शिलचर का वार्षिक उत्सव – बाढ़,ज़िम्मेदार कौन? समाधान कहाँ?

राजू दास, शिलचर
एक जाना-पहचाना नाम, एक पीड़ादायक अनुभव, एक सालाना आतंक। शिलचर शहर और इसके आस-पास के इलाकों के लिए बाढ़ अब मानो एक नियमित त्योहार बन चुका है। कभी प्राकृतिक, कभी कृत्रिम। लेकिन नतीजा हर बार एक ही, आम जनता की ज़िंदगी में त्राहि त्राहि।
जैसे ही बरसात आती है, बराक घाटी का सबसे बड़ा शहर शिलचर डूब जाता है जलजमाव में। एक ओर भारी बारिश और बराक नदी का बढ़ता जलस्तर, दूसरी ओर शहर की जल निकासी व्यवस्था की दुर्दशा। इन दोनों के मेल से जो उत्पन्न होता है कृत्रिम बाढ़।
दोष केवल प्रकृति का नहीं है। ज़िम्मेदारी बनती है राज्य प्रशासन की, स्थानीय नगरपालिका की, और कई बार आम नागरिकों की भी। हर साल प्रशासन ड्रेनेज व्यवस्था सुधारने का वादा करता है, लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं होता। शहर के पुराने जलाशय भर दिए गए हैं । कहीं घर, कहीं दुकान, कहीं राजनीतिक संरक्षण में अवैध कब्ज़ा। हाल ही में मुख्यमंत्री ने भी इस सच्चाई को स्वीकारा।
शहर के कई पुराने जल स्रोत और निकासी के रास्ते प्रभावशाली लोगों द्वारा कब्जा कर लिए गए हैं। नाले और खाल, जो जल निकासी के लिए जरूरी हैं, सालों से बिना सफाई और बिना देखरेख के पड़े हैं।
बांधों की मरम्मत होती है कभी बोरियों से, तो कभी बांस गाड़कर। कोई वैज्ञानिक, दीर्घकालिक समाधान नहीं दिखता। हर साल वही दिखावटी तैयारी — बरसात से पहले थोड़ा बहुत सफाई अभियान, और बाढ़ के बाद नेताओं का निरीक्षण अभियान। इसी नाटक के बीच, शिलचर के नागरिकों की चीखें डूब जाती हैं।
बरसात से पहले सत्ताधारी दल वादे करता है, बरसात के बाद विपक्ष निरीक्षण करता है। मीडिया के कैमरों के सामने जलमग्न गलियों में खड़े होकर नेता बयान देते हैं, उंगली उठाते हैं। पर सवाल ये है, सूखे मौसम में ये नेता कहाँ थे?
अगर वाकई बरसात से पहले ड्रेनेज की मरम्मत, जलाशयों की सफाई, और बांधों का सुदृढ़ीकरण हो जाता तो शायद बराक घाटी की जनता इस सालाना बाढ़ त्रासदी से कुछ राहत पाती।
आज शिलचर की बाढ़ केवल प्राकृतिक आपदा नहीं है यह एक प्रशासनिक विफलता और नागरिक उदासीनता का प्रतीक बन चुकी है। स्थायी समाधान के लिए जरूरी है,राजनीतिक इच्छाशक्ति, सक्षम प्रशासन, और जागरूक नागरिक।
शिलचर की जनता कब तक सिर्फ़ प्रतिक्रिया देगी, कब तक बस पानी में बहते हुए वादे सुनेगी?
अब चाहती है प्रतिकार।
क्या यह चाहत कभी पूरी होगी?
या फिर हर साल यही खालीपन, यही शून्यता, इसी तरह बहता रहेगा…??

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