भारत की तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक पार्टियां सनातन विरोधी हैं, इनकी धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सिर्फ और सिर्फ सनातन का रक्तरंजित और अति विरोध है। खासकर सनातन संस्कृति और प्रतीकों को लांक्षित करने, अपमानित करने और उन्हें अंधविश्वास का प्रतीक ही नहीं बल्कि झूठा और मिथक साबित करने का राजनीतिक अभियान अबाधित चलता रहता है। संदर्भ की कसौटी महाकुंभ है।महाकुंभ के खिलाफ राजनीतिक बयानों की झड़ियां लगी हुई हैं। कई राजनीतिक दलों और नेताओं में होड़ लगी है कि महाकुंभ की आलोचना करने में कौन आगे निकलेगा। ताजा बयान लालू यादव का है जो काफी राजनीतिक गर्मी पैदा किया है और उसके खिलाफ प्रतिघ्वनि काफी त्रीव हुई है। लालू यादव का बयान है क्या? इस पर गौर क्यों किया जाना चाहिए? लालू यादव का बयान है कि महाकुंभ फालतू है, प्रयाग नहीं जाना चाहिए, कोई मोछ नहीं मिलता है, समय की बर्बादी है और अंधविश्वास का प्रतीक है। इसके पूर्व कांग्रेस के महासचिव मल्लिकार्जुन खड़गे ने महाकुंभ के खिलाफ बोलते हुए कहा था कि महाकुंभ में डूबकी लगाने से रोटी मिलती है क्या? रोजगार मिलता है क्या? अखिलेश यादव महाकुंभ में स्नान करने गये, उन्होंने डूबकी भी लगायी पर उनका एक बयान काफी कुचर्चित रहा है। अखिलेश यादव कहते हैं कि यह झूठ है कि महाकुंभ का यह अध्याय डेढ सौ वर्षो के बाद आया है। महाकुंभ का झूठा इतिहास इसलिए तोपा जा रहा है और प्रचारित किया जा रहा है कि ताकि हिन्दू मोक्ष प्राप्ति के उद्देश्य से प्रयाग आये और भीड़ का हिस्सा बने, ऐसा हिन्दुत्व के प्रचार और प्रसार के लिए किया जा रहा है। फारूख अब्दुला ने महाकुंभ जाने से इनकार कर दिया और कहा कि उनका अल्ला प्रयाग में नहीं बसता है फिर मैं प्रयाग और महाकुंभ क्यों जाउंगा? फारूख अब्दुला एक मुस्लिम हैं, इसलिए उनके बयान पर कोई खास प्रतिक्रिया भी नहीं हुई। फारूख अब्दुला मुस्लिम हैं फिर वे क्यों और किस लिए महाकुंभ जायेंगे? कुछ अतिरंजित बयान दलितों के कई नेताओ का है जो महाकुंभ की आलोचना करने में सारी हदें पार कर गये है। लालू, अखिलेश और खडगे ने अपने महाकुंभ आधारित बयानों के प्रभाव और लाभ हानि की समीक्षा भी नहीं किये होंगे, उन्होंने यह चिंतन भी नहीं किया गया होगा कि उनके इस तरह के बयानों से हासिल क्या होगा, क्या उन्हें नुकसान तो नही होगा, जाग्रत हिन्दुओं से दुश्मनी और नाराजगी तो मोल लेनी नहीं होगी?
एक तबका अप्रत्यक्ष विरोधियों का है। इनमें सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी है और अन्य राजनीतिक पार्टिया है और बुद्धिजीवी भी है, एक्टिविस्ट भी हैं। सोनिया गांधी, राहुल गांधी,प्रियंका गांधी के सोशल मीडिया एक्स को खंगालने पर पता चलेगा कि ये महाकुंभ को लेकर सरकारी पैसे के खर्च को लेकर चिंतित हैं और इनकी चिंता में यह शामिल है कि महाकुंभ पर इतना ज्यादा पैसे खर्च क्यों कर रहे हैं, सरकारी पैसे खर्च कर हिन्दुत्व का प्रचार कर रहे हैं? इन सभी का यह चिंतन मान्य भी हो सकता है, स्वीकार भी हो सकता है, लेकिन पूरी तरह से सत्य और चाकचौबंद की कसौटी पर सही नहीं है। महाकुंभ पर सरकारी पैसे किस मद में खर्च हुए हैं? यह देखना ही होगा। सरकारी पैसे महाकुंभ आने वाले श्रद्धालुओं के वाहन पर खर्च नहीं किये गये हैं, श्रद्धालुओं के ठहरने पर खर्च नहीं किये गये हैं, श्रद्धालुओं के रहने और ठहरने पर सरकारी पैसे खर्च नहीं किये जा रहे हैं। श्रद्धालु अपने पैसे पर आ रहे हैं, श्रद्धालु अपने वाहन के खर्च खुद उठा रहे हैं, श्रद्धालु अपने रहने और ठहरने की व्यवस्था खुद कर रहे हैं, अपने गेरूआ वस्त्रों की व्यवस्था खुद कर रहे हैं, अपने भोजन की व्यवस्था खुद कर रहे हैं, अपनी पूजन सामग्री और अन्य जरूरतों को पूरा खुद कर रहे हैं। फिर बाबाओं और आश्रमों की व्यवस्था भी देख लिया जाना चाहिए कि इन व्यवस्थाओं में सरकार की भूमिका कितनी है? सरकार ने आश्रमों को सिर्फ जगह उपलब्ध करायी है, जगह के सिवा कुछ भी नहीं उपलब्ध करायी है। आलीशान और भव्य आश्रम जो बने हैं, उसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं है। बाबाओं ने श्रद्धालुआंें से जुटायी राशि से आश्रम खडे किये है, सनातनी संगठनों ने स्वयं सेवी ढंग से भोजन और अन्य व्यवस्थाएं संभाल रखी हैं।
महाकुंभ को अंधविश्वास कहने वाले, महाकुंभ की आलोचना करने वाले कितने निष्पक्ष हैं और कितने सत्य के तराजू पर समतुल्य हें? इसका भी विश्लेषण होना चाहिए। विज्ञान की कसौटी पर आप यह बोल सकते हैं कि मोक्ष प्राप्ति का साक्षात कोई प्रमाण नहीं है। पर अंधविश्वास को क्या सिर्फ हिन्दू धर्म के प्रतीकों को लज्जित और अपमानित करने के लिए हथकंडा के तौर पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए? खडगे के बयान पर सोशल मीडिया में प्रतिक्रिया को ही देख लेते हैं। सोशल मीडिया पर खडगे के खिलाफ प्रतिक्रिया थी कि महाकुंभ से डूबकी लगाने से कोई रोटी नहीं मिलती है, कोई रोजगार नहीं मिलता है यह सही है पर क्या नमाज पढने और हज जाने से रोजी रोटी मिलती है ? खडगे से नमाज और हज पर भी बोलने के लिए कहा गया, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि चुनौती दी गयी कि खडगे जी आपमें हिम्मत है तो फिर नमाज और हज को अंधविश्वास कह कर देख लीजिये। आश्चर्यजनक बात यह है कि खडगे के बयान का भाजपा ने लाभ उठाया।दिल्ली चुनावों के दौरान भाजपा समर्थकों ने खडगे के बयानों का खूब उपयोग किया और कहा कि खडगे नमाज और हज वाली मानसिकता के है, उनकी पार्टी कांग्रेस समझती है कि नमाज पढने और हज करने से रोटी मिलती है और रोजगार मिलता है। ऐसे बयानों में खुद भी फंसते हैं। जैसे यह कहना कि जिन पैसों को महाकुंभ पर खर्च किया जा रहा है उन पैसों से स्कूलों, अस्पतालों और पानी की व्यवस्था हो सकती थी। इस पर तर्क है कि कांग्रेस और अन्य पार्टियां अपने शासन के दौरान स्कूलों, अस्पतालों और पानी की कमी और समस्या को दूर क्यों नहीं कर पायी? जाहिर तौर पर इस बयान का भाजपा को लाभ हुआ और भाजपा 27 सालों के बाद दिल्ली विधान सभा चुनाव जीतने में सफल हुई है। कहने का अर्थ यह है कि खडगे का बयान कांग्रेस के लिए घाटे का बयान बन गया, आत्मघाती बयान बन गया और भाजपा के लिए वरदान बन गया। जाग्रत हिन्दुत्व का शिकार कांग्रेस ही सिर्फ नहीं हुई बल्कि लालू और अखिलेश आदि भी हुए हैं। लालू का माई समीकरण किस प्रकार से आत्मघाती हुआ है, यह भी उल्लेखनीय है। माई समीकरण पर कभी राज करने वाले लालू और मुलायम का खानदान आज हाशिये पर है, सत्ता से लगातार बाहर है। लालू बिहार में 20 सालों से और उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव दस सालों से सत्ता से बाहर है। इस वर्ष ही बिहार में विधान सभा का चुनाव है, बिहार विधान सभा के चुनावों में लालू के इस बयान की समीक्षा होगी और दुष्परिणामों का बुलडोजर भी चल सकता है। कम्युनिस्ट एक तरह से दफन हो गये हैं फिर भी इनकी शैखी गयी नहीं है, रस्सी जल गयी पर ऐंठन गयी नही,ं के प्रतीक बन गये हैं कम्युनिस्ट।
हिन्दू पर्व-त्यौहारों से रोजी-रोटी भी मिलती है। यह सत्य है। सिर्फ नफरत मुक्त होकर और मुस्लिम परिधि से मुक्त होकर देखने की जरूरत है। महाकुंभ को ही कसौटी पर देख लीजिये। महाकुंभ में वाहन व्यापार, भोजन व्यापार, कपडा व्यापार, रेल व्यापार और हवाई जहाज व्यापर और होटल व्यापार सहित अन्य व्यापारों की समृद्धि हुई है। महाकुंभ में घाटे में चलने वाले एयरलाइंस कपंनियां अपना घाटा पूरा कर रही है। पांच-पाच हजार की टिकटें 25 हजार से लेकर 50 हजार तक बेच रही हैं। महाकुंभ के कारण घरेलू एयरलाइंस कंपनियां खूब कमाई कर रही हैं। रेलवे यात्रियों से समृद्ध बन रहा है। होटलो का व्यापार भी चढा हुआ है। बस से लेकर कार और टैम्पू तक को खूब लाभ हो रहा है। गेरूआ वस्त्रों की भी खूब विक्री हो रही है, धोती और साडी से लेकर अन्य नये कपडे श्रद्धालुओं की मान्यताओं की कसौटी पर अनिवार्य है। धोती, साडी और अन्य गेरूआ वस्त्र तो कपडा बाजार से ही खरीदे जायेंगे। महाकुभ के दौरान बीस गुणे अधिक भाव पर भी भोजन उपलब्ध नहीं है। चाय, पानी और विस्कूट आदि की किल्ल्त है, किल्लत के दौरान , इन अनिवार्य जरूरतों का मूल्य आसमान छूता है। सबसे बडी बात यह है कि पूरी दुनिया से भी लाखों लोग महाकुंभ आये है और देश को विदेशी मुद्रा भी मिला है। विदेशी श्रद्धालुओं से होने वाली विभिन्न कमाइयों और लाभों को कैसे खारिज किया जा सकता है?
निश्चित तौर पर महाकुंभ विरोधी भाजपा के एक तरह से प्रचारक ही बन गये हैं। अनजाने में नहीं बल्कि जान बुझकर महाकुंभ विरोधी भाजपा के जाल में फंस गये और त्रीव हिन्दू जागरण में अपनी भूमिका निभा रहे हैंं। भाजपा महाकुंभ को अलौकिक बनाने में जितना लाभ नहीं उठा सकती थी, उससे कई गुणा लाभ तो खडगे, लालू, अखिलेश और कम्युनिस्टों की कुंभ विरोधी सक्रियता से उठा ली है। खासकर लांक्षित, अपमानित करने वाले राजनीतिक बयानों से हिन्दुत्व का त्रीव जागरण हुआ ह,ै जिसका नुकसान बयानबाज नेताओं की पार्टियों को उठाना ही पडेगा।
’प्रेषक –
आचार्य श्रीहरि
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