बाढ़ की विभीषिका: तबाही, पलायन, पुनर्निर्माण

बाढ़ केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि अनगिनत सपनों, आशाओं और उम्मीदों को अपने साथ बहा ले जाने वाली त्रासदी है। जब उफनती नदियाँ गाँवों और शहरों की अपनी चपेट में लेती हैं, तब केवल घर और खेत ही नहीं उजड़ते, बल्कि लोगों की रोजी-रोटी की मेहनत, उनका आत्मविश्वास और भविष्य का आधार भी बिखर जाता है। असम में यह दृश्य कोई नया नहीं है। ब्रह्मपुत्र और उसकी अनेक सहायक नदियाँ हर वर्ष मानसून के साथ उफान पर आती हैं और लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं। 2025 की भीषण बाढ़ ने विशेष रूप से ऊपरी असम के कई क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई। हजारों घर जलमग्न हो गए, फसलें नष्ट हो गईं। राहत शिविरों में लोगों ने शरण ली और काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के अनेक वन्यजीव भी इस आपदा से प्रभावित हुए।

बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी अपनी संघर्ष शुरू होता है। चारे और कीचड़, टूटी दीवारों और उजड़े हुए घर पीछे छोड़ते हैं। दूषित पानी के कारण हैजा, डायरिया, मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियाँ फैलने लगती हैं। स्वच्छ पेयजल और भोजन की कमी बच्चों, बुजुर्गों तथा महिलाओं के लिए गंभीर संकट बन जाती है। अपने घर, आजीविका और प्रियजनों की खोज का दुख मन पर गहरे घाव छोड़ जाता है, जिन्हें समय भी आसानी से भर नहीं पाता।

जब घर और रोजगार दोनों छिन जाते हैं, तब अनेक परिवार अपने गाँव छोड़कर शहरों की ओर पलायन करने को विवश हो जाते हैं। यह केवल स्थान बदलने की यात्रा नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और सम्मान को बचाने का संघर्ष होता है। पीछे छूट जाती हैं अपनी मिट्टी, अपना आँगन और अनगिनत स्मृतियाँ।

फिर भी, असम की पहचान केवल बाढ़ नहीं, उसका अदम्य साहस भी है। हर वर्ष लोग टूटे हुए घरों की फिर से शुरुआत करते हैं, खेतों में दोबारा बीज बोते हैं, जीवन को नई दिशा देने का हौसला जुटाते हैं। बेहतर आपदा प्रबंधन, समय पर चेतावनी, पर्यावरण संरक्षण और मानवीय संवेदनशीलता से इस संघर्ष को कम किया जा सकता है। बाढ़ बहुत कुछ छीन लेती है, पर यदि उम्मीद, एकता और मानवता जीवित रहें, तो हर अंधेरी रात के बाद एक नई सुबह अवश्य आती है।

~ प्राची यादव

पाँचवीं सेमेस्टर, बी टेक जोरहाट आई एस टी

Leave a Comment