डिब्रूगढ़: अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में स्थित प्रसिद्ध तीर्थस्थल परशुराम कुंड को लेकर विकास कार्यों के साथ अब वित्तीय पारदर्शिता का मुद्दा भी सामने आया है। अखिल भारत ब्राह्मण फ्रंट, असम राज्य समिति ने परशुराम कुंड से जुड़े सरकारी विकास कार्यों, कथित चंदा संग्रह और वित्तीय लेन-देन की स्वतंत्र जांच तथा समुचित ऑडिट कराने की मांग की है।
डिब्रूगढ़ साहित्य सभा भवन में मंगलवार को आयोजित संवाददाता सम्मेलन में फ्रंट के अध्यक्ष सतीश चंद्र शर्मा ने कहा कि पर्यटन मंत्रालय की ‘प्रसाद’ योजना के तहत परशुराम कुंड में भगवान परशुराम की प्रतिमा सहित विभिन्न विकास कार्यों और सुविधाओं के लिए करीब ३७.८५ करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई थी।
फ्रंट ने दावा किया कि भगवान परशुराम की प्रतिमा का निर्माण कार्य वर्ष २०२१-२२ में ही लगभग पूरा हो गया था। संगठन ने सवाल उठाया कि यदि प्रतिमा और संबंधित सुविधाएं सरकारी परियोजना का हिस्सा थीं, तो प्रतिमा निर्माण के नाम पर कथित तौर पर करीब ११ करोड़ रुपये जुटाने का अभियान क्यों चलाया गया।
फ्रंट के अनुसार, विप्र फाउंडेशन की वेबसाइट पर प्रतिमा निर्माण के लिए आर्थिक सहयोग की अपील की गई थी। संगठन ने दावा किया कि असम से ही करीब १.५ करोड़ रुपये एकत्र किए जाने की बात सामने आई है।
फ्रंट ने मांग की कि कथित चंदे की कुल प्राप्त राशि, बैंक खातों, दानदाताओं, खर्च, भुगतान तथा वर्तमान शेष राशि का ऑडिटेड विवरण सार्वजनिक किया जाए।
परशुराम कुंड में निर्मित अतिथिशाला को लेकर भी फ्रंट ने सवाल उठाए। संगठन का आरोप है कि सरकारी खर्च से निर्मित अतिथिशाला को विप्र फाउंडेशन द्वारा अपने प्रकल्प के रूप में प्रचारित किए जाने और उसके नाम पर आर्थिक सहयोग जुटाने की बात सामने आई है। फ्रंट ने अतिथिशाला की वास्तविक निर्माण लागत, धन के स्रोत, निर्माण एजेंसी तथा संबंधित संस्था की भूमिका स्पष्ट करने की मांग की है।
संगठन का कहना है कि यदि किसी परिसंपत्ति का निर्माण सरकारी धन से हुआ है, तो उसके नाम पर निजी संस्था द्वारा धन संग्रह हुआ या नहीं, इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
इस बीच, ब्राह्मण समाज के सदस्यों ने एक दिन पूर्व परशुराम कुंड पहुंचकर स्नान के बाद भगवान परशुराम की ५४ फीट ऊंची प्रतिमा की पूजा-अर्चना की और भोग अर्पित किया। इसके बाद धार्मिक अनुष्ठान के साथ प्रतिमा का विधिवत उद्घाटन किया गया।
संस्था के महामंत्री पवित्र कुमार शर्मा ने कहा कि उनके अनुसार प्रतिमा पिछले करीब तीन वर्षों से स्थापित थी, लेकिन नियमित पूजा-अर्चना और भोग नहीं हो रहा था। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा के अनुरूप धार्मिक अनुष्ठान के माध्यम से प्रतिमा का उद्घाटन किया गया।
फ्रंट ने परशुराम कुंड में श्रद्धालुओं के लिए उपलब्ध सुविधाओं पर भी सवाल उठाए। संगठन के अनुसार प्रतिमा स्थल के आसपास साफ-सफाई और रखरखाव संतोषजनक नहीं है। कुंड तक पहुंचने वाली सड़क तथा अन्य आधारभूत सुविधाओं को लेकर भी संगठन ने चिंता व्यक्त की।
फ्रंट ने कहा कि करोड़ों रुपये की परियोजना के बाद भी यदि श्रद्धालुओं को सड़क, स्वच्छता और मूलभूत सुविधाओं के लिए परेशानी उठानी पड़ रही है तो परियोजना की निगरानी और क्रियान्वयन की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
फ्रंट ने आरोप लगाया कि परशुराम कुंड से जुड़े कार्यों में असम और पूर्वोत्तर के स्थानीय सनातन समाज तथा ब्राह्मण संगठनों को पर्याप्त भागीदारी नहीं दी गई। अरुणाचल प्रदेश में जमीन खरीदकर परशुराम कुंड को केंद्र में रखकर विभिन्न परियोजनाएं शुरू करने संबंधी विप्र फाउंडेशन के दावों की वैधानिक एवं वित्तीय स्थिति स्पष्ट करने की भी मांग की गई।
फ्रंट ने स्पष्ट किया कि वह भगवान परशुराम की प्रतिमा या परशुराम कुंड के विकास के खिलाफ नहीं है। संगठन के अनुसार उसका सवाल विकास नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा है।
फ्रंट ने केंद्र सरकार, पर्यटन मंत्रालय और अरुणाचल प्रदेश सरकार से ‘प्रसाद’ योजना के तहत स्वीकृत ३७.८५ करोड़ रुपये के उपयोगिता विवरण को सार्वजनिक करने तथा प्रतिमा और अन्य विकास कार्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन कराने की मांग की।
इसके साथ ही कथित ११ करोड़ रुपये के चंदा अभियान, असम से कथित रूप से जुटाए गए १.५ करोड़ रुपये और अतिथिशाला से जुड़े वित्तीय लेन-देन की जांच कराने की मांग की गई।
फ्रंट के अध्यक्ष सतीश चंद्र शर्मा ने कहा कि संगठन प्रतिमा का विरोध नहीं कर रहा है, बल्कि भगवान परशुराम के नाम पर होने वाली कथित आर्थिक गतिविधियों में पारदर्शिता चाहता है। उन्होंने कहा कि धार्मिक आस्था से जुड़े किसी भी स्थल पर प्राप्त धन का उचित हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए और भगवान परशुराम के नाम पर प्राप्त राशि के प्रत्येक रुपये की वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए।
संवाददाता सम्मेलन में फ्रंट के अध्यक्ष सतीश चंद्र शर्मा, महामंत्री पवित्र कुमार शर्मा सहित संगठन के अन्य पदाधिकारी उपस्थित थे।