सामाजिक बैठके जरुरी
जीन्दगी क्या है? सुख, दु:ख मे अपने जीवन पथ पर चलते रहना जीन्दगी है। इस लौकिक दुनिया मे भौतिक सुख के लिए व्यक्ति दिन – रात अपने स्तर पर मेहनत करता रहता है। सच्चे अर्थो मे एक व्यक्ति अपना जीवन स्वयं के साथ- साथ अपने परिवार, समाज, राष्ट्र के लिए जीता है इसी हिसाब से अपना दायित्व पालन करता रहता है। ऐसे मे राष्ट्र विरोधी, धर्म विरोधी आदि कार्यो मे लिप्त व्यक्ति को छोड़कर हर व्यक्ति का सम्मान होना चाहिए। हम जानते है कि हर एक व्यक्ति को सार्वजनिक रुप से सम्मान प्रदान करना संभव नही है इसलिए व्यवहारिक रुप से हर व्यक्ति को हर पल सम्मान करते रहना चाहिए दुसरी ओर अपने समाज मे वयोवृद्ध तथा शिक्षा, पत्रकारिता, साहित्य, सामाजिक , धार्मिक तथा अन्य क्षेत्रो में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्ति की सार्वजनिक रूप से समय – समय पर सम्मानित करते रहना चाहिए इससे समाज मे अपनत्व की भावना मजबूत होती है वही नयी पीढ़ी को प्रेरणा मिलती है।आज के भागदौड़ की जीन्दगी मे लोगों के सुध लेने मे व्यक्ति मजबूरन असमर्थ हो जाते है। एक समय था जब लोग एक दुसरे के यहाँ बैठते थे आपसी, पारिवारिक तथा गावं, कस्बे, शहर, नगर, देश – विदेश और सामाजिक समस्याओं एवं उपलब्धियों पर खुलकर बातें करते थे किन्तु आज विभिन्न कारणों से यह दृश्य दुर्लभ हो गई है। खैर कोई बात नही है परन्तु अब हमे एक नयी परंपरा की शुरुआत करनी चाहिए।सामाजिक स्तर पर समाज बंधुओ की एक टोली बनाकर प्रत्येक सप्ताह मे निर्धारित किसी एक दिन किसी व्यक्ति के अनुमति लेकर उनके घर आधा- एक घंटा बैठक कर उनके परिवार के हालचाल, कुशल मंगल की बातें करनी चाहिए ऐसा करने से आत्मीयता की भावना बढ़ती है यदि यह परंपरा निभाने मे असुविधा होती है तो हमें प्रत्येक माह के एक निर्धारित दिन मे किसी सामाजिक स्थल मे सामाज बंधुओ की एक बैठक होनी चाहिए जहाँ अपने समाज, नगर- शहर, सम – सामयिक विषयों,मुद्दो, सामाजिक समस्याओं, उपलब्धियों, दायित्व तथा अधिकारो पर खुलकर चर्चा और निदानमूलक बातें होनी चाहिए। यह एक नायाब परंपरा होगी जिससे समाज मे एकत्व व आत्मीयता तथा सांगठनिक स्थिति मजबूत होने के साथ – साथ आपसी सुरक्षा की भावना भी सुदृढ़ होगी।
पवन कुमार शर्मा ( शिक्षक)