हूलॉक गिब्बन संरक्षण पर सप्ताहभर का प्रशिक्षण सम्पन्न

गोलाघाट: असम के गोलाघाट जिले के मरियानी स्थित हूलोंगापार गिब्बन अभयारण्य में आरन्याक के गिब्बन संरक्षण केंद्र में पश्चिमी हूलॉक गिब्बन (Hoolock hoolock) के संरक्षण के लिए वन विभाग के अग्रिम पंक्ति के कर्मियों की क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से आयोजित सप्ताहभर का आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम सम्पन्न हो गया।

उन्नीस से पच्चीस सितंबर तक आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में असम, मेघालय और नागालैंड के पंद्रह वन रक्षकों ने हिस्सा लिया। पूर्वोत्तर के इन तीन राज्यों के अग्रिम पंक्ति के वन कर्मियों को शामिल करते हुए हूलॉक गिब्बन संरक्षण पर यह पहला समर्पित संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम था।

जैव विविधता संरक्षण संगठन आरन्याक ने असम वन विभाग के जोरहाट वन प्रभाग के सहयोग से इस कार्यक्रम का आयोजन किया। द हैबिटैट्स ट्रस्ट और आईयूसीएन प्राइमेट स्पेशलिस्ट ग्रुप ने कार्यक्रम को सहयोग प्रदान किया।

पश्चिमी हूलॉक गिब्बन को भारत का एकमात्र वानर माना जाता है। यह प्रजाति ब्रह्मपुत्र के दक्षिण और दिबांग नदी के पूर्वोत्तर क्षेत्र में पूर्वोत्तर राज्यों में पाई जाती है। हूलॉक गिब्बन को आवास विखंडन, अतिक्रमण और अवैध शिकार जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

प्रशिक्षण में कक्षा आधारित सत्रों के साथ-साथ व्यावहारिक क्षेत्रीय अभ्यास भी कराए गए। प्रतिभागियों को गिब्बन की गणना और आबादी का अनुमान लगाने, क्षेत्रीय आंकड़ों के संग्रह एवं रिपोर्टिंग, वनस्पति अध्ययन, आवास मूल्यांकन एवं पुनर्स्थापना, आबादी की निगरानी, वन्यजीव बचाव एवं पुनर्वास, जीपीएस के उपयोग तथा वन्यजीव कानूनों की जानकारी दी गई।

व्यावहारिक प्रशिक्षण के तहत वन रक्षकों ने पांच दिनों तक पांच अलग-अलग ट्रैक पर क्षेत्रीय निरीक्षण किया। इस दौरान उन्हें वन्यजीव अनुसंधान और संरक्षण की तकनीकों का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त हुआ।

कार्यक्रम का उद्घाटन उन्नीस सितंबर को आरन्याक के प्राइमेट रिसर्च एंड कंजर्वेशन डिवीजन के निदेशक एवं प्रमुख तथा आईयूसीएन प्राइमेट स्पेशलिस्ट ग्रुप, दक्षिण एशिया के उपाध्यक्ष डॉ. दिलीप छेत्री ने किया। उन्होंने प्रतिभागियों से प्रशिक्षण के दौरान प्राप्त ज्ञान और कौशल को अपने-अपने क्षेत्रों में लागू कर हूलॉक गिब्बन संरक्षण के प्रयासों को मजबूत करने का आह्वान किया।

असम कृषि विश्वविद्यालय, यूएसटीएम और आरन्याक के विशेषज्ञों ने प्रशिक्षण सत्रों और क्षेत्रीय अभ्यासों का संचालन किया।

पच्चीस सितंबर को आयोजित समापन सत्र में तीन राज्यों के अग्रिम पंक्ति के वन कर्मियों को एक साझा संरक्षण उद्देश्य के लिए एक मंच पर लाने के महत्व पर जोर दिया गया। डॉ. छेत्री ने असम, मेघालय और नागालैंड के वन विभागों, जोरहाट वन प्रभाग तथा स्थानीय समुदायों को उनके सहयोग के लिए धन्यवाद दिया।

कार्यक्रम के समापन पर प्रतिभागियों के बीच प्रशिक्षण पुस्तिकाएं, हूलॉक गिब्बन से संबंधित पुस्तकें, संरक्षण पोस्टर और प्रमाणपत्र वितरित किए गए।

अर्नब शर्मा 

डिब्रूगढ़

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