पच्चीस वर्ष, एक मिशन: नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्र निर्माण

गुजरात के वडनगर में एक छोटी-सी चाय की दुकान है, जहाँ कभी नरेंद्र मोदी जी अपने पिता के साथ यात्रियों को चाय परोसने में मदद किया करते थे। अक्सर ट्रेनें देर से चलती थीं और यात्री वहाँ इंतज़ार करते थे। लेकिन उस दुकान से कहीं अधिक ध्यान उस यात्रा पर दिया जाना चाहिए, जो उसके बाद शुरू हुई—सार्वजनिक जीवन के संगठनात्मक अनुशासन में लगभग ढाई दशकों तक किया गया वह शांत और निरंतर परिश्रम, उस समय जब देश के अधिकांश लोग उनका नाम तक नहीं जानते थे।

७ अक्टूबर २००१ को मोदी जी ने ऐसे गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, जो एक विनाशकारी भूकंप से उबर रहा था। यह उनका पहला वास्तविक प्रशासनिक परीक्षण था। इसके साढ़े बारह वर्ष बाद, मई २०१४ में, वे १४० करोड़ से अधिक आबादी वाले देश भारत के प्रधानमंत्री बने। इस सितंबर में वे किसी निर्वाचित सरकार के प्रमुख के रूप में लगातार २५ वर्ष पूरे कर रहे हैं—१२ वर्ष प्रधानमंत्री के रूप में और उससे पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में। दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में इतने लंबे समय तक बिना किसी व्यवधान के राजनीतिक यात्रा जारी रहना असाधारण है। मोदी जी पर जनता का भरोसा है।

इस यात्रा को और खास बनाता है कि यह भरोसा बार-बार चुनावी जनादेश के माध्यम से स्वयं जनता द्वारा नवीनीकृत किया गया। २०१४ में मोदी जी ने हमारी पार्टी का नेतृत्व करते हुए तीन दशकों में पहली बार लोकसभा में स्पष्ट बहुमत दिलाया। २०१९ में यह जनादेश और भी मजबूत हुआ। और २०२४ में मतदाताओं ने उन्हें लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में चुना, जिससे वे जवाहरलाल नेहरू के बाद भारत के इतिहास में लगातार तीन बार प्रधानमंत्री बनने वाले दूसरे व्यक्ति बने। तीन राष्ट्रीय चुनावों में मिला यह विश्वास केवल भाषणों से नहीं आया—बल्कि यह उस मेहनत से अर्जित हुआ, जिसे लोगों ने अपने जीवन में महसूस किया और देखा।

काम के प्रति वही तीव्रता आज भी जारी है। आत्मनिर्भर भारत के तहत २०२५-२६ में भारत का रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड ₹१.७८ लाख करोड़ तक पहुँच गया—एक दशक पहले यह आंकड़ा अविश्वसनीय जैसा लगता था, जब भारत रक्षा उपकरणों के लिए कहीं अधिक मात्रा में आयात पर निर्भर था। डिजिटल इंडिया, जो कभी एक नीतिगत वादा था, अब रोजमर्रा के भारत के काम करने का तरीका बन चुका है। पिछले वर्ष यूपीआई भुगतान प्रणाली के माध्यम से २४,००० करोड़ से अधिक लेन-देन हुए और ब्रॉडबैंड सब्सक्रिप्शन १०० करोड़ के पार पहुँच गए। ये केवल आंकड़े नहीं हैं—ये बताते हैं कि आज भारतीय चाय के एक कप का भुगतान करने, सब्सिडी प्राप्त करने या ऋण के लिए आवेदन करने जैसे रोजमर्रा के काम कितने अलग तरीके से कर रहे हैं।

इसी तरह, यह भावना उस क्षेत्र तक भी पहुँची है, जिसने लंबे समय तक इसकी प्रतीक्षा की। पूर्वोत्तर भारत, जिसे लंबे समय तक दिल्ली की उदासीनता और उपेक्षा का सामना करना पड़ा, अब विकास के “विकास इंजन” के रूप में उभरने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई २०१४ में १०,९०५ किलोमीटर से बढ़कर पिछले वर्ष १६,२०७ किलोमीटर हो गई। वहीं ब्रह्मपुत्र नदी को पांडु, बोगीबील, बिश्वनाथ घाट और नीमाती जैसे स्थानों को जोड़ने वाले एक कार्यशील परिवहन मार्ग के रूप में विकसित किया जा रहा है।

असम के रेल नेटवर्क का १०० प्रतिशत विद्युतीकरण क्षेत्र की विकास यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। जिस स्थायी शांति की लोग लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहे थे, वह भी मोदी जी के निरंतर ध्यान और प्रयासों के बाद क्षेत्र में दिखाई दे रही है। आज यह क्षेत्र भारत की “अष्टलक्ष्मी” के रूप में—दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एक सेतु के रूप में—देखा जा रहा है, न कि केवल एक ऐसे सीमांत क्षेत्र के रूप में जिसे संभालने की आवश्यकता हो। नई सड़कों, रेलवे लाइनों और नदी आधारित बुनियादी ढाँचे का विस्तार बताता है कि यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि व्यापक विकास की दिशा में किया जा रहा प्रयास है।

सरकार के संदेश का एक बड़ा हिस्सा चार वर्गों के इर्द-गिर्द केंद्रित है, जिन्हें वह अमृत स्तंभ कहती है—युवा, नारी, किसान और गरीब कल्याण। ऐसे शब्दों को आसानी से केवल नारों के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन जब इनके पीछे के आंकड़ों को देखा जाता है, तो तस्वीर अलग दिखाई देती है।

स्टार्टअप इंडिया के तहत मार्च २०२६ तक २.२३ लाख से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप सामने आए हैं, जिन्होंने २३ लाख से अधिक प्रत्यक्ष रोजगार सृजित किए हैं। पीएम-किसान के तहत २२ किस्तों में ₹४.२७ लाख करोड़ से अधिक की राशि किसानों के खातों में सीधे पहुँचाई जा चुकी है। प्रधानमंत्री जन-धन योजना के खातों की संख्या अब ५९ करोड़ से अधिक हो चुकी है, जिनमें लगभग ३३ करोड़ खाते महिलाओं के नाम पर हैं।

अलग-अलग देखें तो ये कल्याणकारी योजनाओं के आंकड़े हैं। लेकिन एक साथ देखें तो ये ऐसे सार्वजनिक तंत्र के निर्माण की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जिसका उद्देश्य निर्भरता के बजाय सम्मान और गरिमा को केंद्र में रखना है।

अब वास्तविक परीक्षा आगे है और इसका संबंध केवल राजनीति से नहीं, बल्कि योजनाओं को जमीन पर उतारने की क्षमता से है। भारत ने दो दीर्घकालिक लक्ष्य निर्धारित किए हैं—२०४७ तक विकसित भारत का लक्ष्य, यानी स्वतंत्रता के १००वें वर्ष तक एक पूर्ण रूप से विकसित राष्ट्र बनना; और २०७० तक नेट ज़ीरो का लक्ष्य। इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए विनिर्माण, नौवहन, ऊर्जा और निर्माण जैसे क्षेत्रों को समय से पहले आधुनिक बनाना होगा, ताकि अंतिम समय में बदलाव के लिए जल्दबाजी न करनी पड़े।

इनमें से कोई भी लक्ष्य केवल सरकार के प्रयासों से पूरा नहीं होगा। भारतीय उद्योग की विशेष भूमिका है। उसे आज से ही उस अर्थव्यवस्था के लिए निर्माण शुरू करना होगा, जिसके आधार पर आने वाले तीन-चार दशकों में उसका मूल्यांकन किया जाएगा—एक ऐसी अर्थव्यवस्था जो समृद्ध होने के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति भी जिम्मेदार हो।

वडनगर की एक चाय की दुकान से लेकर २०४७ की ओर बढ़ते भारत तक जो बात इस पूरी यात्रा को जोड़ती है, वह एक सरल आदत है—२५ वर्षों तक बिना रुके लगातार उस काम के लिए उपस्थित रहना, जिसका परिणाम तुरंत दिखाई नहीं देता।

इस सरकार को लेकर चाहे जितने भी मतभेद हों, निरंतरता और अनुशासन की वह भावना—परिस्थितियों से आगे सपने देखना और अपेक्षाओं से आगे बढ़कर काम करना—इस यात्रा की एक महत्वपूर्ण कड़ी बनी हुई है। यही निरंतरता उस भारत के निर्माण के लिए भी आवश्यक होगी, जिसे देश ने अपने भविष्य के रूप में निर्धारित किया है—एक-एक जनादेश और एक-एक उपलब्धि के साथ आगे बढ़ता हुआ भारत।

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