1200 वर्ष पहले अद्वैत वेदांत वादी दशनामी सन्यासी स्वामी माधवाचार्य द्वारा प्रदत्त हिंदुत्व की विचारधारा पर 1867 में लाहौर विश्वविद्यालय में नवीन चंद्र राय, रायबहादुर चंद्रनाथ मित्र मैं लाहौर और पंजाब में हिंदू महासभा संगठन की नींव डाली। कालांतर में अखिल भारत हिन्दू महासभा भारत का एक राजनीतिक दल के रुप में 9 अप्रैल, 1915 ई० को स्थापित हुआ। इसकी स्थापना पंडित मदन मोहन मालवीय ने हरिद्वार के कुंभ मेले में की। इस संस्था में बी०एस०मुंजे, लाला लाजपतराय, डॉ केशव बलिराम हेडगेवार, डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे राष्ट्रवादी नेता थे।
108 वर्ष पश्चात पिछले 22-23 जुलाई को राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित नंदकिशोर मिश्रा के अध्यक्षता में हरिद्वार में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पूरे देश में संगठन के प्रचार प्रसार और शक्ति वृद्धि के लिए कार्य योजना तय हुई। सुंदर गिरी महाराज को नॉर्थ ईस्ट का दायित्व दिया गया। जहां-जहां हिंदू संकट में है और असुरक्षित है, हिंदू महासभा उनके लिए काम करेगी। भारतीय जनता पार्टी का धीरे-धीरे हिंदुत्व के आदर्श से पतन हो रहा है, हिंदू महासभा ने जो लड़ाई लड़के देश में हिंदुत्व का वातावरण तैयार किया, भाजपा उसे समाप्त करने पर तुली हुई है। हिंदू महासभा की कानूनी लड़ाई से अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में फैसला आया। इसी प्रकार काशी विश्वनाथ और मथुरा के लिए भी हिंदू महासभा कानूनी लड़ाई लड़ रही है। हिंदू महासभा के कार्यों को स्वीकृति देने के बजाय भाजपा इसे समाप्त करने पर लगी हुई है। हिंदू महासभा का विश्वास है कि एक दिन पूरी दुनिया सनातन के शरण में आएगी। हिंदू महासभा किसी भी प्रकार से सनातन और हिंदू संस्कृति का अपमान और पाश्चात्य का अनुकरण बर्दाश्त नहीं करेगी। इसी उद्देश्य से कछार में एक आवाज समिति का गठन किया गया है, जिसमें पीयूष दास मुख्य जिला संयोजक, अनुपम दे सहसंयोजक, मृगांक भट्टाचार्य मुख्य प्रदेश संयोजक, रूपम नाथ, तनय देव, राजन नाग, सुदीप सिन्हा, मनोज शाह, शांतनु पाल, राजू सिन्हा, धनंजय सिंह, अरुण दास, अशोक विजय पुरकायस्थ को संयोजक बनाया गया है। आगामी 25 सितंबर को केंद्रीय कार्यकारिणी के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में रंगपुर में एक यज्ञ के माध्यम से हिंदू महासभा का कार्य प्रारंभ किया जाएगा।
हिन्दू महासभा ने अखंड भारत का नारा दिया। 1930-32 ई० तक यह संगठन कट्टर संकीर्णता से अलग रहा तथा हिंदुओं के अधिकारों की मांग करते हुए अन्य समुदायों के साथ भारत को आजाद कराने के लिए प्रयत्नशील रहा। सन् 1937 में जब हिन्दू महासभा काफी शिथिल पड़ गई थी और गांधी लोकप्रिय हो रहे थे, तब वीर सावरकर रत्नागिरि की नजरबंदी से मुक्त होकर आए। वीर सावरकर ने सन् 1937 में अपने प्रथम अध्यक्षीय भाषण में कहा कि हिंदू ही इस देश के राष्ट्रीय हैं और आज भी अंग्रेजों को भगाकर अपने देश की स्वतंत्रता उसी प्रकार प्राप्त कर सकते हैं, जिस प्रकार भूतकाल में उनके पूर्वजों ने शकों, ग्रीकों, हूणों, मुगलों, तुर्कों और पठानों को परास्त करके की थी।
उन्होंने घोषणा की कि हिमालय से कन्याकुमारी और अटक से क़टक तक रहनेवाले वह सभी धर्म, संप्रदाय, प्रांत एवं क्षेत्र के लोग जो भारत भूमि को पुण्यभूमि तथा पितृभूमि मानते हैं, खानपान, मतमतांतर, रीतिरिवाज और भाषाओं की भिन्नता के बाद भी एक ही राष्ट्र के अंग हैं क्योंकि उनकी संस्कृति, परंपरा, इतिहास और मित्र और शत्रु भी एक हैं – उनमें कोई विदेशीयता की भावना नहीं है।
उपरोक्त जानकारी एक पत्रकार वार्ता में हिंदू महासभा के काछार जिला के पदाधिकारियों ने प्रदान की।