आज से एक माह पूर्व 16 अगस्त2023 अमावस्या की वह शाम मेरे जीवन में अंधकार भर गई क्योंकि इस संध्या में मेरी मां कंचन देवी बैद ने इस नश्वर शरीर को अलविदा कह दिया। “कंचनयथा नाम तथा गुण” संभवतः उनका नाम कंचन था, इसलिए उनका व्यक्तित्व ऐसा था अथवा उनके आभा मंडल में स्वर्ण सी चमक थी, इसीलिए उनका नाम कंचन रखा गया। कंचन उनका नाम ही नहीं था, उनका रूप, व्यवहार एवं व्यक्तित्व भी स्वर्ण के समान सुनहला था। आज उनकी स्मृति में उनके जीवन को पीछे मुड़कर देखने लगी तो लगा उनका जीवन समता, ममता, करुणा, वात्सल्य एवं धार्मिकता से ओत प्रोत था। स्व. चंदनमलजी- कलकती देवी चिंडालिया (राजलदेसर) की पुत्री एवं दुलीचंदजी- भंवरी देवी बैद(राजलदेसर) की पुत्रवधू ने विवाह के पश्चात अपने कुशल व्यवहार से पूरे परिवार में अपना अलग स्थान बनाया। स्व. भुरामल जी बैद(राजलदेसर- फारबिसगंज) की धर्म पत्नी बनकर अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक दायित्व को भी बखुबी निभाया। उनकी तारीफ में पापाजी हमेशा कहा करते थे की तुम्हारी मां को मैं एक “आदर्श नारी”के रूप में देखता हूं क्योंकि यह एक आदर्श बहु ,बेटी ,पत्नी ,मां, बहन,दादी ,नानी एवं तेरापंथ धर्मसंघ की श्राविका है । व्यक्तिगत जीवन में उनका और पापाजी का सामंजस्य सभी के लिए प्रेरणादायी एवं अनुकरणीय था।सामाजिक जीवन में भी उन्होंने अपना एक अलग स्थान बना रखा था ।
फारबिसगंज में 40 साल तक श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथ महिला मंडल की अध्यक्षता सहित अनेक पदों पर अपनी सेवाए प्रदान की। उनके कार्यकाल में तेरापंथ महिला मंडल फॉरबिसगंज के भवन का निर्माण भी हुआ। विवाह के गीत गाने में इतनी कुशल थी कि अपरिचित भी उन्हें विवाह के कार्यक्रम में शामिल होने का निवेदन करते थे। धार्मिक संस्कारों से ओत प्रोत मेरी मां ने अनेक तप किए। जिसमे पंच कल्याणक तप, 1 से 9 तक की तपस्या की लड़ी ,सावन भाद्रव एकांतर ,सोलिया तप, अनेकों उपवास आदि प्रमुख हैं। प्रतिदिन सामायिक करने के बाद ही अपनी दिनचर्या शुरू करती थी । जमीकंद त्याग ,रात्रि भोजन त्याग,अष्टमी चतुर्दशी हरियाली का त्याग उनके धार्मिक जीवन का हिस्सा था। साधु सतियों की रास्ते की सेवा एवम उन्हें गोचरी बहराने में उन्हें बहुत रुचि थी। पूर्णतया तेरापंथ धर्म संघ एवं संघपति के प्रति पूर्ण समर्पित। उनकी सेवा को देखते हुए श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथ महासभा ने 2018 में उन्हें “श्रद्धा की प्रतिमूर्ति” संबोधन से अलंकृत किया। जीवन के 75 वर्षों तक अपने परिवार को असीम ममता, लाड ,प्यार एवं दुलार से संपोषित करती रही एवं संस्कारित करती रही।
उन्हें अपने जीवन में पारिवारिक पांच पीढ़ियों के साथ रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पापाजी के प्रयाण के बाद फारबिसगंज सिलीगुड़ी, बैंगलोर में अपने बच्चों की सार संभाल कर शिलचर में मातुश्री ने 78वर्ष 6 महीने की आयु पूर्ण कर नए जीवन के लिए प्रस्थान कर दिया। वह अपने पीछे भरा पूरा परिवार दो पुत्र- दो पुत्रवधु राजेंद्र-वंदना, मनोज-सुनीता ,एक पुत्री जंवाई बबीता-शांतिलाल तीन पौत्र प्रियंक-जय-यश, दो पौत्रवधु स्वाती-बिंदिया, एक पौत्री छाया ,एक दोहिती कोमल,दो दोहिते चिराग-कौशल ,दो पड़पोते दर्श-कुंज ,एक पड़पौत्री दिव्यंका को छोड़ कर गई है। अंतिम समय में शिलचर में प्रवासित पौत्र-पौत्र वधु प्रियंक-स्वाती बैद को मां की सेवा करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। भुरामल जी- कंचन देवी की युगल जोड़ी ने प्रेम समर्पण की ऐसी मिशाल पेश की कि इस जीवन की अंतिम यात्रा में उन्होंने एक ही दिवस, एक ही स्थान, एक ही समय एवं लगभग एक ही आयुष्य प्राप्त किया। मरणोपरांत नेत्रदानकर नेत्रदानी कंचनदेवी बैद इस संसार में जीवित है। जीवन के अंतिम अनमोल क्षणों में पिताजी एवं मां के साथ रहने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ। मेरे हर कार्य में मेरे जीवन साथी शांतिलाल डागाजी सदैव योगभूत बने । इन दोनो सुयोगों को मैं अपने जीवन का पुण्योदय मानती हूं।
सत्य ही कहा है :-
नास्ति मातृसमा छाया
नास्ति मातृसमा गति।
नास्ति मातृसमं त्राण
नास्ति मातृसमा प्रिया।।
अर्थात माता के समान कोई छाया नहीं । माता के समान कोई सहारा नहीं । माता के समान कोई रक्षक नहीं एवम माता के समान कोई प्रिय नहीं।
मां आप आध्यात्मिक आरोहण की ओर गतिमान रहें। यही मंगल कामना। शुभभावना ।

शिलचर की प्रतिष्ठित समाजसेविका श्रीमती बबीता डागा द्वारा अपनी मां की श्रद्धांजलि में संस्मरण