संस्कृत भारती के 10 दिवसीय शिविर का समापन समारोह आयोजित

शिव कुमार शिलचर 21 जुलाई : आज शिलचर के तारापुर स्थित प्रणवानंद विद्यामंदिर में संस्कृत भारती पूर्वोत्तर भारत एवं संस्कृत भारती दक्षिण असम प्रांत द्वारा 12 दिवसीय आवासीय शिविर (प्रशिक्षण वर्ग) का समापन कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह बारह दिवसीय शिविर विगत 11 जुलाई को प्रारंभ हुई थी। आज के इस समापन समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित थे कुमार भास्कर बर्मन संस्कृत प्राच्य बिश्वविद्यालय नलबाड़ी के कुलपति प्रफेसर प्रह्लाद आर जोशी, साथ ही मुख्य अतिथि के रूप में आनेवाले थे असम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर  राजीव मोहन पंत लेकिन किसी कारण वश वे उपस्थित नही हो पाए। उन्होंने अपना आशीर्वचन संदेश के माध्यम से प्रेषित कर दिया। विशेष अतिथियों में उपस्थित थे संस्कृत भारती पूर्वोत्तर भारत के अध्यक्ष डॉक्टर शंकर भट्टाचार्य, दक्षिण असम प्रांत के अध्यक्ष डॉक्टर तपोमय भट्टाचार्य। कार्यक्रम में उपस्थित अन्य प्रमुख व्यक्तियों में पूर्वोत्तर भारत क्षेत्र के संयोजक डॉक्टर रंजीत तिवारी, दक्षिण असम प्रांत के प्रांत मंत्री गौतम चक्रवती, प्रांत प्रचार प्रमुख डॉक्टर गोविंद शर्मा व प्रांत संपर्क प्रमुख श्री केशव लुटिल, संघ के वरिष्ठ प्रचारक शशि जी, प्रोफेसर शांति पोखरेल, नरेश बरेठा, बुद्ध देव आदि शामिल थे। सर्व प्रथम सभी मंचासीन अतिथियों का परिचय कराया गया। तत्पश्चात मंचासीन अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। इस बारह दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में लगभग सौ से अधिक शिक्षक एवं शिक्षार्थी भाग लिए। आज के इस समापन समारोह में कुछ शिक्षार्थियों ने अपना अनुभव भी व्यक्त किए जो उनको ग्यारह दिनों में सीखने को मिला। जो आगे जाकर के उन लोगो को किस प्रकार संस्कृत संभाषण शिविर चलाना है।  किस प्रकार  संस्कृत सिखाया जाता है। ताकि अपने आसपास के क्षेत्र व गांवों में ज्यादा से ज्यादा संस्कृत भाषा का प्रचार प्रसार हो सके। इस विषय पर विस्तृत रूप से चर्चा किया गया। प्रशिक्षार्थियों ने सीखा है और उनलोग ने बच्चन भी दिया हे की वे लोग जाकर अपने अपने क्षेत्रों में संस्कृत संभाषण शिविर करेंगे। मुख्य वक्ता प्रह्लाद जोशी ने कहा की उन्होंने भी ऐसे संभाषण शिविर में भाग लिया था। धीरे धीरे संस्कृत का प्रचार प्रसार करते करते यहां तक पहुंचे है और हमारा भी कर्तव्य है की हमे ज्यादा से ज्यादा संस्कृत का प्रचार प्रसार व संस्कृत पढ़ना चाहिए और लोगो को प्रेरित करना चाहिए की संस्कृत उनकी मातृभाषा के लिए कितना आवश्यक है। सभी भाषाओं को समृद्ध कर देनेवाली भाषा संस्कृत है।

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