सरदार पटेल ने हिंदुओं के दर्द को समझा

    बटवारे के बाद मुसलमानों को पाकिस्तान मिल जाने पर   आर्टिकल 299 खत्म किया गया , और साथ ही सेकुलर शब्द जोड़ा गया। तब  सरदार बल्लभ भाई पटेल ने जो कहा उसे सदा स्मरण में रखने की जरूरत है । वो कहते हैं  कि जब एक ‘सुसंगठित’समुदाय इतना सशक्त है कि एक तरफा  रक्तपात को अंजाम देकर देश का बटवारा कर सकता हैं , अपने हिस्से के पाकिस्तान -बांग्लादेश से हिंदुओं को मिटा देने की ताकत रख सकता है तो वो कैसे वंचितदुर्बल अल्पसंख्यक कहला सकता हैं। इसलिए अब अल्पसंख्यक अधिकार जैसी बातों के अस्तित्व का सवाल ही खत्म हो जाता है।

    जिनका  जीवन  ‘राष्ट्रहित सर्वोपरि’ की भावना से एकाकार था, ऐसे सरदार पटेल का जन्म ३१ अक्टूबर, १८७५ में गुजरात के  नडियाड़ में हुआ था। हाई स्कूल की शिक्षा पूर्ण कर , वकालत की पढ़ाई मिडिल टेम्पल लंदन से कर बेरिस्टर बने। लेकिन उनकी ज्यादा सक्रियता आजादी के आंदोलन में एक काँग्रेस के कार्यकर्ता   के रूप में रही। काँग्रेस में रहते हुए  उनकी लोकप्रियता का चरम तब सामने आया , जब १९४६ में काँग्रेस के अध्यक्ष और भावी प्रधान मंत्री के रूप में नेहरू के स्थान पर  उन्हें १५ में से १२ प्रादेशिक कमेटियों ने चुना। इस पर नेहरू ने गांधीजी  से कहा कि नंबर  दो की हैसियत से वो किसी के भी अधीन काम नहीं करेंगे। तब गांधीजी ने सरदार पटेल को नाम वापस लेने  को कहा।

     अंग्रेजों की बिदाई के समय तमाम रियासतों के पास  भारत य पाकिस्तान में विलय  या  स्वतंत्र रहने का विकल्प था। परिणामस्वरूप जो स्थिति उभर कर सामने आयी इसको  अनुभव  करने के लिए एक प्रसंग पर गौर करें: पिछले दिनों वीरांगना रानी दुर्गावती के जन्मोत्सव के अवसर पर 52 घराने के 41 परिवारों को मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री मनोज यादव द्वारा  सम्मानित किया गया। इस अवसर पर मंत्री विजय शाह ने देश को स्मरण दिलाया कि रानी दुर्गावती के 52 गोंड  राजा थे , जब देश का विलय हुआ तो एक भी राजा ने विरोध नहीं  किया। जबकि हैदराबाद, भोपाल , निजाम के सुल्तान मूंछ पर ताव देकर हिंदुस्तान का विरोध कर रहे थे। 

   लेकिन  उप प्रधान मंत्री के साथ गृह मंत्री की हैसियत से सरदार पटेल ने इन सुल्तानों को कोई मौका न देते हुए ५५४ रियासतों सहित इनको भी भारत में विलय कराया। पाकिस्तान से विस्थापित शरणार्थियों को बसाने  की जिम्मेदारी उठाई। जूनागढ़ को हाथों  से निकल जाने से बचा लिया, और हैदराबाद के निजाम को सेना की  सहायता से भारत-विलय के लिए बाध्य  किया।  जबकि नेहरू निजाम को स्वयं फैसला करने देने  के पक्ष में थे। और नेहरू के ही कारण जम्मू-कश्मीर का मामला जटिल हो चला , क्योंकि वो उनके अधीन जो था। 

    सरदार पटेल भारत की  एकजुटता में आरएसएस की भूमिका से बड़े ही प्रभावित रहे।  नेहरू द्वारा संघ पर लगाये गए प्रतिबन्ध को उठाने के लिए बाबासाहब व श्यामाप्रसाद मुखर्जी के साथ ही सरदार पटेल   ने भी प्रयत्न किये थे.  जुलाई १९४९ में प्रतिबन्ध उठने के बाद  संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरु गोलवलकर ने  उनका ( सरदार पटेल) आभार मानने के निमित्त सितम्बर १९४९ में उनसे मिले थे।

      गांधी जी के निधन के दो महीने बाद जब स्वयं डॉ अंबेडकर ने चिकित्सक व जाति से ब्राह्मण डॉ शारदा कबीर से विवाह किया, तो सरदार पटेल ने उन्हें पत्र में लिखा, ‘मुझे यकीन है कि यदि बापू आज जीवित होते, तो अवश्य ही उन्होंने आपको आशीर्वाद दिया होता.’ अंबेडकर ने जवाब में लिखा, ‘मैं आपकी बात से सहमत हूँ  कि यदि बापू जीवित होते, तो इसे अपना आशीष दिया होता.’

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