्ति पुरस्कार 2022-23 आदि भी दिए गए तथा विभिन्न पैरामिलिट्री फोर्सेज, विभिन्न प्रकाशनों यथा राजकमल प्रकाशन,गीता प्रेस प्रकाशन, आज का आनंद समाचार पत्र, एनबीटी प्रकाशन द्वारा पुस्तकों की स्टालें भी लगाई गई। इस अवसर पर हिंदी शब्दकोश ‘शब्द सिंधु’ के द्वितीय संस्करण का भी डिजीटल रूप से अनावरण/विमोचन किया गया, जिसमें चौदह भारतीय भाषाओं के शब्दों को समाहित किया गया है। हिंदी शब्द सिंधु के प्रथम संस्करण में 51000 शब्दों को समाहित किया गया था लेकिन वर्तमान में इसके द्वितीय संस्करण में कुल 351000 शब्दों को शामिल किया गया है। इस अवसर पर राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय की स्मारिका राजभाषा भारती, डीआरडीओ की पत्रिका अतुल्य कला,
का विमोचन भी किया गया। तृतीय अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन के दौरान केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान,आगरा के दो प्रकाशनों का भी विमोचन किया गया, जिसमें एक प्रकाशन हिंदी मराठी का शामिल किया गया है। इस अवसर पर राजभाषा नियम पुस्तिका का भी लोकार्पण किया गया। जानकारी देना चाहूंगा कि इससे पहले इसे 1996 में जारी किया गया था और वर्तमान में इस पुस्तिका में जुलाई 2023 तक के राजभाषा से जुड़े विभिन्न आदेशों, सूचनाओं और निर्देशों का संकलन किया गया है।कार्यक्रम के दौरान स्मृति आधारित टूल कंठस्थ 2.00 को ई आफिस के साथ इंटीग्रेट करने का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम के दौरान देश के विभिन्न राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों से करीबन 8 से 10 हजार राजभाषा हिंदी से जुड़े लोग तथा राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय भारत सरकार की सचिव श्रीमती अंशुली आर्या, डॉ मीनाक्षी जौली, संयुक्त सचिव, राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय भारत सरकार भी उपस्थित रहे।
(विशेष रिपोर्ट) सुनील महाला
कालमिस्ट व युवा साहित्यकार, उत्तराखंड।
मोबाइल 9828108858