सरल सुंदर कोमल
नित नई पहचान
बनाती हुई
अग्रसर होती हुई
हमारी हिन्दी।
गावों की पगडंडी से
गुजर कर
राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तरपर
अपनी मुकाम हासिल कर
निरंतर आगे बढ़ती हुई
हमारी हिन्दी।
विश्व के एक सौ बीस देशों में
करोड़ों लोगों की भाषा
मातृभाषा के रूप में
फैली हुई हमारी हिन्दी।
कबीर, तुलसी,सूरदास, रहीम
राजेंद्र, भारतेंदु, प्रसाद
दिनकर, पंत, निराला
महादेवी, प्रीतम,मैथिली
रेणु, अज्ञय से सज्जा
ये बगीया हमारा।
आधुनिक काल में
कई महानगरों की निर्माण में
अपनी खून पसीना बहाकर
बसाया है हमारी हिन्दी।
माया नगरी हो या व्यापर जगत
हिन्दी सिनेमा हो
या अखवार जगत
इलेक्टोनिक मीडिया हो
या सोशल मीडिया
अपनी जगह पर खड़ी है
हमारी हिन्दी।
इस अपूर्व काल में
हर घर में मां की
बड़ी बहन
यानी मौसी है
हमारी हिन्दी।
फिर भी
आज़ादी की अमृत महोत्सव तक
अपनी संवैधानिक अधिकार
की खातिर
संसद की द्वार पर
टक टकी लगाकर
इस राष्ट्र के पूर्ण संवैधानिक
भाषा बनने की आश में
हमारी हिन्दी
तुम्हारी हिन्दी।
? प्रेम कांत चौधरी
असम प्रदेश अध्यक्ष,
हिन्दी साहित्य भारती