भूपेन हजारिका की जन्मशताब्दी पर संगीत और स्मरण का आयोजन

बंग साहित्य सभा, असम की शिलचर शाखा ने आयोजित किया कार्यक्रम

शिलचर, 12 सितंबर। बंग साहित्य सभा, असम की शिलचर शाखा के तत्वावधान में बुधवार की शाम भारत रत्न एवं ‘सुधाकंठ’ डॉ. भूपेन हजारिका की जन्मशताब्दी के अवसर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। शिलचर-हैलाकांडी रोड स्थित विशिष्ट चिकित्सक डॉ. भास्कर नाथ के आवास पर आयोजित कार्यक्रम में साहित्य एवं संस्कृति प्रेमियों ने महान कलाकार को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

कार्यक्रम की शुरुआत उपस्थित सदस्यों द्वारा डॉ. भूपेन हजारिका के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। इसके बाद नीलांजन पाल, सुमिता भट्टाचार्य, पंकज नाथ, अर्कद्युति नाथ, देवश्री नाथ, विदिप्ता देव एवं नवनीता दे ने डॉ. हजारिका के लोकप्रिय गीत प्रस्तुत किए। अरुणांशु नाथ ने गिटार तथा राजीव अधिकारी ने तबले पर संगत की। डॉ. हजारिका द्वारा रचित कविता का पाठ निवेदिता चक्रवर्ती ने किया।

सभा की अध्यक्ष विद्युतज्योति पुरकायस्थ ने कहा कि डॉ. भूपेन हजारिका के गीतों में शोषित और वंचित लोगों की आवाज के साथ मानव प्रेम का गहरा संदेश मिलता है। ‘मानुष मानुषेर जन्नो’ और ‘आमी एक जाजाबर’ जैसे गीत आज भी लोगों के हृदय में अमर हैं। उन्होंने अपने संगीत के माध्यम से असम और बंगाल की संस्कृति को एक सूत्र में पिरोने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

उपाध्यक्ष एवं विशिष्ट लेखक दीपंकर घोष ने कहा कि भूपेन हजारिका केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के सांस्कृतिक जगत की एक महान विभूति थे। संगीत, कविता, फिल्म और दर्शन के माध्यम से उन्होंने मानवता और मानवीय मूल्यों का संदेश दिया। वे गायक, संगीतकार, गीतकार, पत्रकार, फिल्म एवं संगीत निर्देशक तथा लेखक के रूप में बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने राजनीति में भी कदम रखा, लेकिन उनका मूल उद्देश्य संस्कृति और संगीत के माध्यम से लोगों को एकजुट करना था। लेखक के रूप में भी उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।

सामान्य संपादिका निवेदिता चक्रवर्ती ने कहा कि भूपेन हजारिका ने अपनी बहुआयामी प्रतिभा से स्वयं को एक विराट सांस्कृतिक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया। उनके संगीत की सबसे बड़ी विशेषता मानवता को केंद्र में रखना थी। धर्म, भाषा, जाति और क्षेत्रीयता की सीमाओं से ऊपर उठकर उन्होंने संगीत के माध्यम से लोगों के बीच प्रेम, एकता और सह-अस्तित्व का संदेश दिया।

उन्होंने कहा कि धार्मिक एकता का वास्तविक अर्थ विभिन्न धर्मों में विश्वास रखने वाले लोगों के बीच परस्पर सम्मान, सहानुभूति और सह-अस्तित्व की भावना को मजबूत करना है। भारत की धार्मिक विविधता उसकी विशिष्ट पहचान है और राष्ट्रीय एकता की इस परंपरा को अक्षुण्ण रखना हम सभी का दायित्व है।

कार्यक्रम में बंग साहित्य सभा, असम की राज्य समिति के सह-सामान्य सचिव एवं शिलचर के विशिष्ट चित्रकार संदीपन दत्त पुरकायस्थ भी उपस्थित थे।

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