नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कंटेनर विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने और देश की समुद्री लॉजिस्टिक्स आपूर्ति शृंखला को मजबूत बनाने के लिए १०,००० करोड़ रुपये की कंटेनर विनिर्माण प्रोत्साहन योजना (सीएमपीएस) को मंजूरी दे दी।
केंद्रीय बजट २०२६-२७ में घोषित इस योजना को वित्त वर्ष २०२७-२८ से २०३९-४० तक लागू किया जाएगा। इसके तहत विनिर्माण इकाइयों की स्थापना के लिए तीन वर्ष और उत्पादन को प्रोत्साहन देने के लिए दस वर्ष निर्धारित किए गए हैं।
इस योजना का उद्देश्य भारत की वार्षिक कंटेनर विनिर्माण क्षमता को वर्तमान में लगभग ७०,००० बीस-फुट समतुल्य इकाइयों (टीईयू) से बढ़ाकर ७.५ लाख टीईयू करना है। इसके तहत नई विनिर्माण इकाइयों की स्थापना के साथ-साथ मौजूदा इकाइयों की क्षमता बढ़ाने में भी सहायता दी जाएगी।
केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने मंत्रिमंडल के इस फैसले का स्वागत करते हुए कंटेनर विनिर्माण क्षेत्र में ‘मेक इन इंडिया’ पहल को मजबूत करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त किया।
सोनोवाल ने कहा कि इस पहल से आयात पर निर्भरता कम करने और घरेलू निर्माताओं को उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करके भारत की लॉजिस्टिक्स आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित बनाने में मदद मिलेगी।
समुद्री अमृत काल दृष्टि-२०४७ के तहत भारत में कंटेनर यातायात वर्ष २०२४ के लगभग २.४ करोड़ टीईयू से बढ़कर वर्ष २०४७ तक १७.५ करोड़ टीईयू होने का अनुमान है। यह अनुमान देश में घरेलू कंटेनर विनिर्माण क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
योजना के तहत ब्याज अनुदान सहायता के लिए ८५९ करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं। इसके अंतर्गत कम-से-कम एक लाख टीईयू की वार्षिक क्षमता वाले नए संयंत्रों और प्रतिवर्ष कम-से-कम २५,००० टीईयू की अतिरिक्त क्षमता बढ़ाने वाली विस्तार परियोजनाओं के पात्र सावधि ऋण पर तीन प्रतिशत वार्षिक ब्याज अनुदान दिया जाएगा।
परिचालन व्यय सहायता के लिए ८,८९१ करोड़ रुपये का बड़ा प्रावधान किया गया है। वैश्विक शिपिंग मानकों के अनुरूप कंटेनर बनाने वाले पात्र निर्माताओं को प्रत्येक २० फुट के कंटेनर पर ४९,५०० रुपये और प्रत्येक ४० फुट के कंटेनर पर ८६,६२५ रुपये की सहायता मिलेगी। योजना का लक्ष्य कंटेनर विनिर्माण में घरेलू सामग्री की हिस्सेदारी को ७० प्रतिशत से बढ़ाकर ९० प्रतिशत करना भी है।
परीक्षण और प्रमाणन सुविधाओं के विकास के लिए १५० करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, ताकि विदेशी परीक्षण सेवाओं पर निर्भरता कम की जा सके। वहीं, योजना के प्रबंधन, निगरानी और क्षमता निर्माण के लिए १०० करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं। प्रमुख बंदरगाहों पर भूमि पट्टे के लिए अधिसूचित दर का २५ प्रतिशत सहायता के रूप में उपलब्ध कराने का भी प्रावधान है।
योजना के दिशा-निर्देशों को मंजूरी देने और इसके तहत सहायता स्वीकृत करने के लिए पत्तन, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में एक अंतर-मंत्रालयी संचालन समिति गठित की जाएगी।
इस पहल से लगभग ३,००० प्रत्यक्ष रोजगार और इस्पात, कलपुर्जों तथा लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में ५०,००० से अधिक अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है। इसके अतिरिक्त, कंटेनर के कोने के लिए विशेष ढलाई वाले पुर्जे, विशेष इस्पात, लकड़ी के फ्रेम और पेंट बनाने वाले सहायक उद्योगों को भी बढ़ावा मिलेगा।
सरकारी अनुमानों के अनुसार, इस योजना से वित्त वर्ष २०३९-४० तक लगभग ७५,००० करोड़ रुपये का आर्थिक उत्पादन उत्पन्न हो सकता है, जो सरकार की ओर से दी जाने वाली सहायता राशि के सात गुने से भी अधिक होगा। वैश्विक कंटेनर बेड़े के प्रतिस्थापन, भारत कंटेनर शिपिंग लाइन और वधावन तथा गलाथिया बे जैसे आगामी विशाल बंदरगाहों से कंटेनरों की मांग बढ़ने की उम्मीद है।
सोनोवाल ने कहा कि घरेलू कंटेनर उत्पादन बढ़ने से उस समुद्री लॉजिस्टिक्स शृंखला को मजबूती मिलेगी, जिस पर भारतीय बंदरगाह, निर्यातक और शिपिंग कंपनियां निर्भर हैं। उन्होंने कहा कि यह पहल आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य और समुद्री अमृत काल दृष्टि-२०४७ के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।