भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र-३३

भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र-३३
प्रिय बच्चों ! मैं पुनःआप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र का  सूत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ,यहाँ कहते हैं कि-
तस्मात् सैव परिग्राह्या_म मुक्षुभि:।।३३।।”
अत:(मुमुक्षओं को,बन्धन से छुटकारा चाहने वालों को) भक्ति ही ग्रहण करनी चाहिये।।
बच्चों! मैं  इस बात को इस तरह से समझता हूँ कि मैं एक बात मान लेता हूँ कि मेरे शरीर की कुल आयु ९० वर्ष है,!!!अभी मैं ७४ वर्ष का हो चुका हूँ,! मतलब १८ वर्ष शेष हैं,अर्थात् ७५ वर्ष  यह मेरा शरीर मर चुका है !
और सतत्,हर पल१८ वर्ष तक अभी और मरता ही रहेगा ! और मेरा ये शरीर ही क्या, मेरे संबंध, सूर्य, चन्द्र, तारे, ये हवा,ये सभी कुछ निरंतर मरते ही जा रहे हैं, मर रहे थे और आगे भी अपनी आयु को शेष करने के लिये मरते ही रहेंगे।
और यह परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है !लेकिन एक चीज ऐसी है इस निखिल ब्रह्माँड में जो कभी नहीं बदलती,कभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होती!जो मृत्यु की भी मृत्यु है!जो मृत्युंञ्जय हैं!और वो हैं -मेरे हृदयनाथ, मेरे आत्मन, मेरे सर्वस्व, मेरे स्वामी, मेरे प्रियतमजी, मेरे साँवरे जी।
सृष्टि के पूर्व जो जैसे थे,वे वैसे ही आज भी हैं, और महाप्रलय के बाद भी वे वैसे ही रहेंगे !!तो मैं एक काम करता हूँ, जैसे यह संसार बदल रहा है, मेरा शरीर बदल रहा है, सभी संबंध बदल रहे हैं, वैसे ही मैं भी बदल जाता हूँ ! प्रिय बच्चों !
“मन तुम्हारा एक है चाहे जिधर लगाओ।
चाहे तो हरि को भजो चाहे विषय कमाओ।।”
मैं अब ऐसा करता हूँ कि – यह शरीर जिन माता-पिता ने उत्पन्न किया है, उनकी ही सेवा में लगा देता हूँ;-
यह शरीर जिस संस्कृति,समाज और देश की मिट्टी में पैदा हुआ है उसी की सेवा में लगा देती हूँ! मेरा यह भोतिकीय शरीर जिन सांसारिक सम्बन्धों को सौंपा गया है,उसी को दे देता हूँ;! इस शरीर ने जिन बच्चों को जन्म दिया, उन्हीं को दे देता हूँ ! और जिस परमपिता-प्रियतमजी श्री कृष्ण ने इस जीवात्मा को अनन्त काल से सम्भाला,उसी को यह जीवात्मा दे देता हूँ।
जिस वृंदावन की कुंज-गली में, जिस कुरूक्षेत्र के रण- प्राँगण में,जिन अवध की गलियों में” राम-कृष्ण-बुद्ध की ज्ञान-गंगा”हिलोरें मार रही है,उसीआत्म-संस्कृति में अपनी जीवात्मा को सौंप दूँ ! जो मेरे सच्चे प्रियतमजी हैं,अनंतकाल से मैं जिनका सेवक रहा हूँ, जिनके मन्दिर का भिखारी रहा हूँ, जिनका दास रहा हूँ, उन अपने स्वामी जी की ही बाँहों में समा जाऊँ ! बार-बार यह शरीर आता-जाता रहे,और मैं भी बार-बार अपने नये-नये शरीरों से अपने सांसारिक कर्तव्यों का यथावत् पालन करते हुवे प्रियतमजी की सेवा करता रहूँ।
मेरे मोह का क्षय हो जाये, परिवर्तन हो जाये मेरे मोह का! प्रिय बच्चों ,देवर्षि नारद जी अंतत: अपना निष्कर्ष बताते हैं ! मैं एक बात अवश्य ही कहूँगा कि यह नारद जी का निष्कर्ष है,उन महान् ऋषि का निर्णय है- जो योग, काम, ज्ञान तीनों ही विधाओं के आचार्य हैं।
वे कहते हैं कि “मुमुक्षुभि:”हमें सबसे पहले मुमुक्षुत्व का अर्थ तो समझना ही होगा न !मैं कोई शास्त्रज्ञ नहीं हूँ और न ही इतना बडा विद्वान कि अनेकानेक ग्रंथों का उदाहरण ढूँढकर आपको दूँ!!मैं तो बस एक ही बात जानता हूँ – कि मेरा स्वभाव निरंतर नवीन परिवर्तनों को ढूँढने का, अपने जीवन में नए-नए बदलाव करते रहने का है।
मैं नए-नए कपडे बदलते रहता हूँ!!
मैं नए-नए मित्र बदलता रहता हूँ!!
मैं नए-नए विचार करता रहता हूँ!!
ऐसा स्वभाव मेरा आखिर क्यों है, इसमें भी कोई भेद अवश्य होगा! सांसारिक मोह,संबंध स्थिर हो ही नहीं सकते, ये हमेशा प्रतिपल बदलते रहते हैं, यह संसार आज से १०० साल पहले जैसा था, वैसा आज नहीं है और १०० साल के बाद ऐसा भी नहीं रहेगा ! अरे, मैं ही तो कल जैसा था वैसा आज नहीं हूँ और कल, आज के जैसा भी नहीं रहूँगा।
मैं भी आज बदल जाउँगा!!अपना सांसारिक घर, अपना पीहर छोड जाऊगा !अपने पीहर के,माता, पिता,बंधु,भगिनी,पति पत्नी ,रिश्तों के मोह को परिवर्तित कर दूँगा ! अपने ह्यदयनाथ जी में अपने मोह को,नेह को जोण लूँगा !अपने सच्चे प्रियतमजी के घर चला जाऊगा।
और यही इस सूत्र का भाव भी है ! भक्ति- सूत्र का शेष अगले अंक में लेकर पुनः उपस्थित होता हूँ!! भक्तिसूत्र के अगले अंक के साथ पुनश्च उपस्थित होता हूँ  …-आनंद शास्त्री….सचल दूरभाष क्रमांक ६९०१३७५९७१

भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र-३४
प्रिय बच्चों ! मैं पुनःआप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र का चौंतीसवां सूत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ,यहाँ कहते हैं कि-
“तस्या साधनानि गायन्स्याचार्या:।।३४।।”
उस (भक्ति) को प्राप्त करने के साधन ( उपाय) बताते हैं।।३४।।
प्रिय तथा मेरी प्यारी सखियों ! अब इसके उपरान्त देवर्षि नारद जी कहते हैं कि-अब मैं भक्ति के साधनों का गायन करता हूँ ! इस बात में भी एक गहरा रहस्य छुपा हुआ है ! मैं आपको एक बात बताता हूँ,—
मेरी संस्कृति के लगभग सभी ग्रंथ काव्यात्मक हैं,गद्य में कम ही देखने को मिलते हैं ! और इसमें भी एक रहस्य है – कविता सदैव हृदय की गहेराई से प्रकट होती है,बहुत भीतर से आती है,और जब बाहर बिखर जाती है तो स्वयं को और अन्य को भी भाव- विभोर कर देती है।
गद्य कुछ रूखा-रूखा सा लगता है,और पद्य निर्मल- जल सा, गंगा-सा पवित्र ! विश्व के किसी भी राष्ट्र के नागरिक से आप पूछना कि उसे गद्य और पद्य दोनों में से प्रिय क्या है, तो वह यही कहेगा कि –पद्य ….
नारद जी यह भी तो कह सकते थे कि “भक्ति करने की विधि बताते हैं”किन्तु उन्होंने कहा कि भक्ति करने के साधनों का आचार्यों ने गायन किया है ! “गा” कर बताया है।
मैं किसी भी सम्प्रदाय विशेष पर टीका- टिप्पणी नहीं कर रहा हूँ ! वेदों में मेरे प्रियतम जी का एक नाम-“कर्विऽदेवो” ऐसा कहा गया है ! तो कबीरदास जी के अनुयायियों ने यह कहना शुरू कर दिया कि हमारे “कबीर साहिब” का नाम तो वेदों में भी है।
प्रिय बच्चों !कबीर,रहीम, तुलसी, रसखान, गुरूनानक, मीरा, जयदेव-ये सभी तो कवि हैं, इन सभी के पद-“वेद” ही तो हैं।
वेद, शास्त्र, उपनिषद्, पुराण, गीता,मानस, बीजक, गुरूग्रंथ साहिब,धम्मपद,महायान,जिन-सागर ये सब के सब पद्मात्मक हैं,ये सब के सब गाकर कहे गये हैं ! ये सब मेरे प्रियतमजी को रिझाने के लिये विभिन्न अवसरों पर देश-काल,परिस्थिति,भाषा, संस्कृति, विसमता को देखते हुए ऋषि और संतों द्वारा गाये गए हैं।
गायन द्वारा साधना पथ बताया गया है,और मैं एक कड़वी सी नीम की गोली आपको खिलाना चाहूँगा – गद्य में पुरुषत्व झलकता है,अहंकार है,स्वामी भाव से सम्पन्न है !पद्य स्त्रीत्व है, समर्पण है, दासित्व भाव से सम्पन्न है।
ज्ञान पुरुषत्व है, स्वार्थमय है, अहं की पुष्टि करता है ! भक्ति स्त्री है, विनय करती है, अपने को दे देना चाहती है ! ज्ञान सम्पूर्ण सत्ता को मिटाकर स्वयं को स्थापित करता है !भक्ति सम्पूर्ण सत्ता को स्वीकार कर स्वयं को मिटा देती है ।
ज्ञान लिखी हुई,भरी हुई पुस्तक है ! भक्ति कोरी पुस्तक है जिस पर मेरे प्रियतमजी अपने हाथों से अपनी प्रिया का नाम लिखते हैं-“राधे-राधे ……
और यही इस सूत्र का भाव भी है ! भक्तिसूत्र के अगले अंक के साथ पुनश्च उपस्थित होता हूँ  …-आनंद शास्त्री….सचल दूरभाष क्रमांक ६९०१३७५९७१

भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र-३५
प्रिय बच्चों ! मैं पुनःआप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र का पैंतीसवां सूत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ,यहाँ कहते हैं कि-
“तत्तु विषयत्यागात्संगत्यागाश्च।।३५।।
वह ( भक्ति साधन) तो विषय त्याग तथा संग त्याग से प्राप्त होती है।।
अब इसके पश्चात् पूज्य श्री नारद जी कहते हैं कि- “तस्तु विषयत्याग” इसके पूर्व के सूत्र में उन्होंने यह गायन किया था कि मैं अब भक्ति-प्राप्ति का साधन बताऊँगा ! अब अपनी उसी प्रतिज्ञा का पालन करते हुवे आगे कहते हैं कि —
भक्ति का प्राकट्य विषयों का त्याग करने से होगा।
विषय जो नाम से ही स्पष्ट हैं -“विष”जहर हैं ये, और जहर आप थोडा सा खाओ या ज्यादा।!जहर तो जहर ही होता है, मैं आपको एक बात बताता हूँ, प्राचीनकाल में राजा-महाराजा लोग “विषकन्या” पालते थे-विषकन्याओं को जन्म के बाद से ही सूक्ष्मातिसूक्ष्म मात्रा में जहर खिलाते रहने की आदत डाली जाती थी, धीरे-धीरे ! विष की मात्रा बढते-बढते वे विषकन्या हो जाती थीं ! राजा लोग इन विषकन्याओं का उपयोग अपने घातक शत्रुओं को मारने हेतु किया करते थे ! और ये कन्याएँ जिनसे संसर्ग करतीं वह मर जाते थे।
मैं इस संदर्भ में,और आज के परिप्रेक्ष्य में एक बात अवस्य ही कहूँगा कि आपके सुखद अथवा कुछ दुःखद दाम्पत्य जीवन के बाहर यदि आप हों या मैं भटकती हूँ ! तो वे अनैतिक सम्बंध आपके गृहस्थ जीवन की जड़ों को समूल नष्ट कर देंगे ! इतना ही नहीं यह आपकी आत्मा को और भी कष्ट देने वाले सिद्ध होंगे,प्रिय बच्चों –
“जो गिरि से भू पर गीरै मरहिं सो एकै बार।
जो चरित्र गिरि से गिरै बिगरै जनम हजार।।”
तो बच्चों, विषयों का सेवन आप जितना भी करो धीरे-धीरे उनका नशा बढता ही जाता है ! गीता जी में कहते हैं कि -विषय तो इतने घातक होते हैं कि उनकी कामनाओं में विघ्न पढने से–
“क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।”
हमारे वृद्ध जन तो यहाँ तक कहते हैं कि हमारे युवा भाई-बहन, पिता-पुत्री को भी एकान्त में नहीं रहना चाहिये।
मैं अगर चलचित्र पर वासनात्मक गायन देखता हूँ, ! सुनता हूँ तो मन कलुषित अवस्य होगा ! मैं अगर अपने प्राकृतिक स्वरूप पर ज्यादा श्रृंगार करता हूँ,–ज्यादा भड़कीले कपडे पसंद करता हूँ ! बाल सफेद होने के बाद भी मेंहदी क्यों किसे दिखाने के लिये ?
यही विषयासक्ति है,मैं अगर ज्यादा चाट- पकौडे, मिठाई, पिज्जा- बर्गर, माँसाहार पसंद करती हूँ ! तो यही वासना है ! विषयों में आसक्ति है यह ! मैं अगर नाना प्रकार के सुगंधित सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग करता हूँ तो यह विषयासक्ति है ! मैं अगर स्पर्श सुख की आकांक्षा रखता हूँ तो यह विषयासक्ति है।
इसीलिये नारद जी कहते हैं कि”त्संगत्यागाश्च”और इन विषयों का त्याग तो तभी संभव है जब संगदोष को छोड दिया जाये ! मैं आपको एक बात बताता हूँ–
जब मीराबाई को हमने-आपने बहुत सताया,मेवाड में उन्हें न जाने क्या-क्या समाज में कहा जाने लगा, तो उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास जी को पत्र लिखकर एक सलाह माँगी कि आप ही बताओ मैं क्या करूँ ?
तो गोस्वामी तुलसीदास जी ने जो उत्तर मीराबाई को लिखकर भेजा, मैं उसे प्रस्तुत करता हूँ —
“जाके प्रिय न राम-वैदही।
तजिये ताहि कोटि वैरी सम यद्यपि परम स्नेही।।
तज्यो पिता प्रहेलाद विभीषण बंधु भरत महतारी।।
गुरू बलि तज्यो कंत बृजबनिता भये मुद मंगलकारी।।
और यही इस सूत्र का भाव भी है ! भक्तिसूत्र के अगले अंक के साथ पुनश्च उपस्थित होता हूँ  …-आनंद शास्त्री….सचल दूरभाष क्रमांक ६९०१३७५९७१
भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र-३६
प्रिय बच्चों ! मैं पुनःआप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र का छत्तीसवां सूत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ,यहाँ कहते हैं कि-
“अव्यावृत्तभजनात्।। ३६।।”
(अथवा) अखण्ड भजन से।।
पुन: नारदजी अगला साधन भी बताते हैं-वह कहते हैं कि -” अखण्ड भजन से- “अव्यावृत्तभजनात्”
नारद जी यह नहीं कहना चाहते कि आप अपनी घर-गृहस्थी छोड दो ! अपने पति-पत्नी, पुत्र- मित्र, माता-पिता को छोड दो ! और यह सब हम लोग कर भी तो नहीं सकते न ?
मैं आपको एक-दो उदाहरण देता हूँ —
मैं किसी पुराण चरित्र स्थित नारी या पुरुष वर्ग का नाम नहीं लूँगा –
कामासक्त हुयी हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप की माता ने अपने पति से काम-वासना से प्रेरित होकर संभोग किया था, परिणाम आप जानते ही हैं-
विदुर जी की माता ने भगवत् स्मरण करते हुवे भगवान वेदव्यास की शरण ग्रहण की थी, उसका भी परिणाम आप जानते हैं ! अव्यावृत्त” ! वृत्त का कोई आदि और अंतिम बिंदु नहीं होता।
“स्वाँस-स्वाँस सुमिरण करो वृथा स्वाँस मत खोय।
#ना_जानें_इस_स्वाँस_का_आवन_होय न होय।।”
एक भी स्वाँस का अपव्यय न होने पाये, स्मरण तो -“अंजपा जाप”होना चाहिये! मैं जब कभी भी मरने वाली होऊँगी, तब न जाने किन परिस्थिति में होऊँगा ! मैं चाहता भी हूँ कि मुझे लकवा लग जाये, मधुमेह हो जाये ! कुष्ठ रोग हो जाये, कैंसर हो जाये! इस शरीर से – इस मन से मैंने बहुत सारे पाप किये हैं, मैं नहीं चाहता कि मेरे प्रियतमजी मेरे पापों को छमा कर दें, मैं अपराधी हूँ तो मुझे सजा भी भुगतनी चाहिये।
मैं उन पर पक्षपाती होने का लाँछन नहीं लगने दूँगा ! किन्तु एक बात इसमें भी अवस्य ही कहूँगा!!
“करत-करत अभ्यास पुनि जडमति होंहि सुजान ।
रस्सी आवत-जात ह्वै सिल पर पड़त निसान।।”
मैं जब बिस्तर पर पडा होऊँगा ! मुझे पानी की,खून की बोतल चढ रही होगी ! और असह्य वेदना भी हो रही होगी ! बिस्तर पर ही मल-मूत्र से लिथड़ा पडा होऊँगा मैं ! इस पापी शरीर से मेरी दुर्गंध आ रही होगी ! मेरे सांसिरिक परिजन रो रहे होंगे,हे मेरे प्रियतमजी –
“क्यों न हमारी अश्रुधार अति प्यारी हमें।
वह तो तुम्हारी प्रिति का ही उपहार है।।”
इसीलिये तो दिनभर अपने प्रियतमजी की याद में तड़पता रहता हूँ मैं ! और उनकी गुणगाथा लिखता रहता हूँ !अभ्यास डालने का प्रयास कर रहा हूँ कि, हे मेरे नाथ ! हे मेरे प्राणाधार ! हे मेरे स्वामीजी !हे मेरे प्रियतमजी ! बस उस घड़ी आप मुझे मत छोडना !अपनी बाँहों के आगोश में ले लेना मुझे ! उस छण अपने चरणों में मेरे मस्तक को रहने देना प्रभुजी ! बस उन छणों की आखिरी घडियों के लिये आपको पुकारता रहता हूँ !
मुझे सुख नहीं चाहिये ।
अब मुझे कोई भी विषय-भोग न दो आप ! मैं निर्धन हो जाऊँ ! भिखारी हो जाऊँ ! सब मुझे ठुकरा दें ! बस आप मुझे ठोकर मत मारना मेरे नाथ ! बस इतना सा मुझे अधिकार दे दो कि मैं आपको चाहकर भी भूल न पाऊँ !प्रिय बच्चों–
“ओस-ओस सब कोइ कहै आँसू कहै न कोय।
मो बिरही के सोक में रैन रही है रोय।।”
यही अखण्ड भजन है!!और यही सूत्र का भाव है !भक्तिसूत्र के अगले अंक के साथ पुनश्च उपस्थित होता हूँ  …-आनंद शास्त्री….सचल दूरभाष क्रमांक ६९०१३७५९७१

भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र-३७
प्रिय बच्चों ! मैं पुनःआप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र का सैंतीसवां सूत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ,यहाँ कहते हैं कि-
“लोकेऽपि भगवद्गुणश्रवणकीर्तनात्।।३७।।”
लोक समाज में भी भगवद् गुण श्रवण तथा कीर्तन से।
अब अखण्डित भजन करने की सलाह देने के उपरान्त देवर्षि नारद जी कहते हैं कि-
“लोकेऽपि भगवद्गुण श्रवणकीर्तनात् ”
मेरे एक सखा हैं – शोषल मीडिया पर ! वे हृदय से मुझे बहुत ही प्यार करते हैं ! मैं भी मन से उनका बहुत सम्मान करता हूँ ! नाम नहीं बताऊँगा ! वो स्वयं ही इस निबंध को देखकर समझ जायेंगे-
वो अच्छे-अच्छे निबंध भगवद् विषयक लिखते हैं किन्तु साथ ही साथ कुछ विशेष युवा वर्ग को पसंद आने वाले निबंध भी लिखते हैं ! मैंने उनसे इस पर आपत्ति प्रकट की ! कि इस प्रकार की दो-मुँही विचार-धारा अच्छी नहीं होती ! तो इस पर उन्होंने जो उत्तर दिया,उसी संदर्भ में यह सूत्र है।
उनका उत्तर था कि मैं अभी युवा हूँ, मात्र धार्मिक निबंध लिखने से लोग मुझे-“बाबाजी” समझने लगते हैं ! तो अपने ऊपर बाबा जी का ठप्पा न लगे, इसीलिये ऐसे निबंध भी लिखता हूँ।
इस संदर्भ में मैं एक दृष्टांत देता हूँ,आपको-
एक शाकाहारी सज्जन पंगत में बैठकर भोजन कर रहे थे मिश्रित भोजन परोसा जा रहा था “आमिस – निरामिस” और वो सब निरामिश ही ले रहे थे ! और फिर मछली का रसा आया ! वो बोले कि मैं तो निरामिश हूँ ! ये तो नहीं चलेग ! तो परोसने वाले बोले कि- अरे!”भगत जी ! मछली मत लेना बस इसका रसा दे दूँ ?
तो वे बोले कि हाँ ठीक है खाली रसा-रसा दे दो।!
अब जब वो देने लगा तो कलछुली में कुछ मछली के टुकड़े भी आ गये ! तो परोसने वाला जब उन टुकडों को हटाने लगा तो भगत जी बोले- भाई ! जो अपने आप आता है उसे तो आने दो !
तो प्रिय बच्चों ! इस प्रकार के दोहरे चरित्रावरण से होना ही क्या है ! आप जैसे हैं वैसे ही अपने को उत्थान के मार्ग पर अग्रसर करें।भक्ति का एक सुगमातिसुगम मार्ग नारद जी ने बताया है कि–
“जेहि रहीम तन-मन दियौ कियौ हिये बिच भौन।
तासों सुख-दुख कहन की रही बात अब कौन।।”
भगवान के नाम का, उनके सद्गुणों का, उनके चरित्र का ! उनके उपदेशों का श्रवण करना, कीर्तन करना, स्वयं पढना, दूसरों को भी पढाना, यह भी भक्ति का एक सर्वश्रेष्ठ साधन है।
परन्तु प्रिय बच्चों ! इसमें एक शर्त है कि जिस मुख से मैंने अपने प्रियतमजी का गुणगान किया,अब वह मुख कभी भी किसी अन्य सांसारिक संबंधों का! उन सुखों का गुणगान न करें।
मैं समझ सकता हूँ, कि यह एक प्रारम्भिक अवस्था में
कुछ कठिन सा हो सकता है ! क्योंकि विषयात्मिका बुद्धि का सतत् कृष्ण नाम श्रवण और संकीर्तन करना अत्यंत ही कठिन होता है, अत: मेरी इस बारम्बार व्यवसात्मिका बुद्धि को मेरे प्रियतमजी में लगाने का प्रयास तो करना ही होगा।
और यह तो कुछ ऐसा होना चाहिये कि-
“कान्ह भये प्रानमय प्रान भये कान्हमय।
हियमें न जानि परै कान्ह है कि प्रान है।।”
और यही इस सूत्र का भाव भी है ! भक्तिसूत्र के अगले अंक के साथ पुनश्च उपस्थित होता हूँ  …-आनंद शास्त्री….सचल दूरभाष क्रमांक ६९०१३७५९७१

भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र~३८
प्रिय बच्चों ! मैं पुनःआप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र का अड़तीसवां सूत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ,यहाँ कहते हैं कि-
“मुख्यतस्तु महत्कृपयैव भगवत्कृपालेशाञ्च।।३८।।”
मुख्यता महापुरुषों की कृपा से, या भगवद् कृपा के लेश मात्र से ।
पुन: नारद जी कहते हैं कि
“मुख्यतस्तु महत्कृपयैव”मैं एक बात आपको अवस्य ही कहना चाहूँगा कि भगवद् भक्ति की प्राप्ति ही जीवन का मुख्य उद्रेश्य है,अंतिम लक्ष्य है, मानव जीवन का सारांश है, यदि यह प्राप्ति होती हो, किंतु-
“यह घर है गुरूदेव का खाला का घर नाँहीं।
शीश उतारी भुँय धरै सो पैठे घर माँहीं।।”
भक्ति की प्राप्ति होना सरल नहीं है ! इसमें मुख्य बात है – महापुरुषों की कृपा का प्राप्त होना,और उसका पात्र होना,मैं आपको इसे एक दृष्टाँत द्वारा बताता हूँ –
संत ऑगस्टिन प्राचीन रोम की एक ऊँची पहाडी पर रहते थे, दूर- दूर तक उनकी कीर्ति पताका लहराती थी ! और तब के जर्मनी के एक विद्वान पैर्थोम्स ने सोचा कि उनसे मैं ज्ञान प्राप्त करूँ म।
और हजारों-हजार मील की यात्रा कर वह रोम पहुँचे, बडी कठिनाई से उस पहाडी पर चढे, थक कर चूर थे वे,उपर पहुंचने पर उन्होंने देखा कि एक साधारण सा आधी लुँगी पहने व्यक्ति पौधों को सींच रहा है ।
पैथाॅम्स ने पूछा आप संत ऐंगस्टिन हैं ?
और वह व्यक्ति बोला चाय पियोगे ?
आप सोचें कितना गुस्सा आया होगा “पैर्थोम्स को !
सब मेहनत बेकार, किस बेवकूफ को मिला मैं !
खैर वे बोले जा पिला दे, थका हूँ, पी ही लेता हूँ !
और उस व्यक्ति ने चाय की केतली और “खाली कप-प्लेट” लाकर उन्हें दिया !
कप में चाय डालनी शुरू की, कप भर गया, पैर्थोम्स ने कहा – बस, पर चाय तो डाली ही जा रही थी और प्लेट भी भर गयी-
जब चाय नीचे गिरने को आयी तो पैर्थोम्स ने कप-प्लेट फेंक दी ! अब आगस्टिंन बोले- मेरे बच्चे तेरे मस्तिष्क में इतना सारा ज्ञान अज्ञान लबा-लब भरा पड़ा है ! वहाँ कुछ मेरे से लेने की जगह बची है, तेरे पास ?
प्रिय बच्चों ! सब ज्ञान चाहते हैं ! मैं भी चाहता हूँ !
किन्तु मैं अपने को इतना ज्ञानी समझता हूँ कि जैसे सब वेद-शास्त्र, संत-ज्ञानी जन एक तरफ और मैं अकेला सबसे महान् ज्ञानी हूँ ! तो ऐसे महापुरुषों की कृपा मुझ गंवार को भला कैसे मिल सकती है ! पहले अपने द्वारा जाने हुवे आधे अधूरे कचडे को निकालकर फेंकना होगा ! तभी महापुरुषों की कृपा प्राप्त होगी।
और पुनःनारदजी कहते हैं कि-“भगवत्कृपालेशाञ्च”
मैं आपको एक बात कहूँ –
“बिनु हरिकृपा मिलहिं नहीं संता”
ना जानें क्यों मेरे भीतर से हमेशा एक आवाज आती रहती है कि मैं जितना पापी,अज्ञानी, घमंडी, कामी, क्रोधी, लालची हूँ कि मेरे द्वारा किये किन्ही भी सद्कर्मों की मुझे स्मृति नहीं है! तो कोई मेरे सद्कर्म प्रकट हो जायें यह तो निराधार विश्वास होगा ना मेरा ! मैं तो अपने प्रियतम जी के श्रीचरणों को बस अपने आँसुओं से भिगोकर मैला करना जानता हूँ !किंतु मैं तो ये भी जानता हूँ कि-
“प्रभूकृपा तब जानिये जब दें मानव अवतार।
गुरूकृपा तब जानिये जब मुक्त करें संसार।।”
शूकर की तरह विष्ठा में रहने वाला मैं पापी अपने प्राणाधार से बस चिरौरी करता हूँ ! बारम्बार रो-रो कर कहता हूँ कि देख लो एक बार मेरी ओर ! किसी महापुरुष की शरण में मुझे भी आज भेज दो एक बार! और यही इस सूत्र का भाव भी है ! भक्तिसूत्र के अगले अंक के साथ पुनश्च उपस्थित होता हूँ  …-आनंद शास्त्री….सचल दूरभाष क्रमांक ६९०१३७५९७१
भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र~३९
प्रिय बच्चों ! मैं पुनःआप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र का उन्तालीसवां सूत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ,यहाँ कहते हैं कि-
“महत्संगस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च।।३९।।”
परन्तु महापुरुषों का संग दुर्लभ,अगम्य तथा अमोघ है।
पुन: नारद जी कहते हैं कि
“महतसंगस्तु दुर्लभ”महापुरुषों का संग बडा ही दुर्लभ है ! मैं किसी दुषित भावना से ये बात नहीं कर रहा हूँ, मैं आपको एक सूक्ष्म सलाह देना चाहता हूँ -आप कभी भी, किसी भी सद्पुरुष के ज्यादा नजदीक नहीं जाना ! अत्यंत निराश होंगे आप उनके निकट जाकर-“डूँगरा दूर से दिखै रणियाणाँ रे”
ऊँचे आकाश को छूती बर्फ और हरियाली से भरे पर्वत दूर से देखने में ही अच्छे लगते हैं ! आप उनके बीच पहाडों पर जायेंगे, तो उनका वीरान,सूनापन आपको खाने को दौड़ेगा।
ज्ञान,योग और भक्ति की बातें मैं बहुत सी जानता हूँ ! पढ-पढ कर रट लिया हूँ ! पर वासना, मोह,अहंकार और क्रोध मेरे में कूट-कूट कर भरा पड़ा है ! मैं आपको एक बात कहना चाहता हूँ —
मैं वेद-शास्त्र को तो नहीं कहता, बस अपने भीतर की बात कहता हूँ- चारों वेद अगर मुझे याद हो भी गये तो क्या मेरी वासना और क्रोध मिट जायेंगे ?
मैं सुना हूँ कि दक्षिण भारत के महान् विद्वान “चाँगदेव” जी दस बैलगाडियों में वेद-शास्त्र-उपनिषद्-गीता-रामायण महाभारत लादकर संत ज्ञानेश्वरजी” से शास्त्रार्थ करने गये थे ! और उनके शिष्यत्व को धारण कर वापस लौटे थे, प्रिय बच्चों –
“शैले-शैले न माणिक्यं कस्तुरम् न मृगे-मृगे।
साधूनां न च सर्वत्र मौक्तिकं न गजे-गजे।।”
अखिल ब्रह्माण्ड में समुद्र-मुक्ता,सर्प-मुक्ता और गजमुक्ता उत्तरोत्तर मूल्यवान होती हैं ! करोड़ों हाथियों में किसी एक हाथी में गजमुक्ता होती है ! और हजारों हजार विद्वानों में कोई एक ज्ञानी होते है! और ऐसे हजारों ज्ञानियों में कोई एक विवेकी वीतराग होते हैं ! और यहीं पर आकर समस्या पुन: उपस्थित हो जाती है ! वैराग्य और ज्ञान आने पर एक विकट समस्या आ जाती है- क्रोध !
मैं देखा हूँ, सच्चे साधु पुरुषों में क्रोध बहुत ज्यादा होता है, जैसे कि सामान्य दुर्वासा_ऋषि ! मैं आपको एक बात कहूँ- मेरी “माँ” बचपन में जब मेरा श्रृंगार करतीं तो सर से लेकर पैर तक मुझे सजातीं थीं ! अच्छे-अच्छे कपड़े, पाऊडर, और सबसे बाद में क्या करती थीं-“मेरी ठोढी पर काजल लगा देती थीं जैसे कि सुँदर से चन्द्रमा में दाग !”मैंने पूछा एक दिन — “माँ” ! ऐसा क्यूँ ?
तो बोली कि तुझे किसी की नजर ना लगे ! दाग तो चाँद में भी होता है; ज्ञानी, विवेकी और त्यागी महापुरुषों में क्रोध होता ही है ! उसे सहन करना ! क्योंकि ज्ञान अगम्य है और महापुरुष दुर्लभ होते हैं ।
और एक बात “अमोघश्च” महापुरुषों का संग अमोघ-शस्त्र होता है। आपको एक बात कहूँ – अगर एक बार मेरे सांवरेजी आपको देख भर लेंगे तो आप “मर जाओगे”! यमराज तो एक बार मारता है ! मेरे प्रियतम तो कालों के महाकाल हैं ! वे हमेशा के लिये तुम्हें मार डालेंगे! प्रेम और विरह ऐसा “हलाहल-अमृत” है कि नस-नस ऐंठने लगती है, रोम-रोम में जब मेरे पिया जी से मिलने की व्याकुलता व्याप्त हो जाती है ! जब महापुरुष उनके नाम की आग हमारे भीतर लगा देते हैं –तो बस अमोघ नारायणास्त्र लगता है मोह को, बस “मैं” मर ही जाता हूँ! और यही इस सूत्र का भाव भी है ! भक्तिसूत्र के अगले अंक के साथ पुनश्च उपस्थित होता हूँ  …-आनंद शास्त्री….सचल दूरभाष क्रमांक ६९०१३७५९७१

भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र~४०
प्रिय बच्चों ! मैं पुनःआप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र का चालीसवां सूत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ,यहाँ कहते हैं कि-
“लभ्यतेऽपि तत्कृपयैव ।।४०।।”
उसकी कृपा से ही मिलते हैं।
आपने सत्यनारायण जी की कथा अवश्य ही सुनी होगी ! और हाँ एक प्रसंग भी सुना होगा कि जब भिक्षुक ने संकल्प किया कि आज की भिक्षा से प्राप्त धन से मैं कथा सुनूँगा तो उसे प्रचुर मात्रा में धन प्राप्त होता है और यही लाभ है ।
यही वस्तुत: लाभ की परिभाषा है ! परमार्थ लाभ की प्राप्ति अनायास ही होती है ! किन्तु वह अनायास भी सत्यसंकल्प से होगा ! जब तक मैं अन्त:करण से मेरे सांवरेजी को देखने के लिये उतावला नहीं होऊँगा ! दृढ संकल्पित नहीं होऊँगा ! तब तक उनके दर्शन-लाभ नहीं हो सकते! संकल्प ही लाभ का जनक है,”लभ्यते”वह मिल जाते हैं ! तत्कृप्यैव”  मैं एक बात कहूँ आपसे,एक बहुत ही बुरी आदत होती है हठ की ,और यह हठ भी कैसा-“मैया मोरी मैं तो चन्द्र खिलौनां लैहों”
यह जीव का स्वभाव होता है, शैशवावस्था से ही प्रगट रहता है ! और यह जिद्द ही मानसिक संकल्प है, यह एक खिलौने की भी हो सकती है, और-जब मीराबाई छोटी सी थीं, कोई ४~५ साल की,तो उनके घर एक महात्मा जी आए, वे प्रातः काल में स्नान करके और अपनी झोली में से मेरे प्रियतमजी की एक मूर्ति निकाले ! और उन्हें भी स्नान कराया, फिर वस्त्र पहनाये, और बाल-भोग लगाये -“और बस मीरा मचल उठीं मुझे यही मूर्ति चाहिये” वह तो राज-गृह था ! साधु बाबा भाग निकले अपने भगवान को लेकर ! और इधर मीराबाई ने खाना-पीना सब कुछ त्याग दिया ! और उधर साधू बाबा को सपना आया –
मेरे प्रियतमजी उनके स्वप्न में आकर बोले कि-आप मुझे उस बालिका को दे दो ! बस यही माँ मीरा के जीवन का एक अप्रतिम मोड था ! “जो जिद्द नहीं कर सकते, जो हठ नहीं कर सकते ! जो संकल्प नहीं कर सकते-जो अपने संकल्प के लिये अपनी भूख-प्यास का त्याग नहीं कर सकते ! उन्हे लाभ हो भी नहीं सकता-
“जैहों लोट भूमि पर अबहीं तेरी गोद न अइहौं”
प्रिय बच्चों ! जिद पकड़ लो आप ! वो मिल जायेंगे।
इस संदर्भ में मुझे मध्वाचार्यजी के निरोध-लक्षणम् का•१९•वाँ मंत्र अत्यंत ही प्रिय प्रतीत होता है-
“तदा विनिग्रहस्तस्य कर्तब्य इति निश्चयः।।”
यदि मेरी कोई भी ईन्द्रिय मेरी भगवत् आराधना में बाधा डालती हो ! तो मैं विशेष बल पूर्वक उसका निग्रह करूँ।
आपने एक दोहे को अवस्य ही सुना होगा-
“मन गया तो सो गया गहि कर राखि शरीर।
बिना चढाये कामठी क्यूँ कर लागै तीर।।”
और मैं ऐसा समझता हूँ कि यदि आप मेरे प्रियजी से उनकी कृपा-दृष्टि की याचना करेंगे तो उनका सामर्थ्य नहीं है कि वे आपकी याचना को ठुकरा दें ।
वे तो अपनी ही प्रतिज्ञा से बंधे हुवे हैं-
“शरणागत को त्यागते निज अनहित अनुमानि।
ते नर नरकै जायेंगे कोटिक जुग परिमाण।।”
वे तो कहते हैं कि हे लक्ष्मण ! मैं तेरा त्याग कर सकता हूँ !अपनी प्राण-प्रिया सीता को भी छोड़ सकता हूँ ! आदर्श भ्राता भरत का भी त्याग कर दूँगा किंतु ये जो विभीषण आया है ! जिसने कहा है कि मैं आपकी शरण में हूँ ! मैं अपने शरणागत का त्याग कभी कर ही नहीं सकता ! अतः उनकी शरणागति में जाने से उनकी कृपा प्राप्त होगी ! और यही इस सूत्र का भाव भी है ! भक्तिसूत्र के अगले अंक के साथ पुनश्च उपस्थित होता हूँ  …-आनंद शास्त्री….सचल दूरभाष क्रमांक ६९०१३७५९७१

भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र~४१
प्रिय बच्चों ! मैं पुनःआप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र का एकतालीसवां सूत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ,यहाँ कहते हैं कि-
“तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात्।।४१।।”
क्योंकि भगवान तथा उसके भक्त में भेद का अभाव है ।
आप जैसे विद्वानों,महापुरुषों में और मेरे प्रियजी में कोई भेद हो ही नहीं सकता !
राम और कृष्ण में भेद हो ही नहीं सकता !
वैष्णव और शैव्य में भेद हो ही नहीं सकता !
वेद और रामचरितमानस में भेद हो ही नहीं सकता !
तथा ज्ञान और भक्ति में भेद हो भी नहीं सकता !कृष्ण,राम,बुद्ध, जिन,शिव,नानक, ही क्या सुकरात, और ईसामसीह,में भी भेद हो नहीं सकता, क्या हम हिंदू और ईसाईयों के भगवान अलग-अलग हैं ?
किसी भी सम्प्रदाय की आस्थाओं पर चोट करने वाला विद्वान बौद्धिक माफिया हो तो सकता है, पर वह ज्ञानी और भक्त नहीं हो सकता ! कभी भी हो ही नहीं सकता! आप भक्ति-सूत्र, शाँडिल्य-सूत्र, गीत-गोविंद को पढें और मीरा, तुलसी, रसखान को पढें – कहीं अंतर नहीं पायेंगे।
आप योग सूत्र-अष्टाँग हृदय, ज्ञानेश्वरी, गीता, घेरण्ड संहिता को पढें और कबीर, फिरदौस, मंसूर फकीर आदि को पढें, कोई अंतर नहीं मिलेगा! आप उपनिषद्, गीता, ब्रह्मसूत्र को पढें और कबीर, तुलसी, सहजोबाई, शोपेनहर, सुकरात को पढें, कोई अंतर नहीं मिलेगा।
“हर और हरिश्चन्द्र एक हैं ज्यों पानी में पानी।
भूतनाथ चरणे आखो भणें बातें गये बिरले जानी।।”
अपने मत की स्थापना सद्गुरु जन अवश्य करते हैं, किंतु दूसरे की आस्था पर प्रहार कभी नहीं करते! और जो दूसरे के धर्म की निंदा करते हैं ! वे विद्वान तो हो सकते हैं,तर्क शास्त्री भी हो सकते हैं ! किंतु ऐसे विद्वान पुरुष भले कितने ही वेद-शास्त्रों के ज्ञाता हों,कुरान और बाइबिल की बात करने वाले हों ! बीजक हो सकता है कि उन्होंने रट लिया हो-ऐसी अनेक विधाओं का ज्ञान रखते हों ! किंतु समाज विध्वंसक, विघटनधारी विचारधारा के पोषक होने के कारण वे भगवद्भक्त नहीं हो सकते।
प्रिय बच्चों ! आप एक बार अपने हृदय पर हाथ रखकर अपने मन से पूछकर देखें कि मेरे आपके सूर्य, चन्द्र, नक्षत्रों को बनाने वाले भगवान और किसी अन्य सम्प्रदाय द्वारा कहे जाने वाले सूर्य, चन्द्र, नज्ञत्रों आदि के निर्माता क्या अलग-अलग हो सकते हैं ?
मैं मात्र इतना ही कहना चाहूँगा कि जो महापुरुष, जो गुरू, जो संत सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रचारित- प्रसारित किसी भी सम्प्रदाय विशेष की आलोचना न कर मेरे प्रियजी की प्रीती को ही एकमात्र लक्ष्य बताते हैं- वही भक्त हैं ! वही ज्ञानी हैं ! वही संत हैं, वही महात्मा हैं और वही भगवान भी हैं -और यही इस सूत्र का भाव भी है!! भक्तिसूत्र के अगले अंक के साथ पुनश्च उपस्थित होता हूँ  …-आनंद शास्त्री….सचल दूरभाष क्रमांक ६९०१३७५९७१
आनंद शास्त्री

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