नियति
-प्रो. दिनेश पंड्या
किस किस को क्या कहेंगे
और क्यों ही वो सुनेंगे
प्रारब्ध हो जो रुठा
तो कह कर भी क्या करेंगे।
है दौर ये अमावस
बीती है रात पूनम
सूरज हो या दिवाकर
बाँटंगे तेज कम कम
मूल्यों में परावर्तन
हैं संकेत आरोही क्रम का
समझो तो बुद्धिमानी
मानो तो है निवारण
भावों में भेद हो तो
संतोष ही आसंजक
संतोष होगी रोगी बाधा
यदि लक्ष्य भेद तर्पण