नाम की ईसाईयत
सम्माननीय मित्रों ! एक छोटी सी वार्ता जो ह्रदय में शूल की तरह चुभती है ! उपहास जैसी लगती है किन्तु बहुत बडे धोखे की इससे दुर्गन्ध आती है ! मेरे पाकगृह का पीढा टूट गया था किसी ने कहा आप-“कार पेंटर” को बुलाओ ! मैं आश्चर्यचकित होकर बोला कि ये #कारपेंटर क्यों ?
तो उसने कहा वही तो ठीक करेगा ! मैंने कहा बुलाओ ! उसने बुलाया थोडी देर बाद एक व्यक्ति आया आरी,बंसुली,हथौड़ी, कील लेकर आया तो मैं बोला कि ये तो -“बढई” है ! तो पता चला इसे-“कार_पेंटर” कहते हैं ! जिसका-“कार और पेंट” से कोई भी सम्बन्ध नहीं है वो कार पेंटर कैसे हो गया ?
ये छद्म नामकरण की परम्परा अपने-आप में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे भयानक षडयन्त्र की कारक है ! हो सकता है कि महात्मा गांधी (?) भी इसके ध्वजवाहक रहे हों ! क्योकि उन्हीं के छद्मनाम की नकाब फिरोज,इन्द्रा,राजीव,सोनिया,राहुल से चलती चलती-प्रियंका के वाड्रा” होते हुवे भी उनको-“प्रियंका गांधी” बना देती है।
असम,झारखंड, मणिपुर,छत्तीसगढ़,केरल,कर्नाटक,तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश ही क्या समूचे भारत ही नहीं अपितु समूचे विश्व के हिन्दू समाज को भ्रमित करने के लिये ईसाई एवं मुस्लिम तद्स्थानीय प्रचलित नामकरण ये लोग कर लेते हैं !
बच्चों -सभी के सभी भारतीय राजनैतिक,आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में  अनेकानेक व्यक्तित्व ईसाई मिशनरियों  एवं भ्रमित ईस्लामिकों के ऐसे एजेंट हैं जिनके मस्तिष्क में हिन्दू विरोधी मानसिकता कूट-कूट कर भरी हुयी है।
कुछ दिनों पूर्व मैं हरिद्वार गया था वहाँ चमोली की यात्रान्तर्गत एक दिवस मुझे एक व्यक्ति सायंकाल किसी धार्मिक आयोजन में आने का निमंत्रण देकर गया !

सायंकाल वहाँ जाने पर मैंने देखा लगभग १५-१७ सामान्य ग्रामीण बैठे थे ! और एक सफेद वस्त्र धारी व्यक्ति आता है ! आश्चर्यजनक था कि उसने त्रिपुण्ड के मध्य वैष्णवी तिलक भी लगा रखा था और उस तिलक के मध्य काजल का टीका! उसके साथ चार व्यक्ति एवं दो नवयुवतियाँ भी आती हैं,वे सभी सामने कुर्सियों पर बैठे ! और फिर सभी लोगों को कपडों के साथ-साथ ५००₹ और कुछ बर्तनों के साथ एक बाइबिल दी गयी ! सबको दी गयी ! मुझे भी दी गयी!  पुनश्च ईसा की-“प्रे” की गयी एवं उनको बपतिस्मा के लिये कहा गया ! मैंने उन छे लोगों का नाम पूछा ! उन सभी ने अपना नाम जैसे-“पंकज डे,गीतेश राॅय,गौतम जाॅन,रीता पीटर बताये ।”

आज भारत में लगभग चार हजार मिशनरियों ने अपना जाल फैला रखा है ! इन सभी समूहों के नाम भी लगभग हिन्दू हैं ! हमारे वनवासी,आदिवासी,गिरिवासी,दलित,पिछडी जनजातियों के साथ-साथ निम्न आयवर्गीय लोगों के बीच इन ईसाई मिशनरियों ने -“कृष्ण को क्रिष्ट” कहते-कहते-कहते क्रिश्चियन शब्द को गहराई तक बैठा दिया है।
आगामी अंक के साथ पुनश्च उपस्थित होता हूँ  …-आनंद शास्त्री….सचल दूरभाष क्रमांक ६९०१३७५९७१

भावनाओं में एकता हिन्दू की विशेषता”
बच्चों ! टंकणात्मक सुविधा के अभाव में वेद मंत्रों की उन मुद्राओं को आपके समक्ष प्रस्तुत करने में असमर्थ हूँ तथापि विगत दिनों-“घुंघुर” में सम्पन्न हुवे महायज्ञान्तर्गत आपने हमारे विद्वान वेदपाठी पुरोहितों द्वारा वेदों का गान सुना होगा !और उस गान के साथ-साथ उनका हस्त संचालन भी देखा होगा ! इसे मुद्रा कहते हैं, जिस प्रकार योग और संभोग के चौरासी आसन होते हैं!
जिस प्रकार शक्ति और शिव की चौरासी पीठ होती हैं ! जिस प्रकार चौरासी भैरव और चौरासी भैरवी होती हैं ! जिस प्रकार चौरासी योगी और चौरासी योगिनी होती हैं ! उसी प्रकार चौरासी गुणित चौरासी अर्थात-“सात हजार,छप्पन मुद्रा चित्र लीपि” होती है !
इन सभी के उत्कृष्ट उदाहरण ज्ञानवापी,बेड द्वारिका, अंकोरवाट,  मिस्र,हड़प्पा,दक्षिण अफ्रीका और समूचे विश्व के सैकड़ों देशों में हजारों हजार की संख्या में प्राचीन गुफाओं में अंकित उन चित्रों को आप देख सकते हैं जो हमारी वैदिकीय प्राचीनतम हिन्दी लीपि के जीवंत उदाहरण हैं ।
भीमपेटरा,अजंता,एलोरा एवं महाराष्ट्र से लेकर दक्षिण भारत तक के सैकड़ों क्षेत्रों में- “पुरा पाषाण युगीन उन दिव्य मानव ॠषियों द्वारा चित्रित हजारों भित्तिचित्रों कोआप देख सकते हैं जहाँ चित्रों में चित्रकार ने उन भावों को उकेर दिया ! लगभग पैंसठ हजार वर्ष पूर्व ही उकेर दिया ! जिसे कोई भी शिक्षित-अशिक्षित व्यक्ति भलीभांति समझ सकता है ! इसे कहते हैं-“भावनाओं में एकता हिन्दी की विशेषता”।
बच्चों ! ऐसा कोई भी भाव नहीं हो सकता जिसके लिए पृथक पृथक मुद्राओं की कल्पना वेदों में न हो। यहाँ आपको कुछ लोग यह कहकर भ्रमित कर सकते हैं कि -“हिन्दी,बांग्ला,कन्नड,मराठी और संस्कृत,तथा संस्कृत और वैदिकीय संस्कृत” में अंतर है ! आप केवल उनसे यह पूछना कि वैदिकीय संस्कृत किस लीपि में है ?
यहाँ आकर वे मौन हो जायेंगे।
बांग्ला,असमिया,कन्नड़,गुजराती,मराठी,मलयालम,गोवान, मारवाड़ी, पंजाबी,कश्मीरी आदि केवल भारत में ही लगभग चार हजार से अधिक भाषायें हैं ! और सभी भाषाओं में हिन्दू कर्मकांड के अनुसार वैदिक ॠचाओं का पाठ किस भाषा में किया जाता है ?
प्राच्य भाषा जिसे बौद्ध संस्कृत की लीपि कहते हैं ! वह तो बिलकुल ही वैदिकीय संस्कृत अर्थात हिन्दी लीपि का असंस्कारित संस्करण है अर्थात उसे आप एक प्रकार से  -“हिंग्लिश” कह सकते हैं।
अग्रेजी,जर्मन,फ्रेन्च,अरबी,फारसी और उर्दू जैसी भाषाओं का उद्गम वैदिकीय हिन्दी लीपि के गौमुख से ही हुवा है इसपर आगे चलकर एक विशेष शोध पत्र लिखने की योजना पर मैं सतत् प्रयास रत हूँ ।
यहाँ इतना कहना पर्याप्त है कि सामवेद की ऋचाओं के गान के लगभग लगभग उर्दू एवं अरबी भाषा का उच्चारण आप कहीं भी सुन सकते हैं। मैंने संघ की शाखाओं में,अनेक राज्यों के भ्रमण,अपने संग्रहित पुस्तकालय एवं समय-समय पर अनेक महापुरुषों के श्रीचरणों में बैठकर इस महामंत्र को-
“कार्य पुरुषकारेण लक्ष्यं सम्पद्यते॥” अंगीकार किया है।
मित्रों ! यह हिन्दी हिन्दू और हिन्दुस्थान की सफलता का महत्वपूर्ण पक्ष है कि आज दुष्यंत-शकुन्तला की वो सन्तान जो बाल्यावस्था में ही सिंहों के जबड़ों में हाथ डालकर उनके दांत गीनते थे ! मित्र-भाव से गिनते थे ! जिसके कारण हमारे देश का नाम उनके नाम पर-“भारत” रखा गया ! उस भारत की गाथा बचपन की जिन पुस्तकों में हमने पढा था आज उसका सफल आयोजन-“श्रीभारत मण्डपम”में सम्पन्न होता समूचे विश्व ने देखा।
जिस “राम राज्य” की कल्पना हमारी हिन्दू महासभा ने, क्रान्तिकारियों ने, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने की थी अर्थात जहाँ शेर और बकरी एक घाट पर साथ-साथ पानी पीते हों ऐसा भारत ने हिन्दी माह के अंतर्गत जी-20 की बैठक में कर दिखाया ! जहाँ रूस,चीन,यूक्रेन के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में यूरोपीय देशों,५६ इस्लामिक देशों, अफ्रीकी,मध्य पूर्व एशिया के साथ-साथ अमेरिका,जर्मनी, जापान, ब्रिटिश राष्ट्राध्यक्षों के साथ ! विकसित-विकासशील और पिछड़े देशों को एक मंच पर साथ बिठाकर-“वसुधैव कुटुंबकम ” की भावना साकार करते हुवे असम्भव से दिखते संयुक्त घोषणा पत्र पर सर्वमान्य सहमति बना ली।
बच्चों ! जिस कोर्णाक सूर्य मन्दिर प्रतिकृति के समक्ष हमारे यशस्वी प्रधानमन्त्री जी ने बंगलादेश की  वर्तमान निर्वासित शेख हसीना, ऋषि सुनक से लेकर जो•बाइडन• तक को समय चक्र दिखाया था ! ये बता दिया था कि समय का पहिया फिर से घूम चुका है ! अब भारत सोने की चिड़िया नहीं हीरण्यमय सूर्य बनने की दिशा में चलता हुवा विश्व के आकाश पर ध्रूव नक्षत्र की तरह स्थिर हो चुका ! अब भारत ऐसा सूर्य है जिसकी परिक्रमा विश्व के सभी देशों को लगानी होगी।
ये गर्व का विषय है कि इस सम्मेलन में विश्व की सभी भाषाओं के मध्य हिन्दी भाषा का वो तिरंगा लहरा उठा ! लगभग विश्व के सभी राष्ट्राध्यक्षों ने उपरोक्त सम्मेलन में हिन्दी बोलने का प्रयास किया ! ये हम बराक उपत्यका ही नहीं अपितु समूचे विश्व के हिन्दुओं के लिये अनुकरणीय है।
हम सभी जानते हैं कि हमें हिन्दी हिन्दू और हिन्दुस्थान के लिये सत्याग्रह के मार्ग पर चलने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं बचा है। मित्रों ! ये हमारे अस्तित्व का युद्ध है ! कुछ लोग  अपनी बुद्धि को गिरवी रख चुके हैं ! वे अब ३१ मार्च सन्२०२६ के पश्चात भूतपूर्व हो चुके अर्बन नक्सली लोगों द्वारा बनाए उस चक्रव्यूह में अकेले अभिमन्यु की तरह फंस चुके हैं !
वे भी हमारे समाज के ही अंग हैं ! इस चक्रव्यूह से निकलने का मार्ग वे नहीं जानते और न ही निकलना चाहते हैं । किन्तु हमें यह-“महाभारत जीतनी ही है”—
आनंद शास्त्री ..सचल दूरभाष क्रमांक ६९०१३७५९७१

आनंद शास्त्री