मोटापुंग में आरएडब्ल्यूईपी विद्यार्थियों ने वैज्ञानिक सब्जी पौध उत्पादन के लिए सीड ट्रे तकनीक का किया प्रदर्शन

तिनसुकिया: तिनसुकिया जिले के मोटापुंग गांव में असम कृषि विश्वविद्यालय के ग्रामीण कृषि कार्य अनुभव (आरएडब्ल्यूईपी) कार्यक्रम के तहत “सीड ट्रे तकनीक के माध्यम से वैज्ञानिक सब्जी पौध उत्पादन” विषय पर विधि प्रदर्शन कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में २९ आरएडब्ल्यूईपी विद्यार्थियों और १५ किसानों ने भाग लिया।

प्रदर्शन प्रगतिशील किसान श्री धोनिल चुतिया के खेत में आयोजित किया गया। इस अवसर पर तिनसुकिया स्थित असम कृषि विश्वविद्यालय के साइट्रस एवं प्लांटेशन क्रॉप्स अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. मनुज गोगोई उपस्थित रहे और विद्यार्थियों तथा किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया।

डॉ. गोगोई ने सीड ट्रे के माध्यम से वैज्ञानिक नर्सरी में पौध तैयार करने की विभिन्न प्रक्रियाओं का प्रदर्शन किया। इनमें गुणवत्तापूर्ण बीजों का चयन, उगाने वाले माध्यम की तैयारी, सीड ट्रे में माध्यम भरना, उचित तरीके से बीज की बुवाई, सिंचाई एवं नमी प्रबंधन, अंकुरण की निगरानी, पौधों की देखभाल तथा खेत में रोपाई की प्रक्रिया शामिल रही।

प्रदर्शन के दौरान पत्तागोभी, फूलगोभी, चुकंदर सहित अन्य मौसमी सब्जियों के बीजों का उपयोग किया गया। डॉ. गोगोई ने सीड ट्रे तकनीक के प्रमुख लाभों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इससे एकसमान एवं स्वस्थ पौध तैयार करने, बीज और उगाने वाले माध्यम के कुशल उपयोग, बेहतर जड़ विकास, रोपाई के दौरान पौधों को लगने वाले झटके को कम करने तथा मुख्य खेत में पौधों के जीवित रहने की दर बढ़ाने में मदद मिलती है।

किसानों को सब्जी फसलों में उचित पौध संरक्षण उपायों के संबंध में भी जानकारी दी गई। इस दौरान नर्सरी की स्वच्छता, उचित सिंचाई एवं जल निकासी, पौध गलन रोग की रोकथाम एवं प्रबंधन, कीटों और रोगों की नियमित निगरानी तथा अनुशंसित एकीकृत कीट एवं रोग प्रबंधन उपायों को अपनाने पर विशेष जोर दिया गया।

व्यावहारिक प्रदर्शन से आरएडब्ल्यूईपी विद्यार्थियों को आधुनिक नर्सरी प्रबंधन का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त हुआ। वहीं, किसानों ने खेत स्तर पर गुणवत्तापूर्ण सब्जी पौध तैयार करने की सरल, किफायती और प्रभावी तकनीक सीखी।

कार्यक्रम ने इस बात को रेखांकित किया कि स्वस्थ पौध सफल सब्जी उत्पादन की आधारशिला हैं। साथ ही, इस पहल से गांव के स्तर पर कृषि विद्यार्थियों, किसानों और कृषि वैज्ञानिकों के बीच तकनीकी ज्ञान एवं अनुभव के आदान-प्रदान को भी बढ़ावा मिला।

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