*यू जी सी तुला : सवर्ण वेदना और संतुलन की ज़रूरत* 
वर्तमान यू जी सी एक्ट संशोधन को लेकर देश के शैक्षणिक और सामाजिक विमर्श में तीखी प्रतिक्रियाएँ देखी जा रही हैं। समर्थकों के लिए यह कदम उच्च शिक्षा में समानता, समावेशन और भेदभाव-मुक्त वातावरण की दिशा में बड़ा सुधार है, तो आलोचकों के लिए यह एकांगी दृष्टि का परिणाम। इन दोनों सिरों के बीच एक ऐसी अनुभूति भी है, जो अभी तक सार्वजनिक विमर्श में बहुत सहजता से जगह नहीं बना पाई है—सवर्ण समाज की वेदना।
यह वेदना किसी विशेषाधिकार के क्षरण की शिकायत नहीं है, न ही सामाजिक न्याय की अवधारणा के प्रति असहमति। यह वेदना उस अनुभव से जन्म लेती है, जिसमें एक पूरी सामाजिक श्रेणी को पहले से ही संदेह के कटघरे में खड़ा मान लिया जाता है।
यू जी सी संशोधन का मूल उद्देश्य निस्संदेह सकारात्मक है। उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव की शिकायतों के त्वरित निवारण, समान अवसर केंद्रों की स्थापना और जवाबदेही तय करने जैसी व्यवस्थाएँ समय की मांग रही हैं। इनमें से अनेक प्रावधान उन वर्गों के लिए ढाल का काम करेंगे, जिन्हें दशकों तक संस्थागत उपेक्षा झेलनी पड़ी है। इस सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता।
परंतु समस्या तब उभरती है जब नीति की संवेदना एक-दिशीय हो जाती है। जब सामाजिक वास्तविकताओं को स्थिर मान लिया जाता है और यह मान्यता गहराने लगती है कि सवर्ण समाज हर स्थिति में सक्षम, सशक्त और सुरक्षित है। आज का सामाजिक परिदृश्य इस धारणा को पूरी तरह पुष्ट नहीं करता।
ग्रामीण पृष्ठभूमि से आया, सीमित संसाधनों में पला-बढ़ा, साधारण परिवार का सवर्ण विद्यार्थी भी उसी प्रतिस्पर्धा, उसी अनिश्चितता और उसी मानसिक दबाव से गुजरता है, जिससे कोई भी अन्य विद्यार्थी। किंतु संशोधित व्यवस्था में उसकी पहचान कई बार उसकी योग्यता से पहले आ जाती है। यही स्थिति वेदना को जन्म देती है—एक ऐसी वेदना, जो बोलती कम है, पर भीतर ही भीतर गहरी होती जाती है।
यह भी सच है कि वर्तमान संशोधन ने अकादमिक संस्थानों को आत्ममंथन के लिए विवश किया है। प्रशासनिक जवाबदेही, लैंगिक व सामाजिक संवेदनशीलता और शिकायत-प्रणाली की औपचारिकता ने कई जड़ स्थितियों को चुनौती दी है। यह शिक्षा-तंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है। किंतु हर सुधार अपने साथ यह जिम्मेदारी भी लाता है कि उसका क्रियान्वयन किसी नए असंतुलन को जन्म न दे।
शिक्षा का क्षेत्र राजनीतिक या सामाजिक ध्रुवीकरण का मैदान नहीं हो सकता। यहाँ न्याय का अर्थ किसी एक वर्ग की अनुभूति तक सीमित नहीं होना चाहिए। यदि सामाजिक न्याय के साथ आर्थिक, क्षेत्रीय और शैक्षणिक यथार्थ को नहीं जोड़ा गया, तो नीतियाँ अपने उद्देश्य से भटक सकती हैं।
आवश्यक है कि शिकायत निवारण की प्रक्रिया में पारदर्शिता के साथ-साथ निष्पक्षता भी सुनिश्चित हो। यह भी उतना ही ज़रूरी है कि किसी भी व्यक्ति या समूह को उसकी पहचान के आधार पर पूर्व-दोषी न माना जाए। संतुलन का यही अर्थ है—जहाँ सुरक्षा भी हो और संवाद भी; संवेदना भी हो और विवेक भी।
सवर्ण वेदना को पहचानना सामाजिक न्याय के खिलाफ जाना नहीं है। बल्कि यह स्वीकार करना है कि समाज एकसमान नहीं, बहुस्तरीय है। शिक्षा नीति तभी सफल होगी जब वह किसी को डराए बिना, किसी को चुप कराए बिना, सभी को साथ लेकर चले।
यू जी सी यदि वास्तव में “तुला” है, तो उसे समावेशन और संतुलन—दोनों को बराबर तौलना होगा। अन्यथा यह आशंका बनी रहेगी कि एक वेदना को दूर करते-करते कहीं दूसरी वेदना अनदेखी न रह जाए। और शिक्षा के क्षेत्र में ऐसी अनदेखी, किसी के लिए भी हितकारी नहीं होती।
 *डाॅ प्रखर दीक्षित*
 *फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश)*