बराक घाटी को नशे का कॉरिडोर बनने से बचाना होगा

केवल खेप जब्त करने और तस्करों को गिरफ्तार करने से खत्म नहीं होगा नशे का कारोबार, पूरे नेटवर्क की जड़ों पर करना होगा प्रहार

बराक घाटी में नशीले पदार्थों की लगातार हो रही बड़ी बरामदगी ने एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कभी सैकड़ों ग्राम तो कभी करोड़ों रुपये मूल्य की हेरोइन, क्रिस्टल मेथामफेटामाइन और अन्य प्रतिबंधित नशीले पदार्थों की खेप पकड़ी जा रही है। कछार जिले के धोलाई, लैलापुर और शिलचर के आसपास सामने आ रही ऐसी कार्रवाइयां इस बात का संकेत हैं कि यह समस्या अब केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और युवा पीढ़ी के भविष्य से भी जुड़ गई है।

बराक घाटी की भौगोलिक स्थिति इसे पूर्वोत्तर के महत्वपूर्ण संपर्क क्षेत्रों में शामिल करती है। मिजोरम और अन्य सीमावर्ती इलाकों से आने-जाने वाले मार्गों के कारण यहां परिवहन और व्यापार की संभावनाएं हैं, लेकिन इसी संपर्क व्यवस्था का दुरुपयोग नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए किए जाने की आशंका भी चिंता बढ़ाती है। हाल की बरामदगियों में मिजोरम से संभावित संबंध की बात सामने आई है। हालांकि, जांच पूरी होने से पहले किसी मार्ग, व्यक्ति या समुदाय को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में नशीले पदार्थ कहां से आ रहे हैं, इन्हें कौन मंगा रहा है, इनके पीछे कौन-सा संगठित नेटवर्क काम कर रहा है और इनकी बिक्री से प्राप्त धन किसके पास पहुंच रहा है? जब करोड़ों रुपये मूल्य की खेप पकड़ी जाती है, तो यह समझना जरूरी है कि इसके पीछे केवल कुछ वाहक या छोटे तस्कर नहीं, बल्कि एक व्यापक आपूर्ति और वित्तीय तंत्र भी हो सकता है। इसलिए कार्रवाई का दायरा खेप जब्त करने और मौके पर मौजूद आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों को इस कारोबार की जड़ों तक पहुंचना होगा। मादक पदार्थों की आपूर्ति के स्रोत, परिवहन व्यवस्था, गोदामों, वितरकों, वित्तीय लेनदेन और हवाला नेटवर्क की गहन जांच आवश्यक है। संदिग्ध संपत्तियों और बैंक खातों की जांच कानूनी प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए। विभिन्न राज्यों की पुलिस, असम राइफल्स, सीमा सुरक्षा बल, राजस्व खुफिया निदेशालय और अन्य केंद्रीय एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना भी समय की मांग है। मिजोरम, मणिपुर और असम की एजेंसियों के बीच खुफिया सूचनाओं का नियमित आदान-प्रदान इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

इसके साथ ही यह भी समझना होगा कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस और सुरक्षा बलों के भरोसे नहीं जीती जा सकती। नशे का कारोबार तभी कमजोर होगा, जब इसकी मांग भी घटेगी। बराक घाटी के गांवों, कस्बों और शहरी इलाकों में जागरूकता अभियान चलाने होंगे। स्कूलों, कॉलेजों, सामाजिक संगठनों और अभिभावकों को इस अभियान से जोड़ना होगा। युवाओं को नशे के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करने के साथ-साथ उन्हें रोजगार, खेल, कौशल विकास और सकारात्मक गतिविधियों के अवसर उपलब्ध कराने होंगे।

नशे की गिरफ्त में आ चुके लोगों को अपराधी मानकर समाज से अलग कर देना भी समाधान नहीं है। उनके लिए नशामुक्ति केंद्रों, चिकित्सकीय सहायता, परामर्श और पुनर्वास की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए। परिवारों को भी यह भरोसा मिलना चाहिए कि वे बिना सामाजिक बदनामी के अपने बच्चों के उपचार के लिए आगे आ सकते हैं।

इस पूरे अभियान में प्रशासन की जवाबदेही भी सुनिश्चित होनी चाहिए। जिन इलाकों से बार-बार नशीले पदार्थों की खेप पकड़ी जा रही है, वहां नियमित निगरानी, प्रभावी गश्त और संदिग्ध गतिविधियों पर त्वरित कार्रवाई हो। साथ ही, प्रत्येक बड़ी बरामदगी के बाद जांच की प्रगति और गिरफ्तार मुख्य आरोपियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। इससे आम जनता का विश्वास बढ़ेगा और यह भी स्पष्ट होगा कि कार्रवाई केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है।

बराक घाटी की पहचान उसकी सामाजिक एकता, सांस्कृतिक विविधता, मेहनतकश जनता और व्यापारिक संभावनाओं से है। इस क्षेत्र को नशे की तस्करी के रास्ते के रूप में बदनाम होने से बचाना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। युवाओं का भविष्य किसी भी अवैध कारोबार से अधिक मूल्यवान है।

अब समय आ गया है कि नशे के खिलाफ कार्रवाई को केवल जब्ती और गिरफ्तारी के आंकड़ों से नहीं, बल्कि तस्करी के पूरे नेटवर्क के विघटन, अवैध धन की वसूली, नशे की उपलब्धता में कमी और प्रभावित युवाओं के पुनर्वास से आंका जाए।

बराक घाटी को नशे का कॉरिडोर नहीं, विकास, शिक्षा, व्यापार और संभावनाओं का कॉरिडोर बनाना होगा। यही प्रशासन की असली परीक्षा और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

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