प्रिय बच्चों ! मैं पुनःआप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र
“साध्यतास् तदेव साध्यतास्।।४२।।”
इसलिए उसकी ही साधना करो, उसकी ही साधना करो।
देवर्षि नारद जी इस सूत्र के माध्यम से पुन:श्च इसी परम सत्य को स्थापित करना चाहते हैं कि —
छोड दो नाना प्रकार के विवादों को !
छोड दो नाना प्रकार के मतांतरों को !
मिटा दो राम और कृष्ण के भेदों को !
आप आत्मसात कर लें पुराणों और वेदों को !
जो मुख्य प्रयोजन है, उसके सन्दर्भ में मैं क्यों नहीं सोचता ?
इस सूत्र को मैं एक दृष्टान्त के द्वारा आपसे समझने का प्रयास करता हूँ-मैं मिट्टी का एक घडा बनाता हूँ –कच्ची मिट्टी का ! और अब इस मिट्टी के घडे को आग में तपाता हूँ, ! और तप कर वह लाल हो जाता है ! पक्की मिट्टी का घडा बन जाता है।
अब आप इसे पुन: मिट्टी में मिला सकता हो ?
कदापि नहीं ! वह मिट्टी में मिलकर भी नहीं मिलेगा !
वहीं दूसरी तरफ मिट्टी का एक कच्चा घडा मिट्टी में कितनी आसानी से पुन: एकरस हो जाता है।
प्रिय बच्चों ! ज्ञानी और भक्त में भी यही अंतर होता है ! नाना शास्त्रों को पढकर जो मिट्टी के पक्के घडे बन चुके हैं !उनके लिये मेरे प्रियजी को पाना बहुत ही दुष्कर है क्योंकि मेरे प्रिय को पाने के लिये कच्चा घडा बनना जरूरी है।
एक अबोध बालक बनना आवश्यक है!!आप स्वयं ही देखो बालक और वृद्ध एक समान होते हैं ! किंतु हम शिशुओं से ज्यादा प्यार करते हैं! इस वेद में यह लिखा है ! उस उपनिषद् में यह लिखा है।!बाइबल में यह लिखा है ! कुरान में वह लिखा है……….ऐसे नाना प्रकार के प्रपँचों को गोपियाँ नहीं जानतीं ! गोपियों ने न वेद पढा था ! न उपनिषद् पढा था ! उन्होंने तो बस अपनी मनरूपी पुस्तक को कोरा करके मेरे प्रियजी को सौंप दिया था ।
“ये लो कान्हा मेरा हृदय तेरे चरणों में पड़ा है।!
अब इस पर आपको जो लिखना है लिख डालो।”
नारद जी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं — नाना प्रकार के मत-मतांतरों, नाना प्रकार के वेद, उपनिषदों, नाना प्रकार के गीता और मानस को पढकर भी अगर भेद बुद्धि ही सीखनी है !अगर घृणा ही एक-दूसरे के प्रति फैलानी है! यदि प्रेम की जगह नफरत का पाठ पढना है-तो ऐसा विद्वताऽडंबर किस काम का ?
अरे! ये जो मेरे प्रियजी हैं ! आप इन्हें राम कह लो, कृष्ण कह लो, बुद्ध कह लो या कबीर, आप उन्हें ईश्वर कह लो या महावीर, आप उन्हें शिव कह लो या , नानक !
आप उन्हें साकार कह लो या निराकार, !
आप इन्हें द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, विशुद्धाद्वैत, सगुण, निर्गुण– आप इन्हें कोई भी नाम दे दो।! और जब आप इन्हें अपने हृदय से पुकारेंगे तो मेरे प्रियजी ! आपको तदानुसार ही स्वीकार कर लेंगे; आप उनकी ही साधना करो,आप उनकी ही साधना करो।
अंततः मैं यह भी कहूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि -“सनातन अर्थात-“सः-ना-तन” जो अनाऽस्तित्त्व तथा अस्तित्व के-“आदि-मध्य और अंत में स्थित है”वो सनातन है! इस्लाम,ईसा,जरथूस्थ,
ताओ,शांति,लुशाई,यहूदी हों अथवा नाना प्रकार की काली शक्तियों के उपासक वे सभी के सभी हमारे एकमात्र प्रिय जी की ही उपासना करते हैं!कुछ जानकर करते हैं कुछ अनजाने में करते हैं! किन्तु सभी करते हैं! और यही इस सूत्र का भाव भी है ! भक्तिसूत्र के अगले अंक के साथ पुनश्च उपस्थित होता हूँ …-आनंद शास्त्री….
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भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र~४३
प्रिय बच्चों ! मैं पुनःआप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र
“दु:संग: सर्वथैव त्याज्य:।।४३।।
दुसंग सर्वदा त्याज्य है।।
यदि दु:संग का परित्याग न किया जाये ! बुरे लोगों का साथ न छोडा जाये ! गंदी आदतों को न छोडा जाये ! तो भला भक्ति माधुर्य की प्राप्ति कहाँ से हो सकती है ! अत: प्रिय !परमार्थ की अपेक्षा रखने वाले आप जैसे भक्तों को सर्वप्रथम किसी भी प्रकार के दुर्जनों का साथ छोडना ही होगा।
“दु:संग: सर्वथैव त्याज्य:”मैं एक बात बारम्बार कहना चाहता हूँ कि-“दु:संग और दुर्जन संग” में भी भेद करना पडेगा ! उनके अंतर को भी समझना होगा, दुर्जन की विवेचना बाद में करता हूँ, प्रथम थोड़ा “दु:संग” को समझने का प्रयास करता हूँ।
“दु:+संग” दु:ख देने वाला संग ! बुरी संगत ! लेकिन प्रिय बच्चों !
“संत न छोडे संतई कोटिक मिलै असंत।
चंदन शीतलता ना तजै लपटे रहत भुजंग।।”
लोग कहते हैं कि अपनी गन्दी आदतों को छोडने के लिये संतों का संग करो।
लोग कहते हैं कि घोर से घोर पापी भी संत-संग से सुधर जाते हैं,
“संत बडे परमार्थी शीतल वाकू अंग।
तपत बुझा दें और की दे दें अपना रंग।।”
अब यदि “संत” दु:संगियों ! या मान लें कि दुर्जनों से दूर रहेंगे तो फिर मुझ जैसे पापी का कल्याण कैसे होगा ?
जहाँ तक मैं समझता हूँ कि नारद जी कहना चाहते हैं कि-
“साधु ऐसा चाहिये जैसा सूप स्वभाव।
सार-सार को गहि रहे थोथा देहि उड़ाय।।”
मैं एक बात कहूँ- आप मुझसे घृणा मत करो, मेरे पापी विचारों से करो !
मेरे पापों से भी घृणा मत करो !
उन पापों के पीछे छिपी मेरी भावनाओं से घृणा करो !
आप मेरी घृणित भावनाओं से भी घृणा मत करो !
मेरे संस्कारों से घृणा करो !
आप मेरे संस्कारों से भी घृणा मत करो !
आप मेरे अज्ञान से घृणा करो !
आप मेरे अज्ञान से भी घृणा मत करो !
आप मेरी अविद्या से घृणा करो !
और फिर आप मेरी अविद्या से भी घृणा कैसे कर सकते हो ?
क्योंकि मुझे “सद्विद्या” तो आपको ही देनी थी !
आपने दी क्यों नहीं ?
आपने मुझ पापी को अपने से दूर अभी तक क्यों रखा ?
आप मेरे दु:संग को मिटा दो !
आप अपना “सद्संग” मुझे दे दो।
और यही इस सूत्र का भाव भी है ! भक्तिसूत्र के अगले अंक के साथ पुनश्च उपस्थित होता हूँ …-आनंद शास्त्री….सचल दूरभाष क्रमांक ६९०१३७५९७१
प्रिय बच्चों ! मैं पुनःआप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र
कामक्रोधमोहस्मृतिभ्रंशबुद्धिना
(कुसंग) काम, क्रोध, मोह, स्मृतिभ्रंश, बुद्धिनाश यही सर्वनाश के कारण हैं।।
इस सूत्र को देखते ही मुझे गीताजी में कही हुयी मेरे प्रियजी की एक बात स्मरण हो आयी-
“ध्यायते विशयांन् पुंसः सड़्गम् तेषू पजायते।
सड़्गात् संजायते कामः कामो क्रोधाऽभिजायते।।”
क्रोधात् भवति संमोहा संमोहा स्मृति विभृमः।
स्मृति भृंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धि नाशात् प्रणश्यति।।”
भक्ति मार्ग की सबसे बडी शत्रुता कामनाओं से होती है ! वासना से होती है ! मैं आपको एक रहस्य की बात बताता हूँ- पंच विषयों में यदि कोई सबसे घातक विषय है तो वह है-“रसना !” और प्रकारांतर से यह रसना ही क्रमशः अन्य इन्द्रियों के विशयों को उत्तेजित करने में मूख्य भूमिका निभाती है ।
स्वाद-लोलुपता, चटोरापन यह जो मेरी जिह्वा है न ! नाना प्रकार के स्वादों को चखने की कामना करने वाली यही मेरी सबसे बडी शत्रु है-
प्रिय बच्चों ! इसी जिह्वा के स्वाद के लिये मैं इधर-उधर मुँह मारता रहता हूँ !
नाना प्रकार के स्वादों के लिये किया जाने वाला माँसाहार !
ज्यादा मसालों से भरा हुआ भोजन; नाना प्रकार के तैलीय, अम्लीय तीखे पदार्थ हमें अपनी तरफ खींचते हैं और-
“यथा आहार तथा विचार” ! मेरे ह्रिदयनाथ जी ने दुर्योधन से कहा था कि पापी के घर का अन्न खाने से बुद्धि बिगड़ जाती है।
जितने स्वादिष्ट भोजन मुझको चाहियें !
जितनी भोग-विलास की सामग्रियाँ मुझको चाहियें !
उतना ही ज्यादा धन भी मुझको पाना होगा ! और ज्यादा धन के लिये अन्याय के पथ पर तो चलना ही होगा।
और ये-“क्रोध” जब मेरी कामनाओं के मध्य ! जब मेरी वासनाओं के मध्य ! कोई भी अवरोध आयेगा ! जब कोई मेरे धन,वैभव, सम्मान, पत्नी,वासनाजनित सम्बन्ध,राजनीति में स्थान, ऐश्वर्य प्राप्त करने के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करेगा ! तो क्रोध तो उसपे मुझको आना ही है ।
और क्रोध होते ही अपने-पराये का बोध समाप्त हो जाता है ! मेरे लिये उचित और अनुचित क्या है !
मैं समझ ही नहीं पाता ! बस मोहित हो जाता हूँ।
मुझे अपनी यथेष्ट पदार्थों की प्राप्ति के लिये अच्छे बुरे किन्ही भी संसाधनों का उपयोग करना कदाचित् अनुचित नहीं लगता।
जैसे एक बहेलिया अबोध पशु- पक्षियों को मारने के लिये जाल बुनता रहता है, ऐसे ही मोहित मना मैं येन केन प्रकारेण अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिये अपनों से भी हिंसा करने में तनिक भी हिचकिचाता नहीं हूँ।
और प्रिय बच्चों ! ऐसी मोहित मना मुझ दुर्बुद्धि प्राणी की मोह के कारण स्मृति नष्ट हो जाती है ! मेरी दृष्टि में पत्नी और अवैध वासनाजनित सम्बन्धों का भेद भी समाप्त हो जाता है ! तब मेरी दृष्टि में साधु और शैतान का भेद समाप्त हो जाता है।
मैं अपने क्षुद्र स्वार्थों के समक्ष ! नाना प्रकार के विषय वासनाओं से विधा हुवा मैं निरीह-निष्ठुर! अपने अविवेक के कारण भलाई और बुराई की स्मृतियों को खो देता हूँ ! नष्ट हो जाती है बुद्धी मेरी ! तब पागल हो जाता हूँ मैं! गिर जाता हूँ- अपने स्थान से।
अत: नारद जी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि यदि आप भक्ति मार्ग पर चलना चाहते हैं ! तो आपको काम, क्रोध, लोभ और मोह छोड़ना होगा ! क्योंकि यह स्मृति-भ्रंश के कारण बुद्धि के विनाश करने वाले सर्वनाश के कारण होते हैं।
और यही इस सूत्र का भाव भी है ! भक्तिसूत्र के अगले अंक के साथ पुनश्च उपस्थित होता हूँ …-आनंद शास्त्री….सचल दूरभाष क्रमांक ६९०१३७५९७१
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भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र~४५
प्रिय बच्चों ! मैं पुनःआप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र
“तरंगायिता अपीमे संगात्समुद्रायन्ति।।४५।।”
यह काम क्रोध मोह आदि पहले तरंग की तरह आकर समुद्र की तरह शान्त होते हैं।
मैं आपको एक रहस्य की बात बताता हूँ ! जब भयानक तूफान आने वाला होता है ! तो हवायें रूक जाती हैं ! समुद्र की लहरें शान्त हो जाती हैं ! जब भयंकर वर्षा होने वाली होती है! तो उमस बढ जाती है।
इस वासना का प्रवेश मन मेंअत्यंत ही मनमोहक रूप से होता है ! मन तरंगित हो उठता है ! वासना एक ऐसी तरंग है ! जो शनैःशनैः ! एक चोर की तरह घर में प्रवेश करती है ! कहते हैं न कि–
“नमन-नमन में फेर है बहुत नमे नादान।
दगाबाज ड्योढा नमे-चित्ता,चोर कमान॥”
प्रिय बच्चों ! पूर्णिमा और अमावस्या की रात्रि में जब चाँद होता ही नहीं या पूर्ण-रूप से होता है ! निकलने वाला होता है !और रात्रि का द्वितीय प्रहर प्रारम्भ होने वाला होता है-
मैं आपको एक रहस्य की बात और बताता हूँ,मध्य समुद्र हमेशा शान्त होता है ! अगाध होता है, ! अथाह होता है, ! असीम होता है ! किंतु तटों पर लहरों के ऊँचे-ऊँचे थपेणे ज्वार और भाटे मानों सब कुछ तहस-नहस करने को उद्यत से जान पड़ते हैं।
जब मैं मंदिर में जाता हूँ तो आँखों को बंद करते ही मुझे सबसे पहले अपनी चप्पलें ही दिखायी देती हैं ! यदि तीर्थयात्रापर जाता हूँ तो सबसे पहली दृष्टि वहाँ के साधु और पंडों के दुश्चरित्र पर मेरी पड़ती है ।
यदि मैं भागवत पढता हूँ तो सबसे पहले प्रयास करता हूँ कि रासलीला किस स्कंन्ध में है ! वही पहले पढ लूँ।
मुझमें अपने वेद, शास्त्र, पुराण, उपनिषद, सामाजिक व्यवस्थाओं, नाना प्रकार की उपासनाओं, साधू,संत,महात्माओं, भाषाओं और प्रान्तों में,राष्ट्रों में,संस्कृति और विभिन्न सभ्यताओं में मात्र उनके दुर्गुण और दोष ढूँढने की आदत सी पड गयी है,!
इसे ही-“सकटासुर” कहते हैं।
जिस पालने के नीचे ! मेरे प्रियजी जी पालने में सो रहे थे ! उसी सकट पर ! उसी बैलगाडी पर मक्खी बनकर बैठा था सकटासुर।
मंदिर, तीर्थयात्रा, धार्मिक स्थान, संत-महापुरुषों के पास मैं मक्खी बनकर जाता हूँ !उनकी बुराईयाँ को देखने जाता हूँ !किंतु एक रहस्य की बात है यदि अपने ऊपर मैं भरोसा करूँ-
अपने मंदिरों पर ! अपने तीर्थों पर ! अपने शास्त्रों पर यदि विश्वास हो जाये मुझे तो ये काम, क्रोधादि रूपी लहरें धीरे-धीरे मध्य समुद्र की भाँति शान्त हो जायेंगी।
मुझे शंकराचार्यजी के ये वचन स्मरण आते हैं कि-
“पूर्वं_भवान्_ब्रम्हरसस्य_भोक्
#भुड़्क्त्ते रसं लौकिकमत्र निन्द्यम्।।
अन्नादिकोषं च_विहाय नित्यं।
आनन्दरूपे नितरां रमस्व।।”
आप प्रथम तो ब्रम्हानंद के भोक्ता थे,और ये क्या ! आप साधुजनों द्वारा निन्दनीय लोकरसों का उपभोग करने लगे !प्रिय बच्चों !आप दुःषित अन्नादि के संस्कारों से निर्मित् अन्नमय-कोशों का परित्याग कर दें ! तथा नित्य ही अपने आनन्द-मय स्वरूप प्रिय-प्रियजी के साथ रमण करें ।
और यही इस सूत्र का भाव भी है ! भक्तिसूत्र के अगले अंक के साथ पुनश्च उपस्थित होता हूँ …-आनंद शास्त्री….सचल दूरभाष क्रमांक ६९०१३७५९७१
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प्रिय बच्चों ! मैं पुनःआप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र
“कस्तरति-कस्तरति मायात् यत्संगात्यजति यो महानुभावं सेवते यो निर्ममो भवति।।४६।।
कौन तरता है कौन तरता है माया से ? जो सब संगों का त्याग करता है, जो महापुरुषों की सेवा करता है, जो ममता रहित होता है।।
इन भक्ति सूत्रों की संरचना मन, बुद्धि, ज्ञान अथवा विवेक से नहीं हो सकती थी ! ये “भक्ति”तो मन से लेकर विवेक तक के द्वारा संभव है ही नहीं, ! यह तो समर्पण से संभव है; नारद जी इस सूत्र में दो बार कहते हैं कि ——
“कस्तरति – कस्तरति मायात्”
कौन तरता है, कौन तरता है, माया से ?
संक्षेप में माया की एक और व्याख्या करता हूँ -“म + आया = माया” “म” अहंकार को कहते हैं, “मैं” पन को कहते हैं- अपनी प्रसिद्ध पुस्तक”द लीविंग मी”में शोपेन हर कहते हैं कि —
“I’m something, you are nothing;
I’m nothing, you are everything.”
यह #मैं” ही डूबाता है भवसागर में, सबसे बडा शत्रु पूरे ब्रह्माण्ड में “मैं” ही है, ! यही आता है,!! यही जाता है, !!इस ‘मैं’ ने ही हे मेरे प्रियजी को मुझसे दूर ! बहुत दूर कर रखा है।,हे प्यारों !!सूफी संत नजरूल हक कहते हैं कि —
“मिटा दे अपनी हस्ती को गर कोई मर्तबा चाहे।
कि दाना खाक में मिलकर गुले गुलजार होता है॥”
नारदजी!!”कस्तरति – कस्तरति माया” अब इसका उपाय भी नारद जी बताते हैं माया से तरने का सरल सा उपाय, इस “मैं” पन से छूटने का सुन्दर सा सरल सा उपाय!नारदजी बताते हैं”यत्संगात् त्यजति।”
जो इस “मैं” का संग छोड देते हैं, त्याग देते हैं “संग” को !और यह संग क्या है ?,
सुख-दु:ख, लाभ-हानि, जय- पराजय, मान-अपमान, शत्रु-मित्र, इन सभी भावनाओं के प्रकट होने का कारण क्या है ?
इस संसार रूपी महाभारत का मात्र एक ही कारण है
“अयं बंधू परा नेती गणना लघुचेतसाम्।
उदार चरितानाम् वसुधैव कुटुम्बकम्॥
मेरे प्रियजी ने गीता जी में स्पष्ट कर भी दिया है कि-
“ध्याययते विषयांपुंस: सऽगंतेश्पजायते”
“यत्संगात् त्यजति” जब तक मेरी दृष्टि में कोई “मेरा अपना” होगा तो इसका प्रकारांतर से यह भी अर्थ होता है कि “कोई पराया” भी होगा,!
इतना ही नहीं!!उस अपने के अतिरिक्त सब पराये होंगे ! और महाभारत तब तो होगा ! तभी वैमनस्य होगा!! तभी तो असंतुष्टि होगी।
“संगात् संजायते काम: कामात्क्रोधाभिऽजायते”
तभी शत्रुता होगी ! वैर होगा ! और यदि कोई अपना ही न हो तो फिर “पराया कौन”होगा ?
और पुन: नारद जी आगे कहते हैं कि—
“यो महानुभावा सेवते”
युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया तो यज्ञ-कार्यों का वितरण हो रहा था,!! कार्यानुसार लोग अपने- अपने मन की, अपनी-अपनी सुविधा ! एवं अपनी पारंगततानुसार दायित्व आगे बढ-बढ कर ले रहे थे,!!सभी कार्य बँट गये-
अंत में मेरे प्रियजी ने कहा कि सभी काम तो बँट गये, एक काम शेष बचा है ! बस वह मैं करूँगा ! तो सभी ने आश्चर्य से पूछा कि क्या काम शेष है ?
तो “साँवरे जी” बोले की “भँडारे” के बाद सबकी जूठी पत्तल मैं उठाऊँगा यही तो है”यो महानुभावां सेवते” बच्चों!बिलकुल यही स्वभाव मैंने-“दिलीप कुमार”में देखा है! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं में देखा है! संघ की शाखाओं में जाकर मैंने जूठी पत्तलों को उठाना,साफ-सफाई करना सीखा है! यह दैवीय गुण है।
मैं स्वर्ण मंदिर अमृतस में जाकर मोहित हो गया!!करोडपति घरों की सिक्ख महिलायें पंगत से थालियाँ उठा रही थीं ! झूठन साफ कर रही थीं!! थालियाँ धो रही थीं !वहाँ परिसर में झाड़ू,पोंछा, लंगर के लिये प्रसाद पका रहे थे-एक से एक धनाढ्य मेरे सिख-भाई-“सत् नाम वाहेगुरू यही तो है सत् श्रीअकाल”
आगे कहते हैं कि –“यो निर्ममो भवति”
गूढ वाक्य है यह ! तो जो माया को त्याग देते हैं ! संग छोड़ देते है ! सबकी सेवा करते हैं!! संतों की सेवा करते है— वह-“निर्मम” हो जाते हैं —
प्रिय बच्चों ! गुजरात के प्रसिद्ध संत भक्त “नरसी मेहता” की एकमात्र संतान थी ! जब वह संतान ८ वर्ष की हुई तो वह बीमार हो गयी ! नरसी ने उसका उपचार कराया!! किंतु वह बची नहीं ! तो उसके मरने से उनकी पत्नी, कुटुम्बी सभी रोने लगे तो नरसी मेहता ने हँसकर कहा—-
ભલૂ થયૂં ભાજી જંજાલ,હવે ભજીશૂં શ્રી ગોપાલ.
और यही इस सूत्र का भाव भी है ! भक्तिसूत्र के अगले अंक के साथ पुनश्च उपस्थित होता हूँ …-आनंद शास्त्री….सचल दूरभाष क्रमांक ६९०१३७५९७१
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भक्तिसूत्र प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद विरचित सूत्र~४७
प्रिय बच्चों ! मैं पुनःआप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र
“यो विविक्त स्थानं सेवते यो लोकबन्धनुन्मूलयति निस्त्रैगुण्यो भवति यो योगक्षेमं त्यजति।।४७।।”
जो निरजन स्थान का सेवन करते हैं, लौकिक बन्धनों को तोड़ देते हैं, तीनों गुणों से पार हो जाते हैं तथा जो योग और क्षेम का त्याग कर देते हैं।।
भक्ति सूत्र अपने आप में जिन उच्चत्तम भक्ति की पराकाष्ठाओं को समेटे हुए है,!! इसका आभास आप पुन: देखें, नारद जी आगे कहते हैं कि- “ये विविक्त स्थानं सेवते”
भक्त को एकांत स्थान का सेवन करना चाहिये।
इसके भाव को समझना होगा ! युगानुसार मान्यतायें भी मुझे आपको परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित करनी होगी ! आप अगर घर छोडकर वन में जाओगे ! तो वहाँ भी पशु हैं,! पक्षी हैं! बेल,वृक्ष,वन- रक्षक,सरकारी विभागों के नियम, नदी, सूर्य, चाँद, तारे हैं।
और तो और आप खुद भी तो हैं-तो एकांत कहाँ से मिलेगा ?
“ऐकांत” अर्थात “ऐ-ये+अंत:करण”आपका अपना अंत:करण प्रथम अकेला कर लो।
“विविक्त”, “व” किसे कहते हैं ?
“व” शून्य को कहते हैं,!! एक सुन्दर सी बात मैं आपसे कहता हूँ– १-१=० होता है,!! अगर मैं अपने प्रियजी में समा जाऊँ, उनके सिवा किसी को देखूँ ही नहीं ! घर-बार, रिश्ते-नाते, संबंध सब में बस उनको ही देखूँ ! और वो तो मुझमें तो समाये हैं ही !
मेरे बहुत सारे तथाकथित सम्बन्धी, शिष्य,मित्र,परिचित,गली के लोग कहते हैं-“शास्त्री जी” आप किसी से बोलते नहीं! हमें कभी फोन भी नहीं करते! हमसे कोई अपेक्षा भी नहीं रखते! हमसे किसी की कभी कोई शिकायत भी नहीं करते ! आप कैसे हो गये ?
यहाँ मैं केवल इतना ही कहूँगा कि-“राधा कृष्ण में समा गयीं-कृष्ण राधा में समा गये”
“एकदिन राधिका ने कहा श्याम से बात सुनलो कोई भेद जाने नहीं।
मैं कन्हैया बनूँ तुमबनो राधिका यहाँ गोकुल का कोई सयाना नही॥”
लो ! ना मैं बचा, ना ही वो बचे, बस अगर बचा तो -“एक अद्भुत मिलन, संयोग”
जब तक कुछ भी शेष है ! तब तक भक्ति हो ही नहीं सकती।
मेरे स्वयं के लिये मेरी माँ सुतपा देवी के अतिरिक्त कोई है ही नहीं! वही मेरी माँ,आदर्श,गुरू,भगवती सबकुछ हैं! आप स्मरण तो करें–
भरत की हीरण में अटकी लिप्सा ने उन्हें पुन: “जडभरत” के अवतार में ला पटका था ! और ये एकांत ! संसार के किसी भी कोने में नहीं हो सकता अगर आपके भीतर न हो तो ! और अगर भीतर एकांत है तो बाहर कुछ हो ही नहीं सकता।
प्रिय बच्चों ! हम घर में रहें ! संसार में रहें- यह समस्या नहीं है ! समस्या तो यह है कि घर हमारे भीतर घुसा हुआ है,पुन: आगे कहते हैं कि –
“लोकबन्धुनुन्मूलयति”
जो लोकबंधनों को तोड देता है ! माता- पिता,पति-पत्नी,संसार, मित्र-शत्रु, अपना-पराया, नियम-मर्यादा– इन सभी में यह विवेक करना ही होगा कि मेरे साँवरे जी की भक्ति में बाधक कौन-कौन हैं,! यह आपके स्वविवेक पर आधारित है॥
शारीरिक संबंध और आत्मीय संबंध के अंतर को समझना होगा। जैसे मीराबाई ने अपने पति को छोडा!! किंतु संत संग नहीं छोडा; चित्तौड गढ छोड दिया ! किंतु रणछोड को नहीं छोडा!!
जनक ने, कबीर ने, नरसी मेहता ने सभी को छोडते हुए भी किसी को नहीं छोडा, संत कबीर कहते हैं कि —
“माँ मारै धीरज धरै गाय समूची खाय।
पिता मारि भक्षण करै सो वैकुण्ठे जाये॥”
“माँ” अर्थात् “मैं” पन को मारे, धैर्य रखे;!!
“गौ” अर्थात् “इन्द्रियों” के सम्पूर्ण विषयों को खा ले, पचा लें!! पिता अर्थात् पित्त को, क्रोध को मार दें, नीलकंठ बन जायें, खा लें-वे ही वैकुण्ठ के अधिकारी होते हैं।
पुनः कहते हैं कि-“निस्त्रैगुण्यो”एक बात कहता हूँ-मैं आपका सच्चा मीत्र हूँ, मेरे “साँवरे जी” मेरे मित्र हैं !”मित्रता”अर्थात्-“म+ इति + त्रयता”!!” “म” अहंकार को कहते हैं,”सात्विक – राजसिक – तामसिक” ये तीनों ही प्रकार के अहंकारों की जिन संबंधों में “इति” हो जाती है ! अंत हो जाता है ! उसी से वास्तविक मित्रता सम्भव हो पाती है।
ना वो मुझे कभी धोखा देंगे ! न आपको देंगे!! और न ही मैं भी आपको दूँगा!! और इसका सामान्य सा कारण है कि हमारे-आप और मेरे प्रियजी के मध्य सांसारिक स्वार्थ के सम्बन्ध नहीं है,तो भला कटुता आयेगी तो भी कैसे आयेगी ?
यही नारद जी कहते हैं कि “निस्त्रैगुण्यो” और यही मेरे प्रियजी गीता में कहते भी हैं कि-
“त्रैगुण्या विषयाऽवेदा: निष्त्रैगुण्ये भवार्जुन:”
और प्रिय बच्चों ! पुनः कहते हैं कि- “यो योगक्षेमं त्यजति”
अप्राप्त की प्राप्ति का नाम “योग” है!! और प्राप्त की रक्षा करने को “क्षेम” कहते हैं,!!
इसकी व्याख्या आगे भी करूँगा, किंतु अभी इतना ही कहना पर्याप्त है कि भक्त न तो किसी साधन की प्राप्ति का प्रयत्न करता है ! और न ही जो कुछ भी है ! उसकी सुरक्षा का यत्न।
और यही इस सूत्र का भाव भी है!! भक्तिसूत्र के अगले अंक के साथ पुनश्च उपस्थित होता हूँ …-आनंद शास्त्री….सचल दूरभाष क्रमांक ६९०१३७५९७१
प्रिय बच्चों ! मैं पुनःआप सबकी सेवामें देवर्षि नारद कृत भक्ति-सूत्र
“य: कर्मफलं त्यजति कर्माणि संन्यसति ततो निर्द्वन्द्वो भवति॥”
जो कर्मफल का त्याग कर देते हैं,वे कर्मों का भी त्याग कर देते हैं, तथा निर्द्वन्द्व हो जाते हैं॥
कृष्णानुरागी प्रिय बच्चों !इसके पूर्व सूत्र में देवर्षि ने योगक्षेम का परित्याग करने की सलाह दी थी !अप्राप्त की प्राप्ति योग है!! और उस प्राप्त पदार्थ या भावना की रक्षा-“क्षेम” कही जाती है,!! इस योगक्षेम को समझने हेतु अडतालीसवें सूत्र को प्रस्तुत करते हुए नारद जी कहते हैं कि-
“य: कर्मफलम् त्यजति”
वर्तमान जीवन में अपनी अन्त:शक्तियों, अन्त:विधाओं को विकसित करना,!! सोपान प्रति सोपान संयम का पालन करते हुए श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करना !अपने आप में आवश्यक तो है ! किंतु कर्मफलों का त्याग करना अत्यंत ही दुष्कर है—
“हीरों की चोरी करूं सूई का कर दूँ दान।
ऊँट पर चढ कर देखता कब आयेगा विमान॥”
यह परम्परा सी चल पडी है- येन-केन प्रकारेण पैसे कमाओ और उसमें से थोडा सा मंदिर- मस्जिद में दान कर दो ! किसी आश्रम में दान कर दो! और साथ में एक बडी सी अपने नाम की शिलापट्टिका जरूर लगा दो।
अन्यायोपार्जित धन जितना स्वयं के लिये घातक है, उससे हजारों- हजार गुणा ऐसा धन संत, महापुरुषों, मंदिरों की अन्तर चेतना को भी दूषित करता है! आप स्वयं ही देखें लगभग सभी के सभी प्रसिद्ध आश्रमों के तीर्थ क्षेत्रों में बने विशालकाय भवनों में उनके स्थानीय प्रबन्धन का व्यवहार तीर्थयात्रियों हेतु बिलकुल ही व्यावसायिक और साथ ही साथ अपमानजनक होता है! वे होटलों से अधिक रुपये लेते हैं! घटिया सुविधा देते हैं और तीर्थयात्रियों के साथ पशुवत् व्यवहार करते हैं।
वहां स्थित प्रबंधन कर्ता जो स्वामी जी होते हैं उनमें भक्ति,श्रद्धा, शास्त्रज्ञता,करुणा,परोपकार,सर्
मुझे स्मरण हो रही है एक कथा, पाटलिपुत्र में महात्मा बुद्ध की ताँबे की एक विशाल प्रतिमा के निर्माण हेतु वहाँ के धम्म संघ ने प्रजा से ताँबे का दान देने का प्रस्ताव रखा।
बडे- बडे श्रेष्ठियों ने क्विंटल चार क्विंटल ताम्रधातु मूर्ति निर्माण हेतु देना प्रारम्भ कर दिया,!! एक छोटी सी बालिका ने अपनी गोलक तोडी और जमा किये हुए दस पाँच ताँबे के सिक्के लेकर वह श्रावक के पास गई ! किंतु श्रावकों ने उसे झिडककर भगा दिया ! दूसरी तरफ धनाढ्य दान-दाताओं से प्राप्त हजारों- हजार क्विंटल ताँबे को गलाकर प्रतिमा का निर्माण किया गया-
किंतु जब प्रतिमा को देखा गया तो ! बुद्ध की प्रतिमा विकृत और रोती हुई प्रतीत हुई !पचासों बार मूर्ति को गलाया गया ! और बनाया गया ! किंतु बुद्ध का सौम्य मुखमण्डल विकृत ही देखने को मिला।
सभी भिक्षुक परेशान हो चुके थे! अंतत: भिक्षु-श्रेष्ठ-“भानुसागर जी” को उस बालिका का स्मरण हो आया ! वह पूरे संघ के साथ उस बालिका के घर जाते हैं और उस बालिका से अपनी झोली फैलाकर वही सिक्के प्राप्त करते हैं!!और जब उस प्रतिमा का निर्माण पुन: होता है !तो श्री तथागत् बुद्ध अपनी सौम्य मुद्रा के साथ आभाषित होते हैं!! इसका कारण क्या है ?
उस बालिका ने निष्काम भाव से, बिना किसी प्रतिफल की कामना से उन सिक्कों को देना चाहा था ! प्रिय बच्चों ! गुरू गोरखनाथ जी कहते हैं कि-
“बस्ती में रहना मेरे भाई माँगि के खाना मेरे भाई! टुकडो मे टुकणा कर देना मेरे लाल !!”
श्रेष्ठ कर्मों को करो,किंतु उनके फल का त्याग कर दो-
“कर्माणि संन्यस्ति ततो निर्द्वन्द्वो भवति” कर्म से संन्यास लेना है ! प्रिय बच्चों –
“कहा भयो है भगवा पहेरण्यां घर तजि भये संन्यासी।
जोगी भये जुगती नहीं जाणी उलटि जनम् फिर आसी॥”
मैं एक अलौकिक घटना आपको बताता हूँ–
जब रित्त्वीजा के गर्भ में अष्टावक्र जी पल रहे थे तो छठे माह में उन्होंने सोचा कि गर्भ में मेरे हिलने डुलने से मेरी माँ को कष्ट होगा तो-अपनी माँ को सुख देने के लिये उन्होंने हिलना डुलना बंद कर दिया।
माँ ने तो रोना शुरू कर दिया ! उफ्फ ! मेरा गर्भ समाप्त हो गया! पूरा परिवार रूदन कर रहा था ! अर्थात स्वाभाविक प्रक्रियाओं को अस्वाभाविक कर्म मान्य नहीं हैं।
कभी- कभी अच्छा करना भी बुरा हो जाता है ! घर छोडना त्याग नहीं है ! भगवा पहनना त्याग नहीं है ! कर्मों के फल को छोडना ही संन्यास है।
और यही इस सूत्र का भाव भी है!! भक्तिसूत्र के अगले अंक के साथ पुनश्च उपस्थित होता हूँ …-आनंद शास्त्री….सचल दूरभाष क्रमांक ६९०१३७५९७१