संघ शताब्दी वर्ष पर स्मरणीय व्यक्तित्व

निःस्पृह और निर्मोही विमलताई कृष्णराव देशपांडे 

“नाम की चाह नहीं, काम ही पहचान रहा,

माँ-सी तपस्विनी का जीवन राष्ट्र को समर्पण रहा।”।”

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर उन अनगिनत तपस्वी कार्यकर्ताओं का स्मरण स्वाभाविक है, जिन्होंने बिना किसी प्रसिद्धि या व्यक्तिगत अपेक्षा के राष्ट्र और समाज के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। ऐसी ही विलक्षण विभूति थीं विमलताई कृष्णराव देशपांडे, जिन्हें स्नेहपूर्वक ‘माई’ के नाम से जाना जाता था।

विमलताई का जीवन निःस्वार्थ सेवा, त्याग, सादगी और संगठन के प्रति अटूट निष्ठा का जीवंत उदाहरण था। उन्होंने कभी किसी पद, प्रतिष्ठा या प्रचार की आकांक्षा नहीं की। उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान समाज और राष्ट्र का कल्याण था।

7 जून 1926 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले के पिंपरी गाँव में जन्मी विमलताई का पालन-पोषण संस्कारों और राष्ट्रभक्ति के वातावरण में हुआ। उस समय महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक भागीदारी सीमित थी, फिर भी उन्होंने स्वयं को सामाजिक कार्यों के लिए तैयार किया। आगे चलकर भजन मंडलियों और महिला संगठनों के माध्यम से उन्होंने समाज में जागृति का कार्य किया।

10 मार्च 1945 को उनका विवाह संघ के प्रचारक रहे कृष्णराव हरिहर देशपांडे (अण्णा) से हुआ। विवाह के बाद उनका घर केवल एक परिवार का घर नहीं रहा, बल्कि जनसंघ और संघ परिवार के कार्यकर्ताओं का आश्रय-स्थल बन गया। देशभर से आने वाले कार्यकर्ताओं के लिए उनका घर सदैव खुला रहता था। माई अपने स्नेह और मातृत्व से हर कार्यकर्ता का स्वागत करतीं और बिना भोजन कराए किसी को वापस नहीं जाने देतीं।

भारतीय जनसंघ के गठन के बाद नागपुर में महिला संगठन को सशक्त बनाने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने सुमतीताई सुकळीकर, प्रमिलाताई टोपले और जयवंतीबेन मेहता जैसी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर महिलाओं को संगठन से जोड़ने, उनमें वैचारिक स्पष्टता विकसित करने और नेतृत्व तैयार करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

1975 के महँगाई विरोधी ऐतिहासिक आंदोलन में भी विमलताई अग्रिम पंक्ति में रहीं। उन्होंने हजारों महिलाओं के साथ मिलकर तत्कालीन सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद की। उसी वर्ष लागू हुए आपातकाल के दौरान उन्होंने भूमिगत कार्यकर्ताओं को सुरक्षित आश्रय देने, उनके परिवारों की देखभाल करने और संगठन की गतिविधियों को निरंतर बनाए रखने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

विमलताई का सबसे बड़ा गुण था—कार्य करना, लेकिन श्रेय से सदैव दूर रहना। वे अक्सर कहा करती थीं कि सभा की तैयारी मैं करूँगी, संगठन का काम भी करूँगी, लेकिन मंच पर मेरा नाम नहीं होना चाहिए। यही उनके जीवन का मूलमंत्र था। उन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा, किसी पद की इच्छा नहीं की और न ही स्वयं को प्रचार का विषय बनने दिया।

लगभग पाँच दशकों तक उन्होंने संगठन और समाज के लिए सतत कार्य किया। उनके अद्वितीय योगदान के लिए वर्ष 2016 में उन्हें ‘सुमतीताई सुकळीकर पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी, नानाजी देशमुख, कुशाभाऊ ठाकरे तथा अनेक वरिष्ठ नेताओं के साथ कार्य करने का अवसर मिला, किंतु उनकी पहचान सदैव एक समर्पित और मौन कर्मयोगिनी की ही रही।

7 जुलाई 2017 को नागपुर में उन्होंने अंतिम साँस ली। जीवन के अंतिम क्षण तक वे सेवा, सादगी और समर्पण के आदर्शों पर अडिग रहीं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल बड़े पदों या प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि निःस्वार्थ भाव से किए गए छोटे-छोटे कार्यों से होता है।

**”दीपक बनकर खुद जले, औरों को राह दिखा गए,

माँ विमलताई त्याग की अमिट कहानी लिख गए।

जीवन जिया सेवा का अनुपम संदेश बनकर,

माई अमर हैं हर कर्मयोगी के हृदय में प्रकाश बनकर

लेखक: अशोक राणे

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