बांकीपुर और दतिया का संदेशभ्रष्ट नौकरशाही-दलबदलू प्रेम,नकारे विधायक-सांसद भाजपा का संहार कर देंगे       

आचार्य श्रीहरि

बिहार के बांकीपुर विधान सभा और मध्यप्रदेश के दतिया विधान सभा उपचुनाव के परिणाम ने भारतीय जनता पार्टी को असहनीय आधात दिया है, आईना दिखाया है, जातिवाद और वंशवाद आधारित जीत की गारंटी के अंहकार को जमींदोज कर दिया है। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की टेक्नोलाॅजी और पीआर सोच को भी धसौड दिया है और यह प्रमाणित कर दिया है कि टेक्नोलाॅजी आधारित चुनाव प्रक्रिया और विष कन्या आधारित प्रचार तंत्र सफलता की गारंटी नहीं हो सकते हैं। हवाहवाई नेताओं की मीठी-मीठी बातें और उनकी पैंतरेबाजी भी अब जीत की गारंटी नहीं हो सकती हैं।मिस्डकाॅल आधारित पार्टी सदस्यता की प्रक्रिया भी आत्मघाती है। भाजपा को अब अपनी वर्तमान की सभी चुनावी सोच और प्रक्रिया पर फिर से विचार करने की जरूरत होनी चाहिए। सबसे बडी बात यह है कि भ्रष्ट नौकरशाही को बेलगाम छोड़ना, भ्रष्ट नौकरशाही को जनता का नौकर नहीं बल्कि जनता का मालिक बना देना, जनता के लिए सीधे यमराज बना देना, विषकन्याओं, दलालों, ठेकेदारों और पेशेवर लोगों को रातोरात भाजपा की शीर्ष श्रेणी पर बैठा देना, दलबदलुओं को अपना आईकाॅन बना देना, थैली शाहों को पार्टी में पदाधिकारी बना कर पुरस्कृत कर देना, छोटी और निर्धन जातियों को हाशिये पर खडे रखने की मानसिकताओं के साथ ही साथ अपने समर्पित काय्र्रकर्ताओं को गुलाम समझ लेना और उनकी वैचारिक प्रतिब्धता को पैरों से रौंदन की सोच भाजपा की लूटिया इसी तरह डूबोती रहेगी। लेकिन भाजपा इस पर सोच विचार कर ही नहीं सकती है, इस पर निर्णायक मंथन कर ही नहीं सकती है, क्योंकि उनका दलबदलू प्रेम और भ्रष्ट नौकरशाही पर अति आत्मविश्वास कम होने वाला ही नहीं है। जानकारी रखना यह जरूरी है कि किसी भी सरकार की व्यक्तित्व और पार्टी समृद्धि वाली कल्याणकारी योजनाओं का संचालन इन्ही के कंधों पर होता है और सरकार की परियोजनाओं का पलीता भ्रष्ट नौकरशाही ही लगाती है, सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को भष्टाचार के गटर में नौकरशाही ही डूबोती है।
                   उपचुनाव के मुद्दे आम चुनाव के मुद्दे से भिन्न होते हैं। उपचुनाव के मुद्दे स्थानीय होते हैं और उप चुंनाव में पार्टी के उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि भी खूब काम करती है, खूब धमाल मचाती है, जातिगत समीकरण भी काम करता है। बिहार के बांकीपुर सीट की चुनावी समीकरण और तथ्य को देखेंगे तो पायेंगे कि भाजपा ने जातिवाद को संरक्षण दिया और वंशवाद को भी संरक्षण दिया। जातीय समीकरण की समझ भाजपा की बहुंत ही गलत थी और तथ्यों से परे भी थी। भाजपा की समझ है कि बांकीपुर सीट कायस्थ बहुल है। इसलिए इस सीट पर भाजपा का हमेशा उम्मीदवार कायस्थ ही होगा। नवीन सिन्हा और उसका बेटा नितिन नवीन 35 सालों तक विधायक रहें थे। इस दौरान किसी भी अन्य जातियों को विधायक बनने का अवसर नहीं मिला। बांकीपुर की जनता ने इस बार सोचा कि जब कायस्थ जाति ही हमंेशा के लिए अनिवार्य होगी और अन्य का अवसर कभी भी नहीं मिलेगा तो फिर वे भाजपा को वोट क्यों करें? यही भावना प्रबल हुई। भाजपा क्या यह जवाब दे सकती है कि नवीन सिन्हा की मृत्यु के बाद उसके बेटे को ही उम्मीदवार क्यों बनाया गया? क्या यह भाजपा का वंशवाद और जातिवाद नहीं है? उम्मीद थी कि नितिन नवीन के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद इस सीट से अन्य किसी को चुनाव लडने के लिए अवसर दिया जायेगा पर यह उम्मीद गलत साबित हुई्र। भाजपा ने नितिन नवीन की ही जाति कायस्थ को ही उम्मीदवार बना डाला। पहले पशुपालन घोटालेबाज के परिजन से संबंध रखने वाले को टिकट दिया गया, उसके बाद उसे बदल दिया गया और एक अन्य और अनजान कायस्थ को टिकट दे दिया। सबसे बडी बात यह है कि बांकीपुर विधान सभा सीट कायस्थ बहूल भी नहीं है। सबसे बडी जाति आबादी बनियों की है। बनियों के बाद यादव, कुर्मी, भूमिहार और कहार जाति की है। आबादी के मामले में कायस्थ जाति आठवे नबंर से पीछे आती है। भाजपा का समर्पित वोटर बनियों का कमाल है कि भाजपा सम्मानजनक वोट पायी। बनियों ने अगर भाजपा को वोट नहीं दिया होता तो फिर भाजपा के कायस्थ उम्मीदवार की जमानत भी नहीं बचती। दतिया की कहानी भी भाजपा की समझ का जहरीला उदाहरण है। दतिया में भाजपा का ब्राम्हणवाद ले डूबा। दतिया की तीन जातियां महत्चपूर्ण हैं। पहली पटेल, दूसरी ठाकुर और तीसरी ब्राम्हण। पटेलों की संख्या अधिक होने के बाद भी भाजपा हमेशा उनकी उपेक्षा करती है और ब्राम्हणवाद पर दांव लगाती है, भाजपा की यह दांव पिछले दो चुनावों से बेमौत मर रही है। पहले नरोत्तम मिश्रा और इस बार आशुतोष तिवारी चुनाव हार गये। कांग्रेस ठाकुरों पर दांव लगाती है जो जीत की कहानी भी बनती है। ब्राम्हणों की जातिवादी यूनियनबाजी का दुष्प्रभाव है कि पटंेल और दलित भाजपा से अलग हो गये। अनिल मिश्रा नाम के वकील ने दलितों के खिलाफ राज्सस्तरीय अभियान चलाया था। इस कारण मध्य प्रदेश के दलितों का आक्रोश भाजपा और ब्राम्हणों के खिलाफ है। इसका प्रभाव दतिया में देखा गया। दतिया के दलितों और अन्य पिछडी जाति के लोगों ने भी ब्राम्हणों के खिलाफ कांग्रेस को वोट देने का काम किया। इस ब्राम्हण विरोधी समीकरण को भाजपा क्यों नहीं देख पायी।
            मिस्डकाॅल आधारित भाजपा की सदस्यता प्रक्रिया ने भी भाजपा की शक्ति और छवि को कमजोर कर रही है और भाजपा को दीमक की तरह चाट रही है। मिस्डकाॅल से वैसे लोग भी भाजपा के सदस्य बन गये हैं जो भाजपा के विरोधी हैं, जिहादी हैं, जिनके विचार भाजपा विरोधी हैं और भाजपा के खिलाफ सक्रियता रखते हैं। भाजपा पूरी तरह से दलबदलुओं और विरोधी विचार धारा के लोगों के जाल में फंस चुकी हैं। भाजपा ने वैसे-वैसे लोगों को गले लगाने का काम किया है जो भाजपा को गालियां देने का काम करते थे, भाजपा को भारत जलाओ पार्टी कहते थे, नरेन्द्र मोदी को संहारक कहते थे, हिन्दुओं को सांप्रदायिकता के प्रतीक कहते थे। अभी-अभी उत्तर प्रदेश के एक क्षेत्रीय बैठक में एक बडे नेता ने यह प्रश्न उठाया था कि जो व्यकित भाजपा के सक्रिय सदस्य भी नहीं रहे हैं, जिन्होंने दो-चार सदस्य भी नहीं बनाये है वे  लोग कैसे भाजपा के प्रदेश, क्षेत्रीय और जिला पदाधिकारी बन जाते हैं? इस प्रश्न को लेकर काफी चर्चा हुई और यह प्रश्न भाजपा के समर्पित कार्यकर्ताओं के सम्मान के साथ जुडा हुआ था। पर सच तो यही है कि भाजपा में आज समर्पित कार्यकर्ता बचे ही नहीं है। समर्पित काय्रकर्ता हाशिये पर हैं,घर बैठ गये हैं। इसका सीधा असर यह हो रहा है कि भाजपा की जडें लगातार कमजोर हो रही हैं। हिन्दुत्व की अनिवार्यता का भार कबतक भाजपा के कार्यकर्ता ढोते रहेंगे।
                भ्रष्ट नौकरशाही और नकारे सांसद-विधायकों पर विचार करना चाहिए। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की ईमानदारी पर कोई शक नहीं है। पर राज्यों में जहां भी भाजपा की सरकारें हैं वहां पर नौकरशाही पूरी तरह से भ्रष्ट है और अराजक है। अभी-अभी छतीसगढ का एक प्रसंग महत्वपूर्ण है और देश भर में कुचर्चित हुआ है। एक आईएएस अफसर ने रायपुर के सांसद ब्रजमोहन अग्रवाल को सीधे धमका दिया और कह दिया कि जहां जाना है जाओ, संसद में शिकायत करो या फिर मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री से शिकायत करो। जब भ्रष्ट नौकरशाही भाजपा के सांसद-विधायक को ही नहीं सुनते हैं तो फिर भाजपा के आम कार्यकताओं की क्या औकात है?भाजपा शासित राज्यों की नौकरशाही जनता के लिए सीधे यमराज होती है। विधायक और सांसद भी नकारे हैं, भाजपा के सांसद और विधायक नरेन्द्र मोदी के चमत्कार पर निर्भर हैं उनकी समझ है कि जब तक नरेन्द्र मोदी हैं तबतक जनता सेवा की जरूरत नहीं है, जनता हमें नहीं, बल्कि नरेन्द्र मोदी को वोट देती है, इसलिए जनता के लिए उपलब्ध रहने की जरूरत नहीं है, जनता के लिए काम करने की जरूरत नहीं है।भाजपा के समर्पित कार्यकर्ताओं की स्थिति इतनी विकट है कि संकट के समय भाजपा के सांसद और विधायक काॅल तक रिसीव करने के लिए तैयार नहीं रहते हैं।
             हिन्दुत्व अभी भी जीवंत है। हिन्दुत्व की कसौटी पर ही भाजपा को जीत मिलती है। भाजपा के समर्पित कार्यकर्ता और राष्ट्रवादी जनता भाजपा को विकास और उन्नति के लिए वोट नहीं देती हैं। हिन्दुत्व की सुरक्षा और देश की सुरक्षा के लिए वोट देते है, देशद्रोहियों के संहार के लिए वोट देते हैं। सही भी यही है कि अभी भी भाजपा एक मात्र पार्टी है जो हिन्दुत्व की सुरक्षा और संरक्षण की बात करती है। पर भाजपा को यह समझना होगा कि मिस्डकाॅल वाले कार्यकर्ता उनके लिए असली समृद्धि और शक्ति नहीं हैं, समर्पित कार्यकर्ता ही उनकी असली पहचान और शक्ति हैं? टेक्नोलाॅजी पर अति निर्भरता और पीआर विष कन्याओं पर अतिविश्वास भाजपा को चुनाव नहीं जीता सकती है। इसका दुष्परिणाम 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा भुगत चुकी है, सभी परिस्थितियां समर्थन में खडी थी फिर भी भाजपा को बहुमत नहीं मिला। अपने शासित राज्यों की नौकरशाही को भाजपा अब भी ईमानदार और कर्मठ बनायेगी, यह कहना मुश्किल है। भाजपा अपने पदाधिकारियों, सांसद और विधायकों को जनता और कार्यकर्ताओं के प्रति समर्पित बनायेगी, यह भी उम्मीद नहीं बनती है।

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आचार्य श्रीहरि
नई दिल्ली

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