राजनीति में गिरती भाषा की मर्यादा: आखिर मतभेद की सीमा कहां समाप्त होगी?

सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, राजनीतिक विरोध के नाम पर व्यक्तिगत हमले, पारिवारिक टिप्पणियां और अमर्यादित भाषा लोकतंत्र की गरिमा को लगातार चोट पहुंचा रही हैं।

भारतीय राजनीति में वैचारिक मतभेद और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता कोई नई बात नहीं है। लोकतंत्र की खूबसूरती ही इस बात में है कि यहां अलग-अलग विचारधाराओं, नीतियों और दृष्टिकोणों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है। सत्ता पक्ष की नीतियों की आलोचना करना विपक्ष का संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार है, वहीं विपक्ष के आरोपों का तथ्यात्मक जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि आज देश की राजनीति में विचारों और नीतियों की बहस धीरे-धीरे व्यक्तिगत छींटाकशी, उपहास और अशालीन टिप्पणियों में तब्दील होती जा रही है।

राजनीतिक संवाद का स्तर जिस तेजी से नीचे गिर रहा है, वह किसी एक दल या नेता के लिए नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक समाज के लिए चिंता का विषय है।

सत्ताधारी दल के कुछ नेताओं द्वारा लंबे समय तक विपक्ष के प्रमुख नेता राहुल गांधी को ‘पप्पू’ कहकर संबोधित करना और सार्वजनिक मंचों से उनका उपहास उड़ाना राजनीतिक विमर्श की गिरती भाषा का एक चर्चित उदाहरण रहा है। किसी नेता की राजनीतिक समझ, कार्यशैली, नीतियों और निर्णयों पर सवाल उठाना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन किसी को उपनाम देकर उसका मजाक उड़ाना स्वस्थ राजनीतिक संस्कृति का परिचायक नहीं हो सकता।

दूसरी ओर, विपक्ष की ओर से भी कई अवसरों पर मर्यादा की सीमाएं लांघी गई हैं। राजनीतिक विरोध को व्यक्तिगत और पारिवारिक टिप्पणियों तक ले जाना, यहां तक कि प्रधानमंत्री के माता-पिता को भी राजनीतिक कटाक्ष का विषय बनाना, किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। प्रधानमंत्री के राजनीतिक निर्णयों की कठोर आलोचना हो सकती है, उनके कार्यों पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन उनके परिवार को राजनीतिक विवाद में घसीटने का औचित्य क्या है?

यहां एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या एक पक्ष की अमर्यादित टिप्पणी दूसरे पक्ष को भी वैसी ही भाषा इस्तेमाल करने का अधिकार दे देती है? क्या राजनीतिक प्रतिशोध के नाम पर किसी भी सीमा को पार किया जा सकता है?

निश्चित रूप से नहीं।

सत्ता में बैठे लोगों की जिम्मेदारी और भी अधिक होती है। उनके शब्दों का प्रभाव केवल राजनीतिक मंच तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज के व्यापक हिस्से तक पहुंचता है। जब सत्ताधारी दल के बड़े नेता ही विपक्ष के प्रति उपहासपूर्ण या अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो इसका संदेश नीचे तक जाता है। इसी प्रकार विपक्ष के शीर्ष नेताओं का आचरण भी उनके समर्थकों और कार्यकर्ताओं के लिए उदाहरण बनता है। इसलिए दोनों पक्षों को अपने सार्वजनिक आचरण और भाषा के प्रति गंभीर होना होगा।

आज स्थिति यह है कि संसद से लेकर चुनावी सभाओं तक, टेलीविजन की बहसों से लेकर सोशल मीडिया तक, मुद्दों से ज्यादा चर्चा नेताओं की व्यक्तिगत टिप्पणियों पर होती है। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समस्याएं, आर्थिक असमानता और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय अक्सर राजनीतिक बयानबाजी के शोर में दब जाते हैं। जनता जिस राजनीति से अपने जीवन की समस्याओं का समाधान चाहती है, वह राजनीति कई बार एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रतिस्पर्धा में उलझी दिखाई देती है।

इसका सबसे बड़ा नुकसान लोकतांत्रिक संवाद को होता है। जब राजनीतिक दल एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी के बजाय दुश्मन समझने लगते हैं, तब असहमति के लिए जगह कम होती जाती है। समर्थकों के बीच भी वैमनस्य बढ़ता है और समाज में अनावश्यक कटुता पैदा होती है।

यह समझना आवश्यक है कि लोकतंत्र में कोई भी नेता आलोचना से ऊपर नहीं है, लेकिन किसी की गरिमा को ठेस पहुंचाना आलोचना नहीं है। प्रधानमंत्री हों, मुख्यमंत्री हों, विपक्ष के नेता हों या कोई अन्य जनप्रतिनिधि—सभी को अपने सार्वजनिक पद और संवैधानिक जिम्मेदारी के अनुरूप भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए।

राजनीति में तीखापन हो सकता है, व्यंग्य भी हो सकता है, लेकिन उसमें शालीनता और तथ्यपरकता का स्थान बना रहना चाहिए। सत्ता पक्ष को अपनी शक्ति का इस्तेमाल विपक्ष को अपमानित करने के बजाय जनता के सवालों का जवाब देने में करना चाहिए। विपक्ष को भी अपनी असहमति को तर्क, प्रमाण और वैकल्पिक नीतियों के माध्यम से प्रभावी बनाना चाहिए।

अंततः सवाल किसी एक नेता, एक पार्टी या एक राजनीतिक विचारधारा का नहीं है। सवाल भारतीय राजनीति की उस परंपरा का है, जिसमें कभी विरोधी दलों के नेता तीखे वैचारिक मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान करते थे।

क्या हम ऐसी राजनीति की ओर लौट पाएंगे, जहां संसद में बहस हो, लेकिन व्यक्तिगत अपमान नहीं; जहां चुनाव में प्रतिस्पर्धा हो, लेकिन पारिवारिक गरिमा पर हमला नहीं; जहां विरोध हो, लेकिन शत्रुता नहीं?

राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि चुनाव जीतना ही लोकतंत्र की एकमात्र उपलब्धि नहीं है। लोकतांत्रिक संस्थाओं, सार्वजनिक संवाद और सामाजिक सौहार्द की गरिमा बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

राजनीति में मतभेद लोकतंत्र की ताकत हैं, लेकिन मनभेद और व्यक्तिगत अपमान उसकी कमजोरी। आखिर देश की राजनीति में विरोध की भाषा और कितनी नीचे जाएगी? समय आ गया है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों आत्ममंथन करें, क्योंकि जनता को नेताओं से गाली-गलौज नहीं, गरिमापूर्ण संवाद और अपने सवालों के जवाब चाहिए।

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