सात साल बाद प्रकाशित हुआ कला-संस्कृति विषयक द्विभाषी जर्नल ‘आर्ट इको’ का 20वां अंक

गुरुचरण विश्वविद्यालय में हुआ जर्नल का लोकार्पण

शिलचर, 14 अक्टूबर। कला-संस्कृति विषयक द्विभाषी जर्नल ‘आर्ट इको’ के 20वें अंक का लोकार्पण मंगलवार को शाम चार बजे गुरुचरण विश्वविद्यालय के कॉन्फ्रेंस हॉल में किया गया। वर्ष 2011 में पहला अंक प्रकाशित होने के बाद सात वर्षों के लंबे अंतराल को समाप्त करते हुए 18 लेखकों की रचनाओं से समृद्ध जर्नल का नया अंक प्रकाशित हुआ है। बराक घाटी की कला, संस्कृति एवं दृश्य कला के इतिहास के संरक्षण और शोध को प्रोत्साहित करने की दिशा में यह पहल विशेष महत्व रखती है।

कार्यक्रम के प्रारंभ में शिल्पांगन के प्राचार्य संदीपन दत्त पुरकायस्थ और सह-संपादक डॉ. विनय पाल ने उपस्थित विशिष्ट अतिथियों को उत्तरीय पहनाकर सम्मानित किया। इसके बाद गुरुचरण विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. निरंजन राय, कुलसचिव डॉ. अभिजीत नाथ, प्राध्यापिका सुपर्णा राय, शिलचर शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय की प्राचार्या अपर्णा भट्टाचार्य, शिल्पांगन के अध्यक्ष निहार रंजन पाल तथा असम विश्वविद्यालय के ललित कला विभाग के प्राध्यापक डॉ. राजकुमार मजूमदार सहित अन्य विशिष्ट व्यक्तियों ने संयुक्त रूप से जर्नल का लोकार्पण किया।

स्वागत भाषण में जर्नल के संपादक डॉ. पिनाकपाणि नाथ ने कहा कि ‘आर्ट इको’ की यात्रा काफी लंबी रही है। प्रारंभ में इसका प्रकाशन त्रैमासिक पत्रिका के रूप में शुरू हुआ था। बराक घाटी की दृश्य कला के इतिहास, परंपरा और कलाकारों के योगदान को सामने लाना ही इस जर्नल का मुख्य उद्देश्य है।

उन्होंने कहा कि बराक घाटी में सरकारी संग्रहालय और उपयुक्त आर्ट गैलरी की कमी के कारण कला गतिविधियों, प्रदर्शनियों तथा शोध कार्यों में कई तरह की समस्याएं आती हैं। इन सीमाओं के बावजूद बराक घाटी के साथ-साथ पूर्वोत्तर भारत और देश के कला इतिहास को शोध के माध्यम से सामने लाने का प्रयास लगातार जारी है। उन्होंने बताया कि इस अंक में विभिन्न विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं के महत्वपूर्ण शोधपत्रों को स्थान दिया गया है।

मुख्य अतिथि एवं कुलपति डॉ. निरंजन राय ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में एक मुद्रित कला जर्नल का प्रकाशन अत्यंत सराहनीय पहल है। लंबे अंतराल के बाद इसका नया अंक प्रकाशित करने के लिए उन्होंने संपादक और संपादकीय मंडल के सदस्यों को बधाई दी। उन्होंने जर्नल को और समृद्ध बनाने के लिए नियमित प्रकाशन, शोधपत्रों की उचित समीक्षा तथा वेबसाइट के माध्यम से इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने पर जोर दिया। उन्होंने आशा व्यक्त की कि भविष्य में गुरुचरण विश्वविद्यालय परिसर में आर्ट गैलरी स्थापित होने से कलाकारों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों को लाभ मिलेगा।

विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. अभिजीत नाथ ने कहा कि सात वर्षों के अंतराल के बाद ‘आर्ट इको’ का पुनः प्रकाशन एक महत्वपूर्ण पहल है। कला ऐसा माध्यम है, जिसके जरिए अनेक अनकही बातें व्यक्त की जा सकती हैं। अजंता की गुफाओं के चित्रों से लेकर विभिन्न ऐतिहासिक धरोहरों तक, कला के माध्यम से अतीत की संस्कृति और परंपराओं को समझना संभव हुआ है। इसलिए कला और कलाकारों को उचित सम्मान देना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि लेखकों से रचनाएं जुटाने, संपादन, प्रूफ संशोधन और उच्च गुणवत्ता वाले कागज पर पत्रिका प्रकाशित करने तक प्रत्येक चरण में काफी मेहनत और धन की आवश्यकता होती है। उन्होंने विश्वविद्यालय की ओर से कला गतिविधियों को प्रोत्साहित करने, आर्ट गैलरी स्थापित करने तथा युवा कलाकारों की प्रतिभा को विकसित करने में सहयोग का आश्वासन भी दिया।

प्राध्यापिका सुपर्णा राय ने ‘आर्ट इको’ की लंबी यात्रा की सराहना करते हुए कहा कि कला और संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को सामने लाने का यह प्रयास समाज के प्रति महत्वपूर्ण योगदान है। हम स्वयं अपनी संस्कृति के संरक्षक और संवाहक हैं। इसलिए इस विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना सभी का दायित्व है। उन्होंने जर्नल की भावी सफलता की कामना करते हुए आवश्यकता पड़ने पर सहयोग देने का आश्वासन दिया।

कार्यक्रम में शिलचर शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय की प्राचार्या अपर्णा भट्टाचार्य ने भी संक्षिप्त संबोधन किया। शिल्पांगन के अध्यक्ष निहार रंजन पाल के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

इस अवसर पर शिल्पांगन के सदस्य राजीव दे और रोहित चंद सहित अन्य लोग उपस्थित थे। पूरे कार्यक्रम का संचालन प्रतीति शील ने किया।

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