डिब्रूगढ़: डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय में वन्यजीव अपराधों की रिपोर्टिंग पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। “बियॉन्ड द हेडलाइंस: द सीज़र इज़ नॉट द स्टोरी” शीर्षक वाली इस कार्यशाला का आयोजन आरन्याक ने डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययन केंद्र के सहयोग से किया।
पत्रकारिता एवं जनसंचार के विद्यार्थियों के लिए आयोजित इस कार्यशाला में वन्यजीव अपराधों की रिपोर्टिंग से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा की गई। वक्ताओं ने पत्रकारों से अपील की कि वे केवल वन्यजीवों या वन्यजीव उत्पादों की जब्ती और सनसनीखेज सुर्खियों तक सीमित न रहें, बल्कि ऐसे मामलों के व्यापक संरक्षण, कानूनी और सामाजिक पहलुओं को भी समझें।
कार्यक्रम की मेजबानी पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययन केंद्र की सहायक प्राध्यापक प्रणमिता दास ने की। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता डॉ. प्रांजल प्रतिम बरुआ ने की। उन्होंने आरन्याक की टीम का स्वागत किया।
वन्यजीव संरक्षण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए डॉ. बरुआ ने कहा कि जैव विविधता का संरक्षण अंततः मानव कल्याण से जुड़ा हुआ है। उन्होंने मानव हित में जैव विविधता की रक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया।
संरक्षण वैज्ञानिक विजय शंकर बोरा ने विद्यार्थियों को आरन्याक के बारे में जानकारी दी तथा एक संरक्षण संगठन के रूप में इसके विकास और कार्यों से परिचित कराया।
कार्यशाला का एक प्रमुख सत्र “वन्यजीव, अपराध और कानून को समझना” विषय पर आइवी फरहीन हुसैन ने संचालित किया। इस सत्र में विद्यार्थियों को वन्यजीव संरक्षण से संबंधित कानूनों, वन्यजीव अपराधों के विभिन्न स्वरूपों, अक्सर भ्रमित की जाने वाली वन्यजीव प्रजातियों तथा ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग में पत्रकारों की नैतिक जिम्मेदारियों के बारे में जानकारी दी गई।
हुसैन ने बताया कि वन्यजीव अपराध केवल शिकार या वन्यजीवों को अवैध रूप से रखने जैसी अलग-अलग घटनाओं तक सीमित नहीं हैं। इनमें संगठित और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क भी शामिल हो सकते हैं, जो अवैध शिकार, अवैध कब्जे, परिवहन, तस्करी और वन्यजीवों के अवैध व्यापार में संलिप्त रहते हैं।
कार्यशाला में वन्यजीव अपराधों की रिपोर्टिंग, खोजी पत्रकारिता, समाचार की खोज के व्यावहारिक तरीकों और जिम्मेदार रिपोर्टिंग जैसे विषयों को भी शामिल किया गया। विद्यार्थियों ने संवादात्मक अभ्यास, चर्चाओं और समूह प्रस्तुतियों में सक्रिय रूप से भाग लिया।
सत्रों के दौरान प्रतिभागियों को वन्यजीव अपराध से जुड़े मामलों के पीछे की परिस्थितियों की गहराई से पड़ताल करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। वक्ताओं ने कहा कि किसी वन्यजीव या वन्यजीव उत्पाद की जब्ती को ही पूरी खबर मानने के बजाय उसके व्यापक कानूनी, पारिस्थितिक और मानवीय संदर्भ को समझना आवश्यक है। उन्होंने वन्यजीव अपराधों को जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ सामने लाने में पत्रकारों की महत्वपूर्ण भूमिका पर भी जोर दिया।