– राजेश कुमार सिंह –
भारतीय लोकतंत्र में ‘आरक्षण’ और ‘धरना-प्रदर्शन’ एक ऐसे चौराहे पर आकर खड़े हो गए हैं, जहाँ संवैधानिक अधिकारों की मर्यादा और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के बीच गंभीर संतुलन बनाने की आवश्यकता है। पिछले कुछ हफ़्तों में देश के अलग-अलग हिस्सों में उपजी गर्माहट ने इस विमर्श को एक नया और तीखा मोड़ दे दिया है। दिल्ली के जंतर मंतर पर आरक्षण हटाओ आंदोलन के तहत सामान्य वर्ग के युवाओं की लामबंदी और महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण को लेकर मनोज जरांगे पाटिल के नेतृत्व में चल रहे हालिया आंदोलन इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि देश का युवा वर्ग अब इस नीतिगत ढांचे पर खुलकर और आक्रामक तरीके से अपनी राय रख रहा है। लोकतंत्र में अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना एक मौलिक अधिकार है, लेकिन जब यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था को ठप करने या सामाजिक ध्रुवीकरण का कारण बनने लगे, तो नीति-निर्माताओं को अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना ही होगा।
सांख्यिकीय धरातल: सामाजिक आकांक्षा बनाम नौकरियों का संकट
आरक्षण की इस नई सुलगती बहस के पीछे छिपे सांख्यिकीय और जनसांख्यिकीय तथ्यों को समझे बिना इसका कोई भी स्थायी समाधान संभव नहीं है:
आरक्षण का मौजूदा गणित: राष्ट्रीय स्तर पर वर्तमान में 59.5% आरक्षण संवैधानिक रूप से लागू है। इसमें अनुसूचित जाति (SC) के लिए 15%, अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए 7.5%, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27%, और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10% कोटा आरक्षित है। वहीं दूसरी ओर, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों द्वारा इस सीमा को बढ़ाकर 65% (EWS मिलाकर 75%) करने के फैसले ने आरक्षण की 50% वाली पारंपरिक कानूनी सीमा को न्यायपालिका के समक्ष बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा कर दिया है।
सीमित रोजगार की चुनौती: देश में उच्च शिक्षा में कुल नामांकन (Gross Enrolment) 2014-15 के 3.42 करोड़ से बढ़कर 2022-23 में 4.46 करोड़ हो चुका है। इसके विपरीत, संगठित क्षेत्र और सुरक्षित सरकारी नौकरियों की हिस्सेदारी कुल कार्यबल (workforce) में बेहद सीमित (लगभग 5 से 7 प्रतिशत) है। जब 4.5 करोड़ से अधिक शिक्षित युवा सीमित सरकारी पदों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, तो आरक्षण ‘कमी की इस राजनीति’ (politics of scarcity) का मुख्य केंद्र बिंदु बन जाता है।
समीक्षा और उप-वर्गीकरण का अदालती मोड़: सुप्रीम कोर्ट की 7-जजों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक बहुमत (6:1) से SC/ST आरक्षण के भीतर ‘उप-वर्गीकरण’ (Sub-classification) करने और वंचितों के भीतर मौजूद अति-वंचितों तक लाभ पहुँचाने के लिए राज्य सरकारों को अधिकार दे दिया है। इस फैसले ने आरक्षित वर्ग के भीतर एक आंतरिक विमर्श और असंतोष दोनों को जन्म दिया है, जिस पर संसद से लेकर सड़कों तक विरोध की आवाज़ें उठ रही हैं।
समाधान की दिशा: क्या है आगे का रास्ता?आरक्षण के मुद्दे पर मचे इस घमासान और लगातार होने वाले धरना-प्रदर्शनों का कोई तात्कालिक या जादुई समाधान नहीं है। इसके लिए एक दीर्घकालिक और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है कि सरकार को अपनी आर्थिक नीतियों में ऐसा बदलाव करना होगा जिससे निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा हों। जब युवाओं के पास पर्याप्त अवसर होंगे, तो आरक्षण पर उनकी निर्भरता और इसे लेकर होने वाला तनाव स्वतः कम हो जाएगा। समय आ गया है कि आरक्षण नीति की एक निष्पक्ष और पारदर्शी समीक्षा की जाए। आरक्षण का लाभ उस वर्ग के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए, जो आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। सरकार को आंदोलनकारियों के सड़कों पर उतरने का इंतजार करने के बजाय, उनसे पहले ही संवाद स्थापित करना चाहिए। एक मजबूत शिकायत निवारण तंत्र होना चाहिए ताकि असंतोष उग्र आंदोलन का रूप न ले सके। शांतिपूर्ण प्रदर्शन का सम्मान होना चाहिए, लेकिन हिंसा और तोड़फोड़ करने वाले तत्वों के खिलाफ बिना किसी राजनैतिक दबाव के सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
डिजिटल लामबंदी और धरना-प्रदर्शन की बदलती प्रकृति
हाल के आंदोलनों, विशेष रूप से जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस में हुए विरोध प्रदर्शनों ने यह साबित किया है कि अब आंदोलनों की प्रकृति पूरी तरह बदल चुकी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से रातों-रात लाखों युवाओं को सड़कों पर उतारने की क्षमता बढ़ी है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण तरीके से बिना हथियारों के एकत्र होने की स्वतंत्रता अवश्य देता है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर यह भी साफ किया है कि राष्ट्रीय राजमार्गों को बंधक बनाना या आम नागरिकों के ‘आने-जाने के अधिकार’ (Right to Movement) को अनिश्चितकाल के लिए रोकना विरोध की वैध सीमा में नहीं आता। पुलिस द्वारा लागू की जाने वाली भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा163 जैसी पाबंदियां क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अनिवार्य हो सकती हैं, लेकिन वे असंतोष की बुनियादी वजहों को ख़त्म नहीं कर सकतीं।भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने तथा विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार देता है। लोकतंत्र में असहमति की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता। इतिहास गवाह है कि कई बड़े सामाजिक और राजनैतिक सुधार आंदोलनों की कोख से ही निकले हैं।हालाँकि, हाल के वर्षों में धरना-प्रदर्शनों के तौर-तरीकों में एक चिंताजनक बदलाव आया है। राष्ट्रीय राजमार्गों को हफ्तों तक जाम कर देना, सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचाना और आम नागरिकों के दैनिक जीवन को बंधक बना लेना अब एक आम रणनीति बनती जा रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई बार स्पष्ट किया है कि विरोध का अधिकार असीमित नहीं हो सकता। किसी भी प्रदर्शनकारी समूह को आम जनता के आने-जाने के मौलिक अधिकार (राइट टू मूवमेंट) को पूरी तरह बाधित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। जब आंदोलन हिंसक होते हैं, तो वे अपनी नैतिक साख खो देते हैं।
राजनीतिक रोटियां और सामाजिक समरसता को खतरा
संपादकीय दृष्टिकोण से सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि आरक्षण और आंदोलनों का राजनीतिकरण पूरी तरह से गहरा चुका है। राजनैतिक दल इन संवेदनशील सामाजिक मुद्दों को केवल आगामी चुनावों के ‘वोट बैंक’ समीकरणों को साधने के औजार के रूप में देखते हैं। जब आरक्षण सुधार की बात आती है, तो गंभीर नीतिगत संवाद के बजाय ध्रुवीकरण की राजनीति हावी हो जाती है। अलग-अलग जातियों और वर्गों को एक-दूसरे के प्रतिपक्षी के रूप में पेश करने से हमारे सामाजिक ताने-बाने को अपूरणीय क्षति हो रही है।
नीतिगत दिशा: क्या हो आगे की राह?
इस राष्ट्रीय संकट से पार पाने के लिए राज्य और समाज दोनों को मिलकर दीर्घकालिक रणनीतियों पर काम करना होगा:
आर्थिक विकास और रोजगार का विकेंद्रीकरण: सरकारों को अपनी प्राथमिकताओं में सिर्फ सरकारी क्षेत्र पर निर्भरता कम करके, निजी विनिर्माण (Manufacturing) और कौशल आधारित आर्थिक तंत्र में व्यापक पैमाने पर गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा करने होंगे, ताकि आरक्षण को लेकर मची यह त्राहि-त्राहि शांत हो सके।
तार्किक समीक्षा और डेटा-आधारित नीतियां: आरक्षण व्यवस्था में किसी भी तरह के सुधार या बदलाव के लिए राजनीतिक नारों के बजाय विश्वसनीय आंकड़ों (जैसे जातिगत जनगणना और आर्थिक सर्वेक्षण) को आधार बनाया जाना चाहिए।
अग्रिम संवाद तंत्र (Proactive Dialogue): प्रशासन को आंदोलनकारियों के सड़कों पर उतरने और अराजकता फैलने का इंतजार नहीं करना चाहिए। असंतोष की सुगबुगाहट होते ही शिकायत निवारण तंत्र (Grievance Redressal) को सक्रिय हो जाना चाहिए।
आरक्षण और धरना-प्रदर्शन आज भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता की कठिन परीक्षा ले रहे हैं।असहमति लोकतंत्र की जीवन रेखा है, लेकिन वह राष्ट्र की प्रगति और नागरिकों के आपसी सौहार्द की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। समय आ गया है कि विधायिका, न्यायपालिका और समाज के सभी प्रबुद्ध वर्ग मिलकर एक ऐसे समावेशी विकास मॉडल की नींव रखें, जहाँ योग्यता का सम्मान भी सुनिश्चित हो और कोई भी शोषित वर्ग विकास की दौड़ में पीछे न छूट जाए।