प्रो. डॉ. बी. के. एस. संजय
पद्मश्री सम्मानित | अध्यक्ष, एम्स गुवाहाटी | गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड धारक | अस्थि एवं मेरुदंड शल्य चिकित्सक
जब भी मानसून की बारिश लगातार और भयावह रूप लेने लगती है, मेरा मन अनायास ही वर्ष 1983 में लौट जाता है। उस समय मैं 27 वर्ष का था और नई दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में अस्थि रोग विभाग में वरिष्ठ रेजिडेंट के रूप में कार्यरत था। मेरा पैतृक गांव बुंदेलखंड के जालौन जिले में स्थित सैद नगर कोटरा है, जो बेतवा नदी से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर है।
बेतवा मेरे बचपन का अभिन्न हिस्सा रही है। मैंने उसी नदी में तैरना सीखा था और बचपन से ही उसके बढ़ते जलस्तर को देखा था। कई बार पीने का पानी भी बैलगाड़ी पर बड़े-बड़े ड्रमों में नदी से लाया जाता था। मानसून के दिनों में हम बार-बार नदी के किनारे जाकर देखते थे कि पानी कितनी तेजी से बढ़ रहा है। बाढ़ हमारे लिए कोई नई बात नहीं थी, लेकिन वर्ष 1983 ने जो भयावह दृश्य दिखाया, उसके लिए हम बिल्कुल तैयार नहीं थे।
मैं उस समय गांव में नहीं था। संचार के साधन आज की तरह विकसित नहीं थे—न मोबाइल फोन, न इंटरनेट और न ही विश्वसनीय दूरभाष व्यवस्था। बाढ़ की भयावहता की खबर मिली, लेकिन मैं केवल इंतजार कर सकता था। करीब दो सप्ताह बाद जब गांव पहुंचा तो सामने का दृश्य आज भी मेरी स्मृति में जीवित है।
हमारा दो मंजिला कच्चा मकान पूरी तरह ढह चुका था। जहां कभी हमारा घर खड़ा था, वहां मिट्टी का मलबा पड़ा था। गांव के अनेक परिवारों की स्थिति भी ऐसी ही थी। खेतों की फसल नष्ट हो गई थी, पूरे साल के लिए जमा किया गया अनाज बर्बाद हो गया और पशुधन भी प्रभावित हुआ। जिन लोगों के घर बच गए थे, उन्होंने अपने सीमित स्थान में दूसरों को भी जगह दी। कई परिवारों को अपने पशुओं के साथ ही रहना पड़ा।
मेरे माता-पिता के लिए यह केवल एक मकान का टूटना नहीं था। उस घर को बनाने में उनके जीवन के वर्षों की मेहनत लगी थी। उसे दोबारा खड़ा करने में लगभग दो दशक लग गए। अंततः मिट्टी के उस घर की जगह आरसीसी का मकान बनाया जा सका।
बाढ़ ने सिखाया—आपदा का सबसे बड़ा बोझ गरीब उठाता है
1983 की उस बाढ़ ने मुझे जीवन का एक ऐसा सबक दिया, जिसे मैं आज तक नहीं भूल पाया हूं—प्राकृतिक आपदाओं का सबसे अधिक और सबसे लंबा असर गरीब परिवारों पर पड़ता है।
जिस परिवार के पास सीमित संसाधन हों, उसके लिए घर, फसल और पशुधन का एक साथ नष्ट हो जाना केवल तत्काल आर्थिक नुकसान नहीं होता। इससे वर्षों की मेहनत मिट जाती है और परिवार फिर से गरीबी के चक्र में पहुंच सकता है।
इसीलिए जुलाई 2026 में जब असम में बाढ़ का कहर देखता हूं तो प्रभावित लोग मुझे अजनबी नहीं लगते। डूबे हुए घर, विस्थापित परिवार और भयभीत बच्चों को देखकर मुझे अपना गांव और वर्ष 1983 याद आता है। मैं जानता हूं कि बाढ़ को दूर से देखना और अपने घर के खंडहर के सामने खड़ा होना—इन दोनों अनुभवों में कितना अंतर है।
बाढ़ केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बड़ा जनस्वास्थ्य संकट भी है
बाढ़ का संकट पानी उतरने के साथ समाप्त नहीं होता। बाढ़ के बाद दूषित पेयजल और खराब स्वच्छता के कारण दस्त, टाइफाइड, हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। जगह-जगह जमा पानी मच्छरजनित रोगों को बढ़ावा दे सकता है। दूसरी ओर, बाढ़ के कारण स्वास्थ्य केंद्रों, दवाओं और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच भी बाधित हो सकती है।
किसी व्यक्ति का घर खोना केवल चार दीवारों का खोना नहीं है। उसके साथ सुरक्षा, निजता, सामान, दस्तावेज, यादें और जीवनभर की जमा पूंजी भी चली जाती है। पानी उतर जाने के बाद भी इन मानसिक और सामाजिक घावों को भरने में लंबा समय लगता है।
पूर्वोत्तर की सुंदरता के साथ उसकी भौगोलिक नाजुकता को भी समझना होगा
पिछले एक वर्ष में मुझे मणिपुर और सिक्किम को छोड़कर लगभग पूरे पूर्वोत्तर भारत में जाने का अवसर मिला। इन यात्राओं ने मुझे इस क्षेत्र की अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ इसकी भौगोलिक और भूगर्भीय संवेदनशीलता को भी करीब से समझने का अवसर दिया।
हम अक्सर पहाड़ों को ठोस चट्टान समझते हैं, लेकिन युवा हिमालयी क्षेत्र का बड़ा हिस्सा मिट्टी, बजरी और अपक्षय से बनी अपेक्षाकृत ढीली सामग्री से निर्मित है। भारी वर्षा ऐसी ढलानों को तेजी से कमजोर कर सकती है।
जब पहाड़ों में सड़क, भवन या अन्य आधारभूत संरचनाएं बनाने के लिए गहरी कटाई की जाती है और ढलानों को लगभग सीधा छोड़ दिया जाता है, तो प्राकृतिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इसके परिणाम केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहते। मिट्टी, पत्थर और मलबा नीचे बहकर नालों और नदियों में पहुंचता है।
ब्रह्मपुत्र को समझे बिना असम की बाढ़ को नहीं समझा जा सकता
ब्रह्मपुत्र विश्व की अत्यधिक गाद वहन करने वाली प्रमुख नदियों में शामिल है। चीन की पीली नदी के बाद प्रति इकाई जलग्रहण क्षेत्र गाद परिवहन के मामले में इसका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। असम में पांडु के पास मानसून के दौरान इसके गाद प्रवाह का अनुमान लगभग 20 लाख मीट्रिक टन प्रतिदिन तक लगाया गया है।
मैदानी क्षेत्रों में नदी की गति कम होने पर यह विशाल मात्रा में गाद जमा करती है। इससे नदी की धाराएं और मार्ग लगातार बदलते रहते हैं तथा बाढ़ के पानी के फैलाव का स्वरूप भी बदलता रहता है। यही कारण है कि ब्रह्मपुत्र का स्वभाव लगातार परिवर्तनशील रहा है।
नदी को अपना रास्ता और स्थान चाहिए
मेरे अनुभव में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नदी को जगह चाहिए।
यदि कोई क्षेत्र दशकों या एक सदी पहले नदी के प्राकृतिक मार्ग या बाढ़ क्षेत्र का हिस्सा रहा है, तो केवल इसलिए यह मान लेना उचित नहीं कि नदी भविष्य में कभी वहां नहीं लौटेगी। नदियां स्वाभाविक रूप से अपना मार्ग बदलती हैं और पानी हमेशा कम प्रतिरोध वाले रास्ते की ओर बहता है।
जब हम नदी के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र को संकरा करते हैं, बाढ़भूमि पर अतिक्रमण करते हैं या जल निकासी के प्राकृतिक मार्गों को बाधित करते हैं, तो उसका असर किसी न किसी रूप में सामने आता है। नदी तल में गाद जमा होने और प्राकृतिक मार्ग संकरा होने पर अतिरिक्त पानी के लिए जगह कम हो जाती है और बाढ़ का दबाव दूसरे क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
विकास जरूरी है, लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं
असम और पूरे हिमालयी तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र में सड़कें, पुल, अस्पताल, विद्यालय और उद्योग जरूरी हैं। विकास को रोका नहीं जा सकता और न ही रोका जाना चाहिए। लेकिन विकास की दिशा तय करते समय भूगोल और पारिस्थितिकी की अनदेखी भी नहीं की जा सकती।
किसी भी बड़े निर्माण से पहले नदी के पुराने मार्ग, भूमि की स्थिरता, प्राकृतिक जल निकासी, बाढ़ क्षेत्र और पर्यावरणीय वहन क्षमता का वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए।
हमारे पारंपरिक समुदायों ने कई मामलों में प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने के बेहतर तरीके अपनाए थे। असम के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में आज भी कई पारंपरिक घर ऊंचे चबूतरों या खंभों पर बनाए जाते हैं। यह सदियों के स्थानीय अनुभव का परिणाम है। हालांकि अत्यधिक बाढ़ के सामने ऐसी व्यवस्थाएं भी कभी-कभी अपर्याप्त साबित हो सकती हैं।
जलवायु परिवर्तन के साथ हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ी है
अल्प अवधि में अत्यधिक बारिश की घटनाएं बाढ़ और भूस्खलन को और गंभीर बना सकती हैं। लेकिन हर आपदा का दोष केवल जलवायु परिवर्तन पर डाल देना उचित नहीं होगा।
वनों की कटाई, अनियोजित पहाड़ी कटान, जल निकासी में बाधा, बाढ़भूमि पर अतिक्रमण और कमजोर आधारभूत संरचनाएं—इन सभी को भी गंभीरता से देखना होगा।
हम हर बाढ़ को रोक नहीं सकते, लेकिन उसके कारण होने वाली मानवीय क्षति को काफी हद तक कम कर सकते हैं। इसके लिए वैज्ञानिक भूमि उपयोग योजना, समय पर चेतावनी प्रणाली, आर्द्रभूमियों और बाढ़भूमियों का संरक्षण, सुरक्षित पेयजल, मजबूत स्वास्थ्य सेवाएं, प्रभावी आपातकालीन व्यवस्था और पर्यावरण के अनुकूल आधारभूत संरचना आवश्यक है।
बेतवा से ब्रह्मपुत्र तक—दर्द वही है
जब मैं आज असम के बाढ़ प्रभावित लोगों को अपने घर और जीवन को फिर से खड़ा करते देखता हूं, तो मेरे विचार बार-बार वर्ष 1983 की बेतवा और अपने गांव के उस मलबे तक पहुंच जाते हैं।
मुझे अपने माता-पिता याद आते हैं, जिन्होंने सब कुछ खोने के बाद भी हिम्मत नहीं छोड़ी और धीरे-धीरे अपना जीवन फिर से बनाया।
बाढ़ का पानी उतर जाता है। सड़कें फिर बनती हैं। खेतों में दोबारा हरियाली आती है। घर फिर खड़े हो जाते हैं। लेकिन बाढ़ की स्मृतियां मन में लंबे समय तक बनी रहती हैं।
मेरे लिए 1983 की बेतवा और 2026 की ब्रह्मपुत्र के बीच 43 वर्षों का अंतर है, लेकिन मानवीय पीड़ा की कहानी बहुत अलग नहीं है। नदियां अलग हैं, भूगोल अलग है और पीढ़ियां भी अलग हैं—लेकिन अपना घर खोने का दर्द एक जैसा है।
इसीलिए मैं असम के बाढ़ प्रभावित लोगों के प्रति केवल सहानुभूति नहीं रखता—मैं उनके दर्द को महसूस करता हूं।
बेतवा से ब्रह्मपुत्र तक की मेरी यात्रा ने मुझे एक गहरी सीख दी है—
बाढ़ को हर बार रोका नहीं जा सकता, लेकिन बाढ़ से होने वाली मानवीय त्रासदी को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
इसके लिए हमें नदियों से लड़ने के बजाय उनके स्वभाव को समझना होगा। वैज्ञानिक योजना, पर्यावरणीय विवेक, जिम्मेदार विकास और संवेदनशील शासन के माध्यम से हम ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं, जिसमें नदियां भी बहती रहें और इंसानी जीवन भी सुरक्षित रहे।